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जीने की राह: एकाकी चुनना सीखें

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हमारी सामाजिक संकल्पना का आधार परस्परता है। यह परस्परता मनुष्य केे लिए प्रिवेलज भी है, वहीं उसकी संभावनाओं का एक हद भी। परस्परता के क्रम में ही मनुष्य ने क्षेत्रीय, भाषाई व राष्ट्रीय परिभाषा व समूह से स्वयं को जोड़ा है। संबंधों व उसके पर्यायों से खुद को जोड़ा है। अभ्यास व प्रशिक्षण से मनुष्य ने स्वयं को इन पहचानों व पर्यायों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया है। लेकिन, तब भी उसके भीतर एक स्वाभाविक द्वंद्व जारी रहा है। वहीं समाज के पर्याय व प्रतिमान भी बदले हैं, जोकि लंबे समय से चले आ रहे अभ्यास व प्रशिक्षण से भिन्न हैं।  इसलिए, सामाजिक व पारिवारिक ढांचे में हुए बदलाव की प्रतिक्रिया में मनुष्य के हिस्से जो एकाकी आई है वह उसके लिए किसी आपदा से कम नहीं है। लंबे समय से वह जिस अभ्यास में रह रहा है उस दृष्टि से देखने पर यह एक बड़ा संकट दिखाई देता है। मनुष्य अपने अभ्यास नहीं बदल पा रहा, न ही बदल रही हैं उसकी सामाजिक अपेक्षाएं।  दूसरी ओर इस थोपे हुए एकाकीपन से जूझना एक चुनौती बन गई है क्योंकि वर्षों का हमारा अभ्यास इसके विपरीत है। यहां हमारे अभ्यास और अपेक्षा के विपरीत यथार्थ का संघर्ष है...

जीने की राह: मनुष्य, इच्छा की सीमा से बहुत श्रेष्ठ है।

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मनुष्य में पूर्णता के दो पक्ष हैं, जिन्हें कुछ हद तक अलग करके देखा जा सकता है। ‘होने’ में पूर्णता और ‘करने’ में पूर्णता। यह कल्पना की जा सकती है कि प्रशिक्षण या प्रभाव से, ऐसे व्यक्ति से भी अच्छे काम कराये जा सकते हैं जो व्यक्तित्व के स्तर पर अच्छे नहीं है। यह भी देखा गया है कि घातक जोखिम वाली गतिविधियां अक्सर कायरों द्वारा की गई हैं, भले ही वे खतरे के प्रति सचेत रहे हों। ऐसे कार्य इसे करने वाले व्यक्ति के जीवनकाल के बाद भी मौजूद रह सकते हैं, और उपयोगी हो सकते हैं। बावजूद इसके इसे पूर्णता का पर्याय नहीं माना जा सकता।  जहां सवाल उपयोगिता का नहीं बल्कि नैतिक पूर्णता का है, हम यह महत्वपूर्ण मानते हैं कि व्यक्ति को अपनी अच्छाई को लेकर सच्चा होना चाहिए। उसका बाहरी अच्छा काम भले ही अच्छे परिणाम देता रहे, लेकिन उसके व्यक्तित्व की आंतरिक पूर्णता का अपना बहुत बड़ा मूल्य है, जो उसके लिए आध्यात्मिक स्वतंत्रता है और मानवता के लिए एक अनंत संपत्ति है, हालांकि हम इसे नहीं जानते होंगे। अच्छाई एक तरह से अहंकार से बचाव के भाव का ही व्यक्त रूप है यानी हमारे भीतर अहंकार को लेकर कितना दुराव है। अच्छाई ...

वे आशीष जो मैंने चुने--- मेरी मां ने दोहराये।

मां, जैसे माटी की सतह पर माटी से बनी मेड़, जो 'सबको मिले' की कामना लिए स्वयं वंचित रह जाती है...प्यासी रह जाती है।  अलबत्ता, बहाव को साधने व सबको सुलभ कराने के प्रयास में प्रत्येक आवृत्ति में थोड़ी भीगती है तो अधिक छीजती है। घटती-कटती, अपनी स्थिति को साधती....लेकिन 'सबको मिले', 'सम्यक मिले' की भावना को जीती बनी रहती है...शीत, तुषार, पदाघात सहकर भी। मां मेड़ जैसी है, मेड़ नहीं। मां, संतान को सींचती है और संतान से सीखती भी है।  वस्तुस्थिति बताकर अम्मा का यह कहना कि अब तुम बता दो कि इस विषय में क्या करना चाहिए...उनकी अपने पोषण पर आश्वस्ति नहीं, तो और क्या है!  विपन्नता से जूझकर पली संतानों के लिए संपन्नता को अनुष्ठान करती मां....संतान की गति समझकर अपनी प्रार्थनाएं भी मोड़ लेती है।  एक रोचक बात याद आई, चित्रकार बनने के तमाम प्रयासों से असफल एक लड़का मेरे पास आया। उसने अपनी सारी बातें कहकर मुझसे मार्गदर्शन मांगा। मैंने उससे कहा कि अपनी मां से कहना कि अपना आशीष बदल लें। उनका आशीष तुम्हारी भावना को दूसरी दिशा में धकेलता है, यही द्वंद्व तुम्हें सिद्ध होने से रोकता है।  अम्मा ...

'मानस' को प्रज्ञा से जानो, प्रलाप से नहीं

कहने की आवश्यकता नहीं कि यह विद्वत्ता का आपद काल है। जहां विद्वत-विमर्श की प्रेरणा राजनीति से उठने लगी है। ऐसी परिस्थिति बनी है कि कुछ भी कहने को अब किसी मेरिट की आवश्यकता नहीं रही है। न ही ग्रंथों के अध्ययन, अनुशीलन व अभ्यास की आवश्यकता रही है। बल्कि, जिसके पास भीड़ है वह किसी भी विषय पर कुछ भी कह कर उसे मनवा सकता है। यह ऐसा वक्रजड़ युग है कि सीधी बातों को भी जब तक टेढ़ा करके ना कहा जाए उसे कोई समझने वाला नहीं। विद्वत विषयों पर नेताओं की सहज आपत्ति बताती है कि जिसने भी यह कहा है कि मूढ़ों में गजब का आत्मविश्वास होता है, उसने ठीक ही कहा है। हालांकि, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि ग्रंथों व प्रशस्त मान बिंदुओं पर आपत्ति करने वाले अज्ञानी ही नहीं कुटिल कामना के स्वामी भी होते हैं। उन्हें अज्ञानी कहने का अर्थ यह नहीं है कि वे सत्य से अनभिज्ञ हैं। बल्कि वह क्षणिक पदार्थवादी प्राप्तियां के लिए सत्य का भी विरूपण करने का प्रयास कर रहे हैं, इसलिए अज्ञानी हैं।खैर, इन सब बातों का उन पर कोई असर होने वाला नहीं है। मैं ऐसी प्रकृति के लोगों को प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ न कहने का पक्षधर हूं। क्योंकि ...

कृष्ण 'होना' हैं, 'बनना' नहीं।

कृष्ण बीइंग (होना) हैं, बिकमिंग (बनना) नहीं। बीइंग इज रियलटी, बिकमिंग इज फैलेसी। 'होना' सत्य है, 'बनना' भ्रम। व्याख्या भी बिकमिंग की होती है, बीइंग तो व्यवहार है। बीइंग तो स्वभाव है, सहज घटता है। बीइंग विज्ञान है।  व्याख्याएं अप्राप्य की होती हैं, कृष्ण तो सर्वव्याप्त हैं। उनकी क्या व्याख्या करना। लीलाओं से कृष्ण नहीं हैं, बल्कि कृष्ण हैं इसलिए लीलाएं होती रहेंगी।  कृष्ण का समत्व-बोध स्व'स्वरूप'संधान है।  कृष्ण को चुनना सम्पूर्ण का चयन है। इसमें रास, रंग और रण सब शामिल है। सुविधानुसार किसी एक का चयन नहीं। कृष्ण में कुछ छोड़ने लायक है ही नहीं, परिष्करण की शिखरतम प्राप्ति... जहां अनावश्यक कुछ नहीं रह जाता।  कृष्ण कोई रूप नहीं, प्रवाह हैं। दिने दिने नवं नवं... हर बार का नयापन अनछुआ.... अनाघ्रातमं पुष्पं..! कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।

तरलता को ताप चाहिए।

धारा में बहना, बहने वाले का न तो चयन हो सकता है न ही नियति। धारा में किसे बहना है, यह धारा का ही चयन है। प्रवाह अपने साथ उसे ही बहने देता है--- जिसमें ताप हो, गति हो। ठंडी वस्तुओं को वह यूं ही छोड़ बह जाता है, निष्प्राण और शुष्क वस्तुओं को किनारे पर लगाता जाता है।  प्रवाह सबको नहीं स्वीकारता। किनारे पर संयोजित निष्प्राण, तापहीन वस्तुएं इसका प्रमाण हैं। वह उसे ही स्वीकारता है जिसमें गति की अनुकूलता है... तरलता है....ताप है।  यमुना तट पर बैठा हूं। पत्तियों को धारा में फेंक देने पर भी कुछ समय पश्चात व किनारे लगा दी जाती हैं। उन्हें किनारे छोड़ पानी लौटकर प्रवाह हो गया है। वहीं जब कुछ पत्तियों पर बाती रखकर दीप जला दिया है तो किनारे पर प्रवाह विपरीत होने के बावजूद....धारा धीरे-धीरे उसे अपने में स्वीकार लेती है। झूलते, डोलते, दीप धारा के अङ्क में समाता जाता है...फिर अन्तस स्पर्श पाकर वेगवान हो जाता है। मैं यह दृश्य देख रहा हूं...इसे दोहरा रहा हूं.. तरलता के अंतस में ताप होता है...तरलता को ताप चाहिए।  (12 दिसंबर 2022, यमुना तट दिल्ली)

पदचिह्न पकड़ लेने से सिद्धियां नहीं साधी जा सकती हैं

साधुता का परंपरा से कोई अनिवार्य संबंध नहीं है, न ही धार्मिकता का किसी पंथ से। लोकपंथाध्यास किसी के मुक्ति की गारंटी नहीं है, न पंथमुक्तता उसके मुक्ति की बाधा है।  किसी के पदचिह्न पकड़ लेने से उसकी सिद्धियां नहीं साधी जा सकती हैं। जो 'मार्ग पा लिया' कहकर किसी के पीछे दौड़ जाते हैं, उन्हें हताशा ही मिलेगी। कोई मार्ग, मंजिल की गारंटी नहीं है। जो पूर्ववर्ती प्रतिज्ञाएं दोहराते हैं, उनका तो खैर... मतिभ्रमणकारकम् वाली स्थिति है।  वैसे भी, मानव ने अपने सभ्यता के इतिहास में सबसे अधिक जलयात्रा की है। जहां कोई मार्ग तो दूर लकीर भी नहीं उभरती। लेकिन लोग पहुंचते रहे हैं...अपने गंतव्य तक।  'मार्ग का मोह' या 'परिवर्तन का उन्माद' भटकाता ही है। वह कहीं पहुंच नहीं सकते। क्योंकि, कसौटी मार्ग नहीं पथिक है।  किसी का स्व'धर्म त्यागकर दूसरे पंथ में चले जाने पर न तो मुझे विषाद है, न ही किसी के लौट आने की प्रसन्नता है। क्योंकि 'पंथ' कोई प्रिवेलेज नहीं हैं, जैसा कि बताया जा रहा है। बल्कि वह संकेतक है, अब तक की यात्रा का। बेटन कहां से उठाना है, इसका प्रशस्त बिंदु है।  अलबत्ता...

लगन की बारिश

बनमुर्गियों की आसमानी समझ अच्छी होती है। उनका रडार बहुत ही सटीक होता है। कल शाम को जैसे ही बादलों की आमद दर्ज हुई, बनमुर्गियों ने सायरन बजा दिए थे। जैसे-जैसे बादलों की पातें सजती गईं, बनमुर्गियों का स्वर अधिक सघन व तेज होता गया। दादुर आज भी कोरस कर रहे थे, फोकस में श्वेत श्याम बनमुर्गियां ही थीं। पपीते हथेलियां पसारे इंतजार ही कर रहे थे, जैसे जीमने के बाद हाथ धुलाने के लिए मेहमान धार के नीचे हथेलियां पसार देता है। केले में ऊपर एक पत्ता निकला था, अंजोरी के आकार का। वह  घोषणा थी कि प्यास अब असहनीय हो गई है।  इतने में बादलों ने बरसना शुरू किया। मेरी नजर पड़ी ताजे और कोमल अमलतास के पत्ते पर। वह अपनी धुन में रमा था, पेंडुलम की तरह एक आवृत्ति में हिल डुल रहा था। जब बूंदे उससे टकराईं तो सिहर उठा। लेकिन जल्दी ही उसे आनंद आने लगा, और उसने हिलने की आवृत्ति बदल ली।  बारिश हो रही है। धार महीन लेकिन लयबद्ध। बादल जैसे एक दूसरे से कह रहे हों कि हां! संभाल के बरसो, दिनभर बरसना है। और जब इस संभालने की परिणति में कभी धारें लुप्त हो जातीं, तो बादल कहते, 'लय टूटनी नहीं है और तत्काल नया आलाप ले लेते। सु...

महुआरी यादें और सुंगध का संवाद

जब मैं दफ्तर जाने के लिए पृथ्वीराज रोड से राजेश पायलट रोड पर मुड़ता हूं तो वहां दोनों तरफ महुआ के पेड़ लगे हैं। अलस्सुबह चुए मादक महुए महक रहे होते हैं। वह महक गंधभर नहीं है। ‘गंध का संवाद’ है जो खुद तो कुछ नहीं कहते, लेकिन आपको बहुत कहने के प्रेरित करते हैं। आगे गोलचक्कर से जहां जनपथ पर मुड़ना होता है, तक--महुओं की कतार महज चार सौ मीटर लम्बी है। जब वहां से गुजरता हूं तो लगता है कि काश यह सड़क पसर जाती, लम्बी हो जाती और यह महक ख़त्म न होती। जहां से मधूक पांत खत्म होती है, वहीं से महुआरी यादों का सफर शुरू हो जाता है। हमारे दूर के खेत पहले आम के बाग थे, उसमें दो तीन जहीन पेड़ महुआ के थे। इतने बड़े की दस-बारह बच्चे हाथ का ‘कक्कन जोड़कर’ उसकी मोटाई नापते थे। उसकी शाखाएं - प्रशाखाएं बीघे भर में फैली थीं, बड़ा छतनार पेड़ था। फागुन उतरने के साथ महुआ का पेड़ अपनी पत्तियां उतार देता, लाल कोमल शिशु पत्तियों के नीचे गुच्छों में महुआ चोंच निकालकर बाहर का ताप लेते। पुरानी पत्तियों के झरने से नीचे मोटी बिछावन बिछ जाती इससे चुने वाले 'सुमन की सुकोमलता' न प्रभावित हो। जब भोर की पोर खुलती तो कुच की बु...

यात्रा...अपने भ्रमों से बीतना है।

यात्रा, महज यहां से वहां भटकना नहीं है। वन, प्रदेश और प्रान्तर से गुजरना नहीं है...बल्कि अपने भ्रमों से बीतना है। चलते जाना..स्थान का अंतरण करते जाना....यही यात्रा का एकमात्र पर्याय नहीं हो सकता।  यहां से वहां भागने में भी जड़ता हो सकती है और स्थिरता में भी यात्रा हो सकती है।  अहर्निश चलकर, घूमकर ग्रह वही हैं...एक आवृत्ति के बाद 'वहीं' हैं। जबकि, सूर्य अपनी स्थिरता में ऐसी यात्रा करता है कि प्रत्येक 11 वर्ष में उसके दिशाओं का सत्य बदल जाए। वह यहां से वहां तक भटकता नहीं, 'यहां' और 'वहां' को ही अभेद कर देता है...उत्तर और दक्षिण का भेद मिट जाता है।  भारत ने अनेक यात्रा देखी है। धौत धारण कर भगवा हो जाने तक की संतों की यात्रा.....और काफिला सजाकर निकले सार्थवाहों की यात्रा। कहने को तो संत और सार्थवाह दोनों यात्री ही रहे। संतों ने इसी यात्रा के सहारे वैयक्तिकता की बाधा पार की...भ्रमों से बीते...स्व में सर्व को अनुभूत किया। पड़ाव और पर्याय  उनके लिए निरर्थक हुए।  सार्थवाह अपने कामनाओं की तरह ही बड़ा काफिला लेकर निकले, धारणाओं को ढ़ोते... वह भारी ही हुए। मार्ग मजबूत होते गए....

सातत्य का संगीत 

पलाश वन को पार कर आया हूं। पत्थरों की लाल चटाई पर वह अबोये वृक्ष जैसे ध्यानस्थ थे--- सजातीयता के संयोजन में होकर भी गहन एकाकी में लीन, दूर-दूर स्थित। बुद्धवत शांति ओढ़े हुए। विरक्त की तरह अलिप्त। जैसे वसन्त से पूर्व अपनी तंद्रा नहीं तोड़ना चाहते। उनसे थोड़ा पीछे विंध्य के सुभग शिखर समतल पर औंधे नाद की तरह सज्जित हैं---अंतर्मुखी। परत-दर-परत चट्टानों के संयोजन से उभरी ओजस्विता देखते ही बनती है। जिन्हें छूने में जीवित देह सा स्पर्श बोध है। उनकी गुफाएं जैसे सांसों की गर्माहट से भरी हैं, और भित्तियां जैसे छुवन से सिहरा हुआ नाभि-देश। यह सब पीछे छोड़ आया हूं। जहां बैठा हूं, सामने उथला लेकिन अहर्निश प्रवाह है। इसकी निरंतरता से पठार की लाल देह और चटख हो गई है। इनका उद्गम वहीं पीछे लेकिन अब भी दृष्टि की प्रसार में स्थित विंध्य के सुभग शिखर हैं, जोकि पसीज रहे हैं। उनके पसीजन की जो बूंदें लड़ियों की रस्सी बनाकर नीचे उतर रही थीं, वही यहां प्रवाह बन बह रही हैं।  विंध्य पिघलकर बह रहा है, लेकिन यह प्रवाह शिखरों के स्वरूप को नहीं भूला है। पठारी तल की अनगढ़ता से प्रवाह में अनगिनत विंध्य-शिखर उभरते हैं....फिर ...

पाश का पागलपन

रोज-रोज बांधे जाने से बैल का खूंटे से अगाध प्रेम हो जाता है। वह उसे चाटता है, सहलाता है, कंधे रगड़ता है। मुक्त किये जाने के बाद वह स्वतः ही खूंटे पर लौट आता है। ऐसा करने के लिए किसान बैल की सराहना करता है, बैल को निश्चित ही गर्वानुभूति होती है---वह कितना पाबंद है, कितना समर्पित है, परंपरा के प्रति सजग है! लेकिन, इसे आप बैल का मौलिक अधिकार कह सकते हैं?  खूंटे का बंधन बैल ने नहीं चुना है। आरम्भ में उसने भी प्रतिकार किये होंगे। अब वह इसी में खुश है। परंपरा की हों या पैमाने की...आरम्भ में बेड़ियां बलात ही डाली जाती हैं। फिर वही बेड़ियां आभूषण हो जाती हैं। उनकी खनक में वह जीवन का संगीत सुनने लगता है। जब कोई पाशबद्ध मुक्ति के प्रयास छोड़ता है तो यह विद्रूप है, लेकिन वह बंधन का उत्सव मनाने लगता है तो यह त्रासद है।  पाशबद्ध होना, बंधन है दासता नहीं। दासता तो पाश की परिधि को स्वीकार लेना है। पाश का प्रतिकार न करना, दासता है।  पैरों में बेड़ी है, वह पैरों को निश्चित सीमा से आगे बढ़ने में रोकती है। बेड़ी में बंधे पैर बेड़ी की परिधि तक ही बढ़ सकते हैं। लेकिन, वह उस परिधि को स्वीकारते नहीं। जब भी पग उठता है...

होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी!

होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी! नदी की ओर बढ़ती सीढ़ियां खत्म हो गई हैं, वहीं एक घुटने भर ऊंची दीवार बनी है। दीवार, फांट और घाट का सीमांकन है। सीमा रेखा है, स्थिरता और प्रवाह की। इसी अंतिम सीढ़ी पर खड़ी हो नायिका प्रवाह को देख रही है। उसके बाईं तरफ दोगुनी ऊंचाई के खंभे पर प्रकाश जल रहा है। मचलती-लोटती लहरें पानी की सतह पर कितने ही वलय बना रही हैं। जैसे एक सिरे से मुक्त हो उड़ती चूनर पर हवा के दाब से कामदगिरि सी संरचना उभरती, मिटती है।  दिवसावसान को पहर भर बीत जाने के बाद सब कुछ शीतल और शांत है। वहां ध्वनि का एक ही हस्तक्षेप है, स्टीमर का हॉर्न--जो निश्चित अंतराल पर हूंउउउं करके स्थिरता को भेदता है। वह हॉर्न जैसे, मन के ही हूक की प्रतिध्वनि हो।  नायिका मूर्तिवत खड़ी है। हलचलों के बाद स्थिर होने की कोशिश करते प्रवाह के सतह के साथ खुद को समायोजित करते हुए। जैसे, वह उन छोटे हो रहे वलयों के बीच खुद को खोज रही है, फिर साध रही है खुद को ऊपर से--जबकि भीतर वेग है, उद्वेग है। तभी नायक के आने की आहट पाकर वह आधी मुड़ती है। लैम्पपोस्ट के प्रकाश से उसका चेहरा प्रभामय हो उठता है।  ......दोनों विपरीत ...

वृक्षों का रूप लौट आया है। 

पतझड़ से पीपल पारदर्शी हो गया था। उसकी सघनता झर गई थी। मैंने रात में उसे देखा, उसपार चंद्रमा उगा हुआ था। संरेखित टहनियों के आर-पार देखा जा सकता था। ज्योत्स्ना की पृष्ठभूमि पर वह टहनियां जैसे उजले कागज पर स्याही से मौसमी घोषणा लिखी हो। पीछे से आवाज आई, 'ठूंठ' में क्या देख रहे हो? मैंने स्वयं से कहा, ठूंठ? नहीं यह तो पीपल का वृक्ष है। सिर्फ पत्तियां ही तो झरी हैं, फिर आ जाएंगी। लेकिन, हां फिलहाल यह ठूंठ है। जैसे नदी की पहचान फांट नहीं जलप्रवाह है। मनुष्य की सफलता द्रव्य-संग्रह है। वैसे ही वृक्ष का रूप पत्तियों से है। कम से कम आंखों ने तो यही मानक बना रखे हैं। खैर, उस दिन मुझे पीपल को यूं देखकर थोड़ा दुःख हुआ था। मैं इस मौसम के बीत जाने की प्रतीक्षा कर रहा था।  बीते शाम इच्छा हुई तो निरंतर धंसती अरावली की श्रृंखला पर उगता सूरज देखने चला गया। तभी मैंने पीपल को फिर निहारा। सुग्गे के रंग के कोमल पत्ते हल्की हवा पाकर अपने शैशव पर इतरा रहे थे। पड़ोस की पाकड़ गुलाबी परिधान ओढ़े खड़ी थी। उसके पत्ते इतने सुकोमल, कि हवा का दबाव पाते ही वह लजा जाते। तो कभी, दोलन कर स्थिर हो जाते। नीम की पतली टहनि...

बल की विस्मृति से ही हनुमान ज्ञानियों में अग्रणी हैं। 

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शक्ति उसी को शोभती है, जिसके हृदय में न्याय स्थापित हो। हनुमान के हृदय में न्याय-विग्रह राम स्थापित हैं। इसलिए, वह शक्ति के अधिकारी हैं। योद्धा वही सिद्ध है जो शस्त्र को अंतिम विकल्प माने, क्योंकि उसकी भयावहता का सटीक भान योद्धा को ही होता है। वही जानता है कि शस्त्र प्रलय का ही विस्तार करेंगे, उनसे सर्जना अनपेक्षित है। हनुमान सिद्ध योद्धा हैं, जहां मुष्टि प्रहार (मुक्के) से काम चल जाता है वहां पग प्रहार नहीं करते। जहां पग प्रहार से काम चल जाता है, वहां गदा का प्रयोग नहीं करते। हनुमान में छलांग भर में सागर पार जाने का बल और वेग है, हिमालय की चोटी उखाड़ लाने का सामर्थ्य है, वह चाहें तो लंका द्वीप को कटोरे की तरह समुद्र में उलट दें...तब भी वह सहज घट रही परिणतियों को प्रभावित नहीं करते। वह देखते हैं कि लंका के जल जाने का आयोजन तो राक्षस मिलजुल कर स्वयं ही कर रहे हैं। उसे जला डालने भर का कपड़ा और तेल वह स्वयं ही संचित कर रखे हैं, उन्हें तो बस उस आग को उचित स्थान दिखा देना है। जैसे, सर्वशक्तिमान केशव कालयवन को मुचकुंद की गुफा तक पहुंचा देते हैं, जिनकी आंखों में उसे भस्म कर देने वाली ज्योत...

कवियों में संत हों, संतों में कवि हों

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हिंदी साहित्य ‘त्रिकोण के त्रास’ में है। यह त्रिकोण प्रासंगिकता, प्रेताभिव्यक्ति और उधारी का चिंतन है। आज के साहित्य में यह तीनों छुपाए नहीं छुपते। जैसे, झीने सफेद आवरण से तमस नहीं छुपता ब​ल्कि उसकी अभिव्य​क्ति आवरण को भी तमस कर देती है, वैसे ही यह प्रकट हैं। यह सब आज के साहित्य का रूप हो सकता हैं, लेकिन उसके शाश्वत चिंतन और अपरिवर्तनीय लेकिन प्रवहमान तत्त्व की प्रतीति नहीं करता। हिंदी का कवि और साहित्यकार शाश्वत चिंतन और तत्त्व से बेसुध हैं। वह सबके मन की दोहराने और आरम्भिक बातें कहकर जन-मन-रञ्जन में ही अपनी सिद्धि खोज रहे हैं। जिन्होंने प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ा है वह कभी पाश्चात्य तो कभी कम ज्ञात चिंतन का पुनर्पाठ गाते फिर रहे हैं। इससे वह भीड़ से अलग तो दिख जाते हैं लेकिन उनका भेद खिंचाव काल में खुल जाता है। साहित्य का सबसे बड़ा वर्ग बीते को दोहराने वाला है। यहां बीते युग की बातों को अनेक तरह से कहा जा रहा है। जो विचार और अभ्यास प्रवाह क्रम में छोड़े जा चुके हैं उनको गाकर, स्मृतियों में जीवंत रखकर पाठक को पाशबद्ध किया जा रहा है। पाठक अपने छूंछे छूटे उस जीवन को गाये जाने से प्रसन्न ह...

संगीत व साधुता की पारमिता थे बाबा गौरीशङ्कर

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  अयोध्या ने अपने उपेक्षाकाल में अनके सिद्ध संत व साधक दिये, जिनसे आम जनमानस अजनबी है। इसमें से अ​धिकतर साधक व संतों ने रामनगरी के पुर्नजागरण से पूर्व ही स्वयं को समेट लिया या असीम से सायुज्य पा लिया। बाबा गौरीशङ्कर उनमें से ही एक थे। बाबा गौरीशङ्कर को अयोध्या की संगीत परंपरा का प्रतिष्ठापक कहा जाता है। किशोरावस्था में ही वैरागी बन गये गौरीशङ्कर ने करीब सात दशक तक अयोध्या की संगीत परंपरा का प्रवाह अक्षुण्ण बनाये रखा और उसे वेग दिया। उन्होंने मार्गी गायन परंपरा को नई ऊंचाई दी और अनेक सिद्ध ​शिष्य तैयार किये। कन​क बिहारिणी व बिहारी जू की उपासना में उन्होंने अपने को सौंप दिया था और फिर पूरे जीवन बस भगवान के लिये ही गाया। लंबे समय तक तो वह बस कनक भवन में ही गाते रहे। उन्होंने व्यावसायिक मंचों पर गाने से दूरी बनाये रखी। अपनी मस्ती में प्रसिद्धि की कोई परवाह न की। सरयू और भगवान राम उनके आजीवन आलंब रहे, इसलिये दूसरा नगर भाया नहीं। वह देश के विभिन्न स्थानों की यात्रा करके फिर अयोध्या लौट आते। यहीं के चना, चबेना और सरयूजल से उन्होंने जीवन भर की साधना की। कनक बिहारिणी व बिहारी जू सरकार की यु...