यात्रा...अपने भ्रमों से बीतना है।
यात्रा, महज यहां से वहां भटकना नहीं है। वन, प्रदेश और प्रान्तर से गुजरना नहीं है...बल्कि अपने भ्रमों से बीतना है।
चलते जाना..स्थान का अंतरण करते जाना....यही यात्रा का एकमात्र पर्याय नहीं हो सकता।
यहां से वहां भागने में भी जड़ता हो सकती है और स्थिरता में भी यात्रा हो सकती है।
अहर्निश चलकर, घूमकर ग्रह वही हैं...एक आवृत्ति के बाद 'वहीं' हैं। जबकि, सूर्य अपनी स्थिरता में ऐसी यात्रा करता है कि प्रत्येक 11 वर्ष में उसके दिशाओं का सत्य बदल जाए। वह यहां से वहां तक भटकता नहीं, 'यहां' और 'वहां' को ही अभेद कर देता है...उत्तर और दक्षिण का भेद मिट जाता है।
भारत ने अनेक यात्रा देखी है। धौत धारण कर भगवा हो जाने तक की संतों की यात्रा.....और काफिला सजाकर निकले सार्थवाहों की यात्रा। कहने को तो संत और सार्थवाह दोनों यात्री ही रहे।
संतों ने इसी यात्रा के सहारे वैयक्तिकता की बाधा पार की...भ्रमों से बीते...स्व में सर्व को अनुभूत किया। पड़ाव और पर्याय उनके लिए निरर्थक हुए।
सार्थवाह अपने कामनाओं की तरह ही बड़ा काफिला लेकर निकले, धारणाओं को ढ़ोते... वह भारी ही हुए। मार्ग मजबूत होते गए....मार्ग पर सराय बनते गए, उनकी यात्रा छोटी होती गई...कामनाएं पूरी करके वह जड़ हो गए। कहीं जम गए।
यह तंबू गाड़ते, उखाड़ते चलनी वाली 'यात्राएं'...सराय से सराय तक के अंतरण....यह सब सार्थवाहों की यात्राएं हैं। कहां जाना, कहां रुकना सब तय करके सारी सहूलियत और सामान उठाये फिरना....कामनाओं को ओढ़कर निकलना...धारणाओं को दृढ़ करते जाना...यह सब सार्थवाहों की यात्राएं हैं। कहीं जम जाना...जकड़ में बंध जाना ही इनकी नियति हो सकती है। यही उनका लक्ष्य हो सकता है।
सार्थवाहों को एक दिन 'बड़ी सराय' देखकर समर्पण कर देना है।
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