कृष्ण 'होना' हैं, 'बनना' नहीं।
कृष्ण बीइंग (होना) हैं, बिकमिंग (बनना) नहीं। बीइंग इज रियलटी, बिकमिंग इज फैलेसी। 'होना' सत्य है, 'बनना' भ्रम। व्याख्या भी बिकमिंग की होती है, बीइंग तो व्यवहार है। बीइंग तो स्वभाव है, सहज घटता है। बीइंग विज्ञान है।
व्याख्याएं अप्राप्य की होती हैं, कृष्ण तो सर्वव्याप्त हैं। उनकी क्या व्याख्या करना। लीलाओं से कृष्ण नहीं हैं, बल्कि कृष्ण हैं इसलिए लीलाएं होती रहेंगी।
कृष्ण का समत्व-बोध स्व'स्वरूप'संधान है।
कृष्ण को चुनना सम्पूर्ण का चयन है। इसमें रास, रंग और रण सब शामिल है। सुविधानुसार किसी एक का चयन नहीं। कृष्ण में कुछ छोड़ने लायक है ही नहीं, परिष्करण की शिखरतम प्राप्ति... जहां अनावश्यक कुछ नहीं रह जाता।
कृष्ण कोई रूप नहीं, प्रवाह हैं। दिने दिने नवं नवं... हर बार का नयापन अनछुआ.... अनाघ्रातमं पुष्पं..!
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।
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