लगन की बारिश
बनमुर्गियों की आसमानी समझ अच्छी होती है। उनका रडार बहुत ही सटीक होता है। कल शाम को जैसे ही बादलों की आमद दर्ज हुई, बनमुर्गियों ने सायरन बजा दिए थे। जैसे-जैसे बादलों की पातें सजती गईं, बनमुर्गियों का स्वर अधिक सघन व तेज होता गया। दादुर आज भी कोरस कर रहे थे, फोकस में श्वेत श्याम बनमुर्गियां ही थीं।
पपीते हथेलियां पसारे इंतजार ही कर रहे थे, जैसे जीमने के बाद हाथ धुलाने के लिए मेहमान धार के नीचे हथेलियां पसार देता है। केले में ऊपर एक पत्ता निकला था, अंजोरी के आकार का। वह घोषणा थी कि प्यास अब असहनीय हो गई है।
इतने में बादलों ने बरसना शुरू किया। मेरी नजर पड़ी ताजे और कोमल अमलतास के पत्ते पर। वह अपनी धुन में रमा था, पेंडुलम की तरह एक आवृत्ति में हिल डुल रहा था। जब बूंदे उससे टकराईं तो सिहर उठा। लेकिन जल्दी ही उसे आनंद आने लगा, और उसने हिलने की आवृत्ति बदल ली।
बारिश हो रही है। धार महीन लेकिन लयबद्ध। बादल जैसे एक दूसरे से कह रहे हों कि हां! संभाल के बरसो, दिनभर बरसना है। और जब इस संभालने की परिणति में कभी धारें लुप्त हो जातीं, तो बादल कहते, 'लय टूटनी नहीं है और तत्काल नया आलाप ले लेते। सुर उठने लगते।'
साइकिल की चाल, मद्धिम आंच, नीचे का सुर और महीन फुहारें यह सब 'सिद्ध' हो जाने की गतियां हैं। आज की फुहारों में मघा सा प्रहार नहीं है, आघात नहीं है--हेमंत के हिमपात सा आक्रमण नहीं है। इसमें बौछारों सा रोमांच है। जैसे कहीं खुले मैदान के एकमात्र खोखे में शरीर बचाते नायिका को झरोखों से बारिशें छेड़ रही हों----और उघरे बदन पर टकराकर बौछारें टूटकर बिखर जाती हों। यही स्पर्शबोध बोध भी है---छूकर बिखर जाना।
पेड़-पौधे यूं सहलाये और नहलाये जाने का आनंद ले रहे हैं। पखेरू भी घूम टहल रहे हैं। अभी दो महोक खिड़की पर आए थे। कुछ बूंदियां (नुक्ती की) पड़ी थीं, उसी से उनका आतिथ्य-सत्कार हुआ। अपनी भाषा में कुछ कहकर चले गए। शुग्गे चहक रहे हैं, तख्त के नीचे कोई मेचकुरी बोल रही है। बया निगाहों को चकमा देकर ठिकाने बदल रही है। बुलबुल का कंठ आज ज़्यादा लाल है।
खिड़की पर ही पूरी रात बीत गई और आधा दिन। अभी छत से गांव का कुछ दृश्य कुछ ऐसा दिखा----
आज बड़ी जोरदार लगन है। महिलाएं टहल में लगी हैं। लेकिन दोनों हाथ कुछ करने की स्थिति में नहीं है। एक हाथ में साड़ी की चुनहट है--कीचड़ से बचाने को, दूसरे में घूंघट---जोकि बरसाती की तरह प्रयोग हो रहा है।
आंगन के बीचों-बीच बनी ईंटों की पगडण्डी पर बदन सम्भालकर चलने में सर्कस सा रोमांच है। साथ ही उसका यातायात प्रबंधन भी है। इस छोर पर पैर रखने से रखने से पहले यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि उस छोर पर कोई आ तो नहीं रहा। 'एक्सीडेंट' बचाते हुए चलना है। माडव के ऊपर तानी गई तिरपाल पर कई वलय और कई घाटियां बनी हुई हैं। यह घाटियां सदानीरा की तरह रसगर्भ हैं।
(19 मई 2020)
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