होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी!

होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी! नदी की ओर बढ़ती सीढ़ियां खत्म हो गई हैं, वहीं एक घुटने भर ऊंची दीवार बनी है। दीवार, फांट और घाट का सीमांकन है। सीमा रेखा है, स्थिरता और प्रवाह की। इसी अंतिम सीढ़ी पर खड़ी हो नायिका प्रवाह को देख रही है। उसके बाईं तरफ दोगुनी ऊंचाई के खंभे पर प्रकाश जल रहा है। मचलती-लोटती लहरें पानी की सतह पर कितने ही वलय बना रही हैं। जैसे एक सिरे से मुक्त हो उड़ती चूनर पर हवा के दाब से कामदगिरि सी संरचना उभरती, मिटती है।  दिवसावसान को पहर भर बीत जाने के बाद सब कुछ शीतल और शांत है। वहां ध्वनि का एक ही हस्तक्षेप है, स्टीमर का हॉर्न--जो निश्चित अंतराल पर हूंउउउं करके स्थिरता को भेदता है। वह हॉर्न जैसे, मन के ही हूक की प्रतिध्वनि हो।  नायिका मूर्तिवत खड़ी है। हलचलों के बाद स्थिर होने की कोशिश करते प्रवाह के सतह के साथ खुद को समायोजित करते हुए। जैसे, वह उन छोटे हो रहे वलयों के बीच खुद को खोज रही है, फिर साध रही है खुद को ऊपर से--जबकि भीतर वेग है, उद्वेग है। तभी नायक के आने की आहट पाकर वह आधी मुड़ती है। लैम्पपोस्ट के प्रकाश से उसका चेहरा प्रभामय हो उठता है।  ......दोनों विपरीत दिशा में मुंह करके चुपचाप बैठे हैं। दोनों चुप हैं इसलिए नहीं कि उनके पास कहने को कुछ नहीं है। बल्कि इसलिए कि उनके मन में तमाम सद्यः प्रसूत भाव हैं, यही उनकी चुप्पी का कारण है। शुरुआत के लिए किस भाव को चुनना है यह तय करना कठिन है, जैसे वसंत में सब ओर खिले बहुरंग फूलों में से एक को चुनना। ........आरम्भ हमेशा कठिन होता है। उधर, स्ट्रीमर की चिमनी से उठता धुआं तेज हो गया है और एक लंबी हूँउउ छोड़कर वह चल पड़ा है। नदी की देह कसमसा उठी है, लहरें बेचैन हैं।  लेकिन, धारा के बीचों बीच हिचकोले सहकर भी एक नाव स्थिर है। नाविक, नाव पर बनी छावन में अलाव जला रहा है। अलाव की आग तेज करने को वह फूंक मारता है। लपटें धधक उठती हैं। वह लपटे ऐसी उभरी हैं जैसे उसके सुर उभर आये हों। वह लंबी आलाप लेता है...सुन मेरे बंधु रे! इधर, दोनों (नायक-नायिका) ऐसे चौक पड़ते हैं जैसे उनके मन की बात किसी तीसरे ने कह दी हो। वह पुकार जैसे उनके ही मनोभावों का निर्वचन हो। नाविक की आवाज मद्धम होती है.....सुन मेरे साथी रे।  इधर नायक बोल पड़ता है।  'सुनो सुजाता! मैंने एक सपना देखा है।' कैसे सपना? नायिका उत्सुकता से पूछती है।  'तुम्हारे जूड़े में चंद्रमलिका का फूल। माथे पर लाल चंदन की बिंदिया। चमकई रंग की साड़ी पहने तुम सुंदरता की मूर्ति बन मेरे सामने खड़ी हो। बताओ भला इस सपने का क्या मतलब हुआ? 'इसका मतलब कि तुम सुंदर हो।' 'बात को यूं उड़ा मत दो सुजाता, बताओ इस सपने की तरह तुम मेरे जीवन में कब आओगी!' जब तुम चाहो....कहकर नायिका नायक के वक्ष पर झूल जाती है।  तभी जैसे उनके मनःस्थिति का वर्णन करते हुए पंक्तियां धारा के बीच से ही फिर उठती हैं-- होता तू पीपल, मैं होती अमरलता तेरी। तेरे गले माला बनके पड़ी मुस्काती रे.....सुन मेरे साथी रे। सुन मेरे बंधू रे, सुन मेरे मितवा, सुन मेरे साथी रे।  धारा में खड़ी नाव को दो नाविक आगे और पीछे खेने लगते हैं। नाव किसी अनजान दिशा की ओर चल पड़ती है, जैसे साझे बल से जीवन बह पड़ता है अनजानी परिणति की ओर। नाव गुजर जाने से लहरें फिर बेचैन हैं, और नायिका के पैर पर हौले से थपेड़े मारती हैं, फिर लौट जाती हैं.......धारा के साथ बहने को।  विपरीत दिशा में लंबी हूँउउ के साथ फिर स्टीमर की आमद हुई है।

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