पूर्वैरप्यकृतं....कृतं
भारत का समाज सदियों से खंडहरों में उलझा है। वह वहीं ठहर गया है। कुछ घाव ऐसे हैं, जिन्हें वह देखता है रोता है लेकिन उनका उपचार नहीं करता---या करना नहीं चाहता। प्रति पल भग्न होते उन अवशेषों में उसका 'स्व' क्षरित होता जाता है, अलबत्ता वह उन्हें गौरव कहकर प्रसन्न होता है। भव्य भवनों व ऊर्जा केंद्रों के भग्न रूपों को 'गौरव' बताती सैकड़ों पोस्ट आंखों से गुजर जाती हैं। उसपर गर्व करने वाले हजारों और उसकी स्थिति को लेकर शिकायत करने वाले लाखों भी उसी पोस्ट के सापेक्ष गुजरते जाते हैं। लेकिन, वह गुजरना कभी गुजरता नहीं। उसकी आवृत्ति होती रहती है। आगे बढ़ने को, जो अनिवार्य संतोष चाहिए होता है, उससे यह समाज वंचित हो गया है। अलबत्ता उसे शिकायतों का संत्रास झेलना ही बदा है। हर कोई बता देता है कि उसके 'बिखरे अस्तित्व', 'विपन्नता' व 'उचाट मन' का कोई दोषी 'वह' है। उसने अपनी स्व की सत्ता में हर हस्तक्षेप का श्रेय किसी न किसी को दे रखा है। स्वयं न कोई जिम्मेदारी ली है, न जवाबदेही। शिकायतों का सरोवर कभी सूखता नहीं, आत्मावलोकन होता नहीं। दी...