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राम: समग्र के साथ स्वयं की महाभावमयी चेतना

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लोकाभिराम राम का चरित्र बहुआयामी है। भारतीय चिंतन में कोई एकांगी, एकमुखी चरित्र मर्यादा पुरुषोत्तम हो ही नहीं सकता। राम अनेकों संबंध-संवेगों की कसौटी तो हैं ही, संबंध-संवेगों का जो कुछ भी अनभिव्यक्त है, वह भी राम से प्रकाशित होता है। वह न्याय और धर्म का अधिष्ठान हैं, इसलिये अयोध्या के शास्ता हैं। इतिहास में राम नीतिमान राजा हैं, शास्त्रों में नाराणावतार। राम की लोक में व्याप्ति ब्रह्म के रूप में हैं, और वह लोक चेतना के पर्याय हैं, यहां शास्त्रीय स्वीकार्यताओं का नकार भी नहीं है। लोक के लिए राम राजा ही नहीं, आचार्य भी हैं। अनुशासन का दायित्व आचार्यों का ही होता है---इसी लिए लोक का संकल्प है, ‘जाही‘विधि’ राखें राम, ताही‘विधि’ रहिये।‘ लोक में बच्चा-बच्चा राम है।  राम लोक के हर मंगल, शुभ व शिव का पर्याय हैं लेकिन यह उनकी परिधि नहीं है। लोक के गीतों में विवाह के समय सजकर खड़ा हर दूल्हा ‘रामचंद्र’ का ही प्रतिरूप है, और वसंतोत्सव में होली भी रघुबीर ही खेलते हैं। जो लोग अवध प्रान्त के लोक-जीवन से परिचित होंगे, वह जानते होंगे कि आप किसी व्यक्ति को एक काम सौंपे, लेकिन उसे ऐसा नहीं करना है, तो...