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संगीत व साधुता की पारमिता थे बाबा गौरीशङ्कर

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  अयोध्या ने अपने उपेक्षाकाल में अनके सिद्ध संत व साधक दिये, जिनसे आम जनमानस अजनबी है। इसमें से अ​धिकतर साधक व संतों ने रामनगरी के पुर्नजागरण से पूर्व ही स्वयं को समेट लिया या असीम से सायुज्य पा लिया। बाबा गौरीशङ्कर उनमें से ही एक थे। बाबा गौरीशङ्कर को अयोध्या की संगीत परंपरा का प्रतिष्ठापक कहा जाता है। किशोरावस्था में ही वैरागी बन गये गौरीशङ्कर ने करीब सात दशक तक अयोध्या की संगीत परंपरा का प्रवाह अक्षुण्ण बनाये रखा और उसे वेग दिया। उन्होंने मार्गी गायन परंपरा को नई ऊंचाई दी और अनेक सिद्ध ​शिष्य तैयार किये। कन​क बिहारिणी व बिहारी जू की उपासना में उन्होंने अपने को सौंप दिया था और फिर पूरे जीवन बस भगवान के लिये ही गाया। लंबे समय तक तो वह बस कनक भवन में ही गाते रहे। उन्होंने व्यावसायिक मंचों पर गाने से दूरी बनाये रखी। अपनी मस्ती में प्रसिद्धि की कोई परवाह न की। सरयू और भगवान राम उनके आजीवन आलंब रहे, इसलिये दूसरा नगर भाया नहीं। वह देश के विभिन्न स्थानों की यात्रा करके फिर अयोध्या लौट आते। यहीं के चना, चबेना और सरयूजल से उन्होंने जीवन भर की साधना की। कनक बिहारिणी व बिहारी जू सरकार की यु...