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ओशो: कहने में भेद हैं, भ्रम हैं..'बनने' में आडंबर है। लेकिन, इनका  'होना' अभेद है।

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     आचार्य रजनीश की आज जयंती है। मुझे यही नाम अच्छा लगता है, आचार्य रजनीश। वही पन अच्छा लगता है, जब वह आचार्य रजनीश थे। भगवान 'बनने' और ओशो (समुद्र भाव) हो जाने की घोषणा में कुछ अपूर्व नहीं था, यह सब पूर्व में दोहराई गई थीं। अपूर्व थी रजनीश की वह दृष्टि जिससे उन्होंने उपनिषदों से लेकर पलटू और रज्जब तक की टीकाएं कहीं। और, यह दृष्टि इनके उसी पन की देन है जब वह आचार्य रजनीश थे.....चार्वाक, निर्दोष और स्त्रैण।  मैं यह पोस्ट एक प्रश्न के जवाब में लिख रहा हूँ, 'आचार्य रजनीश का मूल्याङ्कन क्या हो ?' उनकी कही बातें या उनका 'होना'!  कही गई बातों की कसौटी उनके अनुयायी हैं, उनका कम्यून है। अलग रङ्ग और ढंग के समूह बनने के अलावा उनके सन्यासियों के पास क्या है? कुछ नहीं।       रजनीश कहते थे कि मेरे शब्दों के अंतराल में मुझे खोजना, लोगों ने इसे भी एक कोट से अधिक कुछ समझा नहीं। इसी कारण रजनीश के प्राप्ति की परछाई भी उनके अनुयायियों को नसीब न हुई।  रजनीश के बोलने में जितना आत्मविश्वास दिखता है, उतना ही पश्चाताप भी। वह जानते थे कि जिसे वह कह रहे है...