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परशुराम का परशु प्रतीक है, पर्याय नहीं।

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शस्त्र का अधिकार उसे है, जिसके हृदय में न्याय स्थापित है। जो शास्त्रों की शाश्वतता को स्वीकारता हो, शस्त्र का सम्यक उपयोग वही कर सकता है।  वही समझ सकता है कि वीरता पाशमुक्ति है, पाशबद्धता नहीं। मुक्ति का संघर्ष 'अधिकार की कामना' न बन जाए, इसका आश्वासन 'महावीर' ही दे सकता है। परशुराम की न्याय प्रतिबद्धता ऐसी है कि उन्होंने स्वयं के हृदय में तो न्याय की स्थापना की ही, इसे समाज तक प्रसारित किया। साथ ही ऐसे लोगों को शस्त्रविद्या से सम्पन्न किया जिनकी न्याय प्रतिबद्धता असंदिग्ध थी।  परशुराम का परशु प्रतीक है, पर्याय नहीं। उन्हें संहारक के रूप में नहीं, उद्धारक के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि न्याय की अवधारणा तब तक असिद्ध है जब तक 'दुष्कृताम्' के विनाश के साथ 'साधुओं का परित्राण सुनिश्चित न हो।  परशुराम ने एक आतताई का विनाश किया तो दस सद्चरित्रवान योद्धाओं को प्रतिष्ठित किया। एक 'दूषित' नगर का ध्वंस किया तो हजारों गांव बसाए। उनका संघर्ष मुक्ति के लिए था, कुछ पाने के लिए नहीं। इसीलिए उन्होंने जीती हुई भूमि पर शयन तक नहीं किया। स्वयं सागर से मिली भूमि पर बसन...