पूर्वैरप्यकृतं....कृतं

     भारत का समाज सदियों से खंडहरों में उलझा है। वह वहीं ठहर गया है। कुछ घाव ऐसे हैं, जिन्हें वह देखता है रोता है लेकिन उनका उपचार नहीं करता---या करना नहीं चाहता। प्रति पल भग्न होते उन अवशेषों में उसका 'स्व' क्षरित होता जाता है, अलबत्ता वह उन्हें गौरव कहकर प्रसन्न होता है। भव्य भवनों व ऊर्जा केंद्रों के भग्न रूपों को 'गौरव' बताती सैकड़ों पोस्ट आंखों से गुजर जाती हैं। उसपर गर्व करने वाले हजारों और उसकी स्थिति को लेकर शिकायत करने वाले लाखों भी उसी पोस्ट के सापेक्ष गुजरते जाते हैं। लेकिन, वह गुजरना कभी गुजरता नहीं। उसकी आवृत्ति होती रहती है।


    आगे बढ़ने को, जो अनिवार्य संतोष चाहिए होता है, उससे यह समाज वंचित हो गया है। अलबत्ता उसे शिकायतों का संत्रास झेलना ही बदा है। हर कोई बता देता है कि उसके 'बिखरे अस्तित्व', 'विपन्नता' व 'उचाट मन' का कोई दोषी 'वह' है। उसने अपनी स्व की सत्ता में हर हस्तक्षेप का श्रेय किसी न किसी को दे रखा है। स्वयं न कोई जिम्मेदारी ली है, न जवाबदेही। शिकायतों का सरोवर कभी सूखता नहीं, आत्मावलोकन होता नहीं। 

    दीनता का भी जब मंडन होने लगता है तो संपन्नता का सान्निध्य कैसे मिले! 

पीड़ित होना भी एक मेरिट है, जहां परमुखापेक्षा अधिकार बन जाती है। सारी शिथिलता व विधर्मिता क्षम्य हो जाती है। हालांकि, 'अपराधी' की खोज पीड़ित के पौरुष की जय नहीं हो सकती। लेकिन उसी में जय देखा जा रहा है। 

    ऐसा नहीं है कि इस समाज को उद्धारक न मिले। लेकिन, जो सुख सारी असफलताओं का भार दूसरे पर फेंक 'दीन' बन जाने में है वह और कहां! उद्धार को तो उद्धत होना पड़ेगा। -------उठो जागो और लक्ष्य पाकर ही रुको का उद्घोष....'क्षुरस्यधारा निशिता दुरत्यया' पर ठिठक जाता है। 

    अब तो, यह समाज उद्धारकों से अधिक 'वेदना के व्याख्याकारों' को सेलिब्रेट करने लगा है। 

    पिछली पूरी सदी वेदना के व्याख्याओं की रही है। पूरे सौ साल में पीड़ा की अभिव्यक्तियां ही मुख्यधारा का साहित्य रहीं। इतिहास भी इनसे बच न सका। 

    'पीड़ा की अभिव्यक्ति पीड़ित ही करती है।' 

इसीलिए आज तक हम प्रतिबद्ध न हो सके। उल्टे हम वेदना में धंसे जाते हैं।

    वेदना के व्याख्याकारों के आख्यान से मिलता है क्षणिक उद्वेग व दीर्घकालिक आत्महीनता....जोकि सांद्र होती जाती है। मैं देखता हूं कि प्राचीन मंदिरों पर लिखी पुस्तकों-वीडियो में वेदना की व्याख्या, भग्न की अभिव्यक्ति और अथाह शिकायतों के सिवाय और क्या है! वह प्रासाद जिस स्थापत्य व विज्ञान की अभिव्यक्ति हैं वह तो अक्षुण्ण है। उस अक्षुण्णता का गर्व नहीं दिखता, गिरती ईंटों की पीड़ा ही दिखती है। 


    अब तो समाज वेदना की व्याख्या को ही उपचार समझने लगा है। किसी को यह बताते रहे हो कि उसने अतीत में कितनी मार खाई है, और वह गौरव के तौर पर खंडहरों को देखे तो कैसे वह नवनिर्माण को संकल्पित हो सकेगा!

    वेदना के व्याख्याकारों के पास कोई अंगुलि निर्देश नहीं है कि यह कारा टूटे कैसे! इससे पार कैसे जाया जाए।

    जो लोग रोते रहते हैं कि प्रहारों में परंपराएं टूट गईं, उन्हें पता होना चाहिए कि, परंपराएं अक्षुण्ण हैं प्रवाह के संबंध में, रूप के संबंध में नहीं। रूप तो बदलता ही रहेगा। 

    अरूप साकार होगा फिर विरूपित होगा। लेकिन, उन घावों को कब तक निधोला रखा जा सकता है। भग्नता को यथारूप कब तक बनाये रखा जा सकता है। तत्त्वों की अपरिवर्तनीयता व पर्याय की परिवर्तनशीलता आपस में इतना उलझ गये हैं। कि 'परिवर्तन के उन्मादी' तत्व भी बदलने को आमादा हैं और दूसरे पर्याय में भी कोई परिवर्तन नहीं चाहते।  खैर, जिस अयोध्या मंदिर को मीरबाकी ने तोड़ा उसे मेघसुत ने बनवाया था। मेघसुत से पहले भी वह बना हुआ था, लेकिन उसने उसे नया रूप व आयाम दिया। मेघसुत ने अपने शिलालेख में
लिखवाया ' पूर्वैरप्यकृतं कृतं'---पहले जैसा था उससे भी भव्य बनवाया। भव्यता के इस आयाम तक लाने को उसने निश्चित ही पुराना बहुत कुछ तोड़ा होगा। वह न भी तोड़ता तो नश्वरता का शाश्वत सत्य उन्हें तोड़ता। 

    हर साकार का अरूप हो जाना निश्चित है, ताकि वह नया आकार ले सके। 

    बचपन में आजी (दादी) पैरों पर झुलाती थीं, तो कोई गीत गाती थीं। उसकी दो पंक्तियां चित्त पर चिपक गईं। पुरान भीत गिराइत है, नई भीत उठाइत है---नई भित्तियां उठा रहा हूं, पुरानी भित्ति गिरा रहा हूं। भित्ति यानी दीवार। पुरानी भित्ति अतीत का आयाम। भित्ति गिराना यानी आयाम का विस्तार करना। नई भित्ति बनाना माने नये आयाम रचना। इसी तरह की मिलती जुलती पंक्तियां हम सबने सुनी हैं। बचपन से हमें संकेत दिया गया है कि किसी को अंतिम मानकर बैठे नहीं रहना नहीं। 

    मेघसुत का 'पूर्वैरप्यकृतं' ही समाधान है। टूटना, नया रूप देने का अवसर है। बिखरना, सहेज के नये साकार की संभावना है। जिसे कोई नहीं तोड़ता वह भी यथावत नहीं। भग्न कोई प्रासाद नहीं, हमारे भाव हुए हैं। नई भित्ति बनाने को पुरानी टूटनी हैं, चाहे उसे विध्वसंक तोड़े या शिल्पी। टूटने के पीड़ा की व्याख्या नहीं, निर्माण का विज्ञान हमारा सत्य है।

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