बल की विस्मृति से ही हनुमान ज्ञानियों में अग्रणी हैं।
शक्ति उसी को शोभती है, जिसके हृदय में न्याय स्थापित हो। हनुमान के हृदय में
न्याय-विग्रह राम स्थापित हैं। इसलिए, वह शक्ति के अधिकारी हैं। योद्धा वही सिद्ध
है जो शस्त्र को अंतिम विकल्प माने, क्योंकि उसकी भयावहता का सटीक भान योद्धा को ही
होता है। वही जानता है कि शस्त्र प्रलय का ही विस्तार करेंगे, उनसे सर्जना
अनपेक्षित है। हनुमान सिद्ध योद्धा हैं, जहां मुष्टि प्रहार (मुक्के) से काम चल
जाता है वहां पग प्रहार नहीं करते। जहां पग प्रहार से काम चल जाता है, वहां गदा का
प्रयोग नहीं करते। हनुमान में छलांग भर में सागर पार जाने का बल और वेग है, हिमालय
की चोटी उखाड़ लाने का सामर्थ्य है, वह चाहें तो लंका द्वीप को कटोरे की तरह समुद्र
में उलट दें...तब भी वह सहज घट रही परिणतियों को प्रभावित नहीं करते। वह देखते हैं
कि लंका के जल जाने का आयोजन तो राक्षस मिलजुल कर स्वयं ही कर रहे हैं। उसे जला
डालने भर का कपड़ा और तेल वह स्वयं ही संचित कर रखे हैं, उन्हें तो बस उस आग को उचित
स्थान दिखा देना है। जैसे, सर्वशक्तिमान केशव कालयवन को मुचकुंद की गुफा तक पहुंचा
देते हैं, जिनकी आंखों में उसे भस्म कर देने वाली ज्योति पल रही है। अतुलित धाम
होने के साथ हनुमान ज्ञानियों में अग्रणी हैं। उनका सामर्थ्य सत्य का भासित रूप है।
बल की विस्मृति ही उन्हें ज्ञानियों में अग्रणी बनाती है। बल की सतत स्मृति न्याय
में बाधा है और अन्याय व शोषण की पूर्व पीठिका है। हनुमान का बल पाशमुक्ति का
संकल्प है। वह मुक्त करते हैं, पाशबद्ध नहीं करते...इसीलिए महावीर हैं। आञ्जनेय
शरणम् मम।

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