वे आशीष जो मैंने चुने--- मेरी मां ने दोहराये।

मां, जैसे माटी की सतह पर माटी से बनी मेड़, जो 'सबको मिले' की कामना लिए स्वयं वंचित रह जाती है...प्यासी रह जाती है।  अलबत्ता, बहाव को साधने व सबको सुलभ कराने के प्रयास में प्रत्येक आवृत्ति में थोड़ी भीगती है तो अधिक छीजती है। घटती-कटती, अपनी स्थिति को साधती....लेकिन 'सबको मिले', 'सम्यक मिले' की भावना को जीती बनी रहती है...शीत, तुषार, पदाघात सहकर भी। मां मेड़ जैसी है, मेड़ नहीं। मां, संतान को सींचती है और संतान से सीखती भी है।  वस्तुस्थिति बताकर अम्मा का यह कहना कि अब तुम बता दो कि इस विषय में क्या करना चाहिए...उनकी अपने पोषण पर आश्वस्ति नहीं, तो और क्या है!  विपन्नता से जूझकर पली संतानों के लिए संपन्नता को अनुष्ठान करती मां....संतान की गति समझकर अपनी प्रार्थनाएं भी मोड़ लेती है।  एक रोचक बात याद आई, चित्रकार बनने के तमाम प्रयासों से असफल एक लड़का मेरे पास आया। उसने अपनी सारी बातें कहकर मुझसे मार्गदर्शन मांगा। मैंने उससे कहा कि अपनी मां से कहना कि अपना आशीष बदल लें। उनका आशीष तुम्हारी भावना को दूसरी दिशा में धकेलता है, यही द्वंद्व तुम्हें सिद्ध होने से रोकता है।  अम्मा भीतर से यह सुन रही थीं। उसी शाम चाय पकड़ाते हुए पूछा, "मुझे तो समझ आता नहीं कि तुम्हें क्या आशीष देना चाहिए। मैं तो सबके लिए एक ही बात दोहराती हूं, लेकिन तुम्हारी स्थिति और दृष्टि बहुत भिन्न है। मैं सब समझ नहीं सकूंगी लेकिन तुम एक वाक्य में बता दो कि तुम्हें क्या आशीष देना चाहिए।" कोई कल्पना कर सकता है कि उस समय किस तरह की भावात्मक तीव्रता मुझसे टकराई होगी!  मेरी मां अनुरोध कर रही थी, 'अपने लिए आशीष चुन लो।'  मैंने अपने लिए आशीष चुना। अम्मा अब उसे ही दोहराती हैं।  यह उसी क्षण अम्मा द्वारा खींची गई तस्वीर थी। उनके हाथों उतारी गई पहली तस्वीर। उन्होंने पहले प्रयास में इसे उतारा और मैंने संभाल ली। जब इसे देखता हूं, वही भावात्मक तीव्रता अनुभव करता हूं। हो सकता है मेरा अपरिग्रही चित्त यह चित्र भूल जाये, तस्वीर मिट जाए। लेकिन, वे आशीष अक्षय हैं। जो मेरे लिए, मेरी भावनाओं के लिए, मैंने चुने---और मेरी मां ने दोहराये।

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