तरलता को ताप चाहिए।

धारा में बहना, बहने वाले का न तो चयन हो सकता है न ही नियति। धारा में किसे बहना है, यह धारा का ही चयन है। प्रवाह अपने साथ उसे ही बहने देता है--- जिसमें ताप हो, गति हो। ठंडी वस्तुओं को वह यूं ही छोड़ बह जाता है, निष्प्राण और शुष्क वस्तुओं को किनारे पर लगाता जाता है।  प्रवाह सबको नहीं स्वीकारता। किनारे पर संयोजित निष्प्राण, तापहीन वस्तुएं इसका प्रमाण हैं। वह उसे ही स्वीकारता है जिसमें गति की अनुकूलता है... तरलता है....ताप है।  यमुना तट पर बैठा हूं। पत्तियों को धारा में फेंक देने पर भी कुछ समय पश्चात व किनारे लगा दी जाती हैं। उन्हें किनारे छोड़ पानी लौटकर प्रवाह हो गया है। वहीं जब कुछ पत्तियों पर बाती रखकर दीप जला दिया है तो किनारे पर प्रवाह विपरीत होने के बावजूद....धारा धीरे-धीरे उसे अपने में स्वीकार लेती है। झूलते, डोलते, दीप धारा के अङ्क में समाता जाता है...फिर अन्तस स्पर्श पाकर वेगवान हो जाता है। मैं यह दृश्य देख रहा हूं...इसे दोहरा रहा हूं.. तरलता के अंतस में ताप होता है...तरलता को ताप चाहिए।  (12 दिसंबर 2022, यमुना तट दिल्ली)

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