पदचिह्न पकड़ लेने से सिद्धियां नहीं साधी जा सकती हैं
साधुता का परंपरा से कोई अनिवार्य संबंध नहीं है, न ही धार्मिकता का किसी पंथ से। लोकपंथाध्यास किसी के मुक्ति की गारंटी नहीं है, न पंथमुक्तता उसके मुक्ति की बाधा है।
किसी के पदचिह्न पकड़ लेने से उसकी सिद्धियां नहीं साधी जा सकती हैं। जो 'मार्ग पा लिया' कहकर किसी के पीछे दौड़ जाते हैं, उन्हें हताशा ही मिलेगी। कोई मार्ग, मंजिल की गारंटी नहीं है। जो पूर्ववर्ती प्रतिज्ञाएं दोहराते हैं, उनका तो खैर... मतिभ्रमणकारकम् वाली स्थिति है।
वैसे भी, मानव ने अपने सभ्यता के इतिहास में सबसे अधिक जलयात्रा की है। जहां कोई मार्ग तो दूर लकीर भी नहीं उभरती। लेकिन लोग पहुंचते रहे हैं...अपने गंतव्य तक। 'मार्ग का मोह' या 'परिवर्तन का उन्माद' भटकाता ही है। वह कहीं पहुंच नहीं सकते। क्योंकि, कसौटी मार्ग नहीं पथिक है।
किसी का स्व'धर्म त्यागकर दूसरे पंथ में चले जाने पर न तो मुझे विषाद है, न ही किसी के लौट आने की प्रसन्नता है। क्योंकि 'पंथ' कोई प्रिवेलेज नहीं हैं, जैसा कि बताया जा रहा है। बल्कि वह संकेतक है, अब तक की यात्रा का। बेटन कहां से उठाना है, इसका प्रशस्त बिंदु है।
अलबत्ता, हो इसके विपरीत रहा है।
'शांति' का अर्थ धारण करने वाले पंथ के सभी अनुयायी शांति दूत हो जाते हैं। वैसे भी वह पंथ का अनुवर्तन कर शांति स्थापना की प्रतिबद्धता नहीं दिखाते बल्कि उस अर्थ की आड़ में अपने सभी उपक्रमों को 'शांति' सिद्ध करने लग जाते हैं।
इसी तरह, घृणा उगलते और कटार भांजते करुणा'मूर्तियों की भी कमी नहीं। चूंकि वह पांथिक प्रमाणन से करुणा'मूर्ति हैं अतः उनके शस्त्र प्रदर्शन को करुणा की ही अभिव्यक्ति माना जाए! नहीं माना जाएगा तो वह मनवा लेंगे?
धर्म साधना के साथ कर्त्तव्य भी है। यहां अभ्यास और निर्वाह का कोई विकल्प नहीं। इसलिए, 'दल' बदल देने से सत्ता (जोकि वास्तव में असत्ता है) मिल सकती है, सत्य नहीं। वह तो स्व-स्वरूपसंधान से ही संभव है। इस बदलाव-भटकाव से कुछ मिलेगा नहीं और अंत में शामिल'बाजा ही बनना है। समूह के शोर को अपना स्वर कहने के अलावा उनके पास कुछ बचेगा नहीं।
इसीलिए कह रहा हूं, कि जो जा रहे हैं, वह जाएं। उनसे कोई प्रश्न नहीं। जो आ रहे हैं, वह आएं उनका कोई अभिनंदन नहीं। मेरे काम के वह लोग हैं जो चल सकें। 'गर्व से कहो..'। गौरव से चुनो...। यह बाजारू विज्ञापन जैसा लगता है। बनना, चुनना गर्व नहीं। विषय है 'होना'..होने को सहज घटने देना...उसका अनावृत्त होना, फिर जीना।
जो लोग संख्याबल को धर्म की शक्ति मानते हैं, उनसे मैं राजी नहीं। सबसे बड़े पंथ का अनुयायी कहाना कोई गौरव नहीं क्योंकि, जो विचार जितना आरंभिक, सतही और सहूलियत वाला है...सर्वाधिक अनुगमन उसी का होता है। यह कोई मेरिट नहीं है। अलबत्ता जो जितना मौलिक है, वह उतना ही एकाकी है...लेकिन वही सम्पूर्ण है।
(Delhi, 2018)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें