वृक्षों का रूप लौट आया है। 

पतझड़ से पीपल पारदर्शी हो गया था। उसकी सघनता झर गई थी। मैंने रात में उसे देखा, उसपार चंद्रमा उगा हुआ था। संरेखित टहनियों के आर-पार देखा जा सकता था। ज्योत्स्ना की पृष्ठभूमि पर वह टहनियां जैसे उजले कागज पर स्याही से मौसमी घोषणा लिखी हो। पीछे से आवाज आई, 'ठूंठ' में क्या देख रहे हो? मैंने स्वयं से कहा, ठूंठ? नहीं यह तो पीपल का वृक्ष है। सिर्फ पत्तियां ही तो झरी हैं, फिर आ जाएंगी। लेकिन, हां फिलहाल यह ठूंठ है। जैसे नदी की पहचान फांट नहीं जलप्रवाह है। मनुष्य की सफलता द्रव्य-संग्रह है। वैसे ही वृक्ष का रूप पत्तियों से है। कम से कम आंखों ने तो यही मानक बना रखे हैं। खैर, उस दिन मुझे पीपल को यूं देखकर थोड़ा दुःख हुआ था। मैं इस मौसम के बीत जाने की प्रतीक्षा कर रहा था।  बीते शाम इच्छा हुई तो निरंतर धंसती अरावली की श्रृंखला पर उगता सूरज देखने चला गया। तभी मैंने पीपल को फिर निहारा। सुग्गे के रंग के कोमल पत्ते हल्की हवा पाकर अपने शैशव पर इतरा रहे थे। पड़ोस की पाकड़ गुलाबी परिधान ओढ़े खड़ी थी। उसके पत्ते इतने सुकोमल, कि हवा का दबाव पाते ही वह लजा जाते। तो कभी, दोलन कर स्थिर हो जाते। नीम की पतली टहनियां पत्तियों से भार से पुनः वक्र हो चुकी हैं। अर्जुनों की पातें अब कौड़ियों से लद रही हैं। इमली के बूढ़े पेड़ पत्तियों की झालर से तने का खुरदरापन ढाँप रहे हैं।  वृक्षों का रूप लौट आया है।  शाम को लौटते समय फिर मधूक पातों के बीच से गुजरा। पेड़ पर असंख्य कुच आकार ले रहे हैं। उनकी गंध सांद्र हो रही है। मधूक पातें पीछे छूट गईं लेकिन उनकी गंध दूर तक हवाओं के साथ बहती रही। यह गंध पाकर बसंत से उपजी शिकायत दूर हुई।  यूं तो राजधानी में यह मौसम पुष्पों का होता है। वर्ष भर खाली पड़े पटरियों व गोल चक्कर पर इस मौसम में पुष्पों से लदे लाखों पौधे अचानक प्रकट हो जाते हैं। शायद ही कोई रंग व आकार छूटता हो जो इन क्यारियों में न मिले। लेकिन, इनमें कोई महक नहीं होती। इसलिए, यह सुंदर सुमन संवाद नहीं करते। मैं फूलों को उनके रूप से नहीं गंध से पहचानता हूं।  महक न मिले तो फूलों के होने की सनद नहीं रहती। देखना तो' सहिताते' हुए ही सम्भव है। जबकि, पथिक की प्राथमिकता मार्ग हैं। नगरों के मार्ग तो अधिक सजगता की अपेक्षा करते हैं, ऐसे में अगल-बगल निहारना संभव नहीं होता।  जबकि, सुगंध में स्वाभाविक संवाद होता है। गंध की अपनी भाषा है। उसका व्याकरण है। हर गंध के अलग सूत्र हैं, अलग प्रभाव है। नासिका ही नहीं तंत्रिकाएं भी अपने आग्रह के अनुरूप गंध की चाहना रखती हैं।  (Published in 2020)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कवियों में संत हों, संतों में कवि हों

परशुराम का परशु प्रतीक है, पर्याय नहीं।

निर्मल संत: नानकदेव की भेष, भावना और दशम गुरु के वरदान पाए सिखी के सारथी