पाश का पागलपन

रोज-रोज बांधे जाने से बैल का खूंटे से अगाध प्रेम हो जाता है। वह उसे चाटता है, सहलाता है, कंधे रगड़ता है। मुक्त किये जाने के बाद वह स्वतः ही खूंटे पर लौट आता है। ऐसा करने के लिए किसान बैल की सराहना करता है, बैल को निश्चित ही गर्वानुभूति होती है---वह कितना पाबंद है, कितना समर्पित है, परंपरा के प्रति सजग है! लेकिन, इसे आप बैल का मौलिक अधिकार कह सकते हैं?  खूंटे का बंधन बैल ने नहीं चुना है। आरम्भ में उसने भी प्रतिकार किये होंगे। अब वह इसी में खुश है। परंपरा की हों या पैमाने की...आरम्भ में बेड़ियां बलात ही डाली जाती हैं। फिर वही बेड़ियां आभूषण हो जाती हैं। उनकी खनक में वह जीवन का संगीत सुनने लगता है। जब कोई पाशबद्ध मुक्ति के प्रयास छोड़ता है तो यह विद्रूप है, लेकिन वह बंधन का उत्सव मनाने लगता है तो यह त्रासद है।  पाशबद्ध होना, बंधन है दासता नहीं। दासता तो पाश की परिधि को स्वीकार लेना है। पाश का प्रतिकार न करना, दासता है।  पैरों में बेड़ी है, वह पैरों को निश्चित सीमा से आगे बढ़ने में रोकती है। बेड़ी में बंधे पैर बेड़ी की परिधि तक ही बढ़ सकते हैं। लेकिन, वह उस परिधि को स्वीकारते नहीं। जब भी पग उठता है उस परिधि को चुनौती देता है। जंजीरों को झंझोरता है। बेड़ियां सख्त हैं, बलिष्ठ हैं---लेकिन इससे पैरों का प्रतिकार बंद नहीं हो जाता।  जिस दिन पैर बेड़ियों की परिधि में ही डग भरना सीख लेंगे, उस दिन आप दास हो जाएंगे। यह त्रासद है। यही कयामत है।  दास अपनी दासता की परिधि से तनिक बाहर नहीं देख सकता। वह मुक्ति को भटकाव मानकर निंदित दृष्टि से देखता है। इसीलिए, यदि आप बैलों से उम्मीद करते हैं वह खूंटे के विरुद्ध आंदोलन करें, तोते से उम्मीद करते हैं कि वह पिंजरों का प्रतिकार करें...तो आपको निराशा हाथ लगेगी।  पाशबद्ध जब पाश की परिधि को स्वीकार लेता है, तो उसका  पाश से गहरा प्रेम हो जाता है। वह पाश के बिना जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकता। मुक्ति के आनन्द से अधिक सघन है, पाश का पागलपन।

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