सातत्य का संगीत 

पलाश वन को पार कर आया हूं। पत्थरों की लाल चटाई पर वह अबोये वृक्ष जैसे ध्यानस्थ थे--- सजातीयता के संयोजन में होकर भी गहन एकाकी में लीन, दूर-दूर स्थित। बुद्धवत शांति ओढ़े हुए। विरक्त की तरह अलिप्त। जैसे वसन्त से पूर्व अपनी तंद्रा नहीं तोड़ना चाहते। उनसे थोड़ा पीछे विंध्य के सुभग शिखर समतल पर औंधे नाद की तरह सज्जित हैं---अंतर्मुखी। परत-दर-परत चट्टानों के संयोजन से उभरी ओजस्विता देखते ही बनती है। जिन्हें छूने में जीवित देह सा स्पर्श बोध है। उनकी गुफाएं जैसे सांसों की गर्माहट से भरी हैं, और भित्तियां जैसे छुवन से सिहरा हुआ नाभि-देश। यह सब पीछे छोड़ आया हूं। जहां बैठा हूं, सामने उथला लेकिन अहर्निश प्रवाह है। इसकी निरंतरता से पठार की लाल देह और चटख हो गई है। इनका उद्गम वहीं पीछे लेकिन अब भी दृष्टि की प्रसार में स्थित विंध्य के सुभग शिखर हैं, जोकि पसीज रहे हैं। उनके पसीजन की जो बूंदें लड़ियों की रस्सी बनाकर नीचे उतर रही थीं, वही यहां प्रवाह बन बह रही हैं।  विंध्य पिघलकर बह रहा है, लेकिन यह प्रवाह शिखरों के स्वरूप को नहीं भूला है। पठारी तल की अनगढ़ता से प्रवाह में अनगिनत विंध्य-शिखर उभरते हैं....फिर जैसे मुनि अगस्त्य के आदेश का मान रखकर सपाट हो बह जाते हैं। इस प्रवाह की तरह ही कभी विंध्य के उभार का भी सातत्य था।  यह शिखर निरंतर बढ़ रहे थे...ऊपर और ऊपर.....ऊर्ध्वादूर्ध्वतरम्।  प्राचीनकाल में शिखर इतना ऊपर उठ गए थे कि सूर्य के प्रकाश को ही अवरुद्ध कर दिया था, तब मुनि अगस्त्य ने उन्हें अपनी ऊंचाई कम करने का आदेश दिया। तब से यह मुनि आदेश का पालन कर रहे हैं।  जहां यह प्रवाह है, वहां कोई फांट नहीं है, न ही नदियों सी ढाल है। यह प्रवाह खुरदुरी पीठ पर शोणित प्रवाह की तरह है जो देह की वलय पकड़कर बह रहा है। इस पठारी जल में मधु सी महक और मोहकता है, जिससे मैं सिक्त हो रहा हूं। लेकिन, उसमें उतरना नहीं चाहता। इसमें उतरकर लिप्त नहीं होना चाहता।  मैं जानता हूं, 'जो लिप्त है वह लिप्तता की सीमा से तनिक बाहर नहीं देख सकता। मुझे सम्पूर्ण को देखना है, इसलिए तट पर बैठा हूं। साक्षी बन, पलाश वृक्षों की तरह अलिप्त।' प्रवाह के ऊपर श्वेत-श्याम विहग उन्मत्त हो नृत्य कर रहे हैं। वह तेजी से प्रवाह के ऊपर से गुजरते हैं और जल का स्पर्श पा मचल उठते हैं। उनकी आवृत्ति नृत्य का नया शास्त्र रच रही है। मेरे भीतर एक अनुनाद घट रहा है। मैं उसे विचलित नहीं करना चाहता इसलिए चुप हूं। अन्यथा बोलता तो इन पक्षियों से जरूर कहता कि प्रत्युत को पचाना सीखो यूं जरा सा आनंद-स्पर्श पाकर उन्मत्त हो जाना अच्छी बात नहीं है।  यहां बैठे हुए अनुभव कर रहा हूं.. जैसे, उन शिखरों में मेरे ही प्राण बसे हैं। जो औंधा दी गई हैं, वह कामनाएं हैं। उस शांत व अलिप्त देह से भावनाएं पिघल रही हैं, मुक्त हो रही हैं। जीवन प्रवाह बन बह रहा है। प्रवाह  में जो 'सातत्य का संगीत' बज रहा है.....वह जीवन की निरंतरता का गान है....उद्गम से निरंतर पोषित। प्रवाह पर जो वलय बनकर मिट रहे हैं, वह रूप की नश्वरता का 'विजुलाइजेशन' है...जो क्षण क्षण नए रूप को पा रही है...क्षणेक्षणेयन्नवतमामुपैति। यही जीवन का सौंदर्य है। यही जीवन के सत्य का साकार है।  ......चला चल मुसाफिर बहुत दूर जाना।

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