जीने की राह: मनुष्य, इच्छा की सीमा से बहुत श्रेष्ठ है।

मनुष्य में पूर्णता के दो पक्ष हैं, जिन्हें कुछ हद तक अलग करके देखा जा सकता है। ‘होने’ में पूर्णता और ‘करने’ में पूर्णता। यह कल्पना की जा सकती है कि प्रशिक्षण या प्रभाव से, ऐसे व्यक्ति से भी अच्छे काम कराये जा सकते हैं जो व्यक्तित्व के स्तर पर अच्छे नहीं है। यह भी देखा गया है कि घातक जोखिम वाली गतिविधियां अक्सर कायरों द्वारा की गई हैं, भले ही वे खतरे के प्रति सचेत रहे हों। ऐसे कार्य इसे करने वाले व्यक्ति के जीवनकाल के बाद भी मौजूद रह सकते हैं, और उपयोगी हो सकते हैं। बावजूद इसके इसे पूर्णता का पर्याय नहीं माना जा सकता। 

जहां सवाल उपयोगिता का नहीं बल्कि नैतिक पूर्णता का है, हम यह महत्वपूर्ण मानते हैं कि व्यक्ति को अपनी अच्छाई को लेकर सच्चा होना चाहिए। उसका बाहरी अच्छा काम भले ही अच्छे परिणाम देता रहे, लेकिन उसके व्यक्तित्व की आंतरिक पूर्णता का अपना बहुत बड़ा मूल्य है, जो उसके लिए आध्यात्मिक स्वतंत्रता है और मानवता के लिए एक अनंत संपत्ति है, हालांकि हम इसे नहीं जानते होंगे।

अच्छाई एक तरह से अहंकार से बचाव के भाव का ही व्यक्त रूप है यानी हमारे भीतर अहंकार को लेकर कितना दुराव है। अच्छाई में हम खुद को सार्वभौमिक मानवता के साथ पहचानते हैं। इसका मूल्य केवल यह नहीं कि यह हमारे सह-अस्तित्व के लिये लाभकारी है, बल्कि इसका मूल्य इस सच्चाई में है जिसके माध्यम से हम अपने भीतर यह महसूस करते हैं कि मनुष्य केवल एक जानवर नहीं है, जो अपने व्यक्तिगत जुनून और भूख से बंधे हैं, बल्कि एक आत्मा है जिसकी नि:सीम पूर्णता है।


अच्छाई, दुनिया में हमारे स्व की स्वतंत्रता है, जैसाकि प्रेम है। हमें अपने भीतर सच्चे होना है, संसारी कर्त्तव्यों के लिए नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक पूर्ति के लिए, जो पूर्णता के सौहार्द में और शाश्वतता के ऐक्य में है। यदि यह सच नहीं है, तो यांत्रिक पूर्णता को ही आध्यात्मिक मूल्य से अधिक सत्कार मिलता। शाश्वत के साथ सायुज्य का बोध करने के लिए, व्यक्ति को अपना जीवन संपूर्णता में जीना चाहिए यही उसे इससे पार जाने की स्वतंत्रता देता है।


निःसंदेह प्रकृति ने अपने जैविक उद्देश्यों के लिए, हमें मृत्यु से बेखबर रखते हुए जीवन में एक मजबूत विश्वास दिया है। फिर भी, न केवल हमारा भौतिक अस्तित्व, बल्कि वह वातावरण भी जिसे वह अपने चारों ओर बनाता है, मुक्ति के क्षण में हमें छोड़ सकता है; सबसे बड़ी समृद्धि का अंत होता है, शून्यता में विलीन हो जाना। यह भी सत्य है, यद्यपि हमारे सभी नश्वर संबंधों को नाश तय है, तब भी हम उनकी समाप्ति पर उन्हें उनके किये से मुक्त करके अनदेखा नहीं कर पाते। और, यदि हम ऐसा व्यवहार करते भी हैं जैसे कि उनका कोई अस्तित्व नहीं तो केवल इसलिए क्योंकि वे हमेशा के लिए नहीं रहने वाले। उन्हें अपने हिस्से का भरना होगा, अपनी आयु भर बीतना होगा। उन बंधनों को अनदेखा करने की कोशिश करना जो वास्तविक हैं, भले ही अस्थायी हों, केवल उनके बंधन को मजबूत और लम्बा करते हैं। 

हमारे प्राचीन शिक्षकों ने यह बोध प्राप्त किया है कि अस्तित्व महान है। वह नि:सीम है। उन्होंने पाया कि इसके वैभव का कोई अंत नहीं। वह स्वयं का विलय ब्रह्म में ही पाती है। खंडित धारणा, सीमा से बंधी धारणा उसे पूर्णता में नहीं देख सकती। कोई व्यक्ति नागरिक, देशप्रेमी, नगर या देश, या यह बुलबुला जिसे विश्व कहा जाता है—की दृष्टि से उसकी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता।

यह सारे पर्याय, परिभाषाएं और पहचान बहुत सीमित है और इच्छा की परिधि में हैं। जबकि मनुष्य इन सबसे कहीं अधिक श्रेष्ठ है। मनुष्य अपनी इच्छा के विषयों से बहुत श्रेष्ठ है। वह स्वतंत्रता में ही सत (रियल) है। यहां स्वतंत्रता का अर्थ किसी संस्था के तंत्र से मुक्त होना नहीं, अलिप्त होना नहीं, बल्कि स्व की संवेदना में होना है।

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