जीने की राह: एकाकी चुनना सीखें

हमारी सामाजिक संकल्पना का आधार परस्परता है। यह परस्परता मनुष्य केे लिए प्रिवेलज भी है, वहीं उसकी संभावनाओं का एक हद भी। परस्परता के क्रम में ही मनुष्य ने क्षेत्रीय, भाषाई व राष्ट्रीय परिभाषा व समूह से स्वयं को जोड़ा है। संबंधों व उसके पर्यायों से खुद को जोड़ा है। अभ्यास व प्रशिक्षण से मनुष्य ने स्वयं को इन पहचानों व पर्यायों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया है। लेकिन, तब भी उसके भीतर एक स्वाभाविक द्वंद्व जारी रहा है। वहीं समाज के पर्याय व प्रतिमान भी बदले हैं, जोकि लंबे समय से चले आ रहे अभ्यास व प्रशिक्षण से भिन्न हैं। 

इसलिए, सामाजिक व पारिवारिक ढांचे में हुए बदलाव की प्रतिक्रिया में मनुष्य के हिस्से जो एकाकी आई है वह उसके लिए किसी आपदा से कम नहीं है। लंबे समय से वह जिस अभ्यास में रह रहा है उस दृष्टि से देखने पर यह एक बड़ा संकट दिखाई देता है। मनुष्य अपने अभ्यास नहीं बदल पा रहा, न ही बदल रही हैं उसकी सामाजिक अपेक्षाएं। 

दूसरी ओर इस थोपे हुए एकाकीपन से जूझना एक चुनौती बन गई है क्योंकि वर्षों का हमारा अभ्यास इसके विपरीत है। यहां हमारे अभ्यास और अपेक्षा के विपरीत यथार्थ का संघर्ष है। थोपी हुई एकाकी और उससे जूझने व निकलने के विकल्पों ने मनुष्य का जीवन दुरूह किया है।अलबत्ता, हमने अपनी यात्रा में पाया है कि  एकाकी मनुजता को सम्यक व सार्थक रूप से जीने की प्रमुख कारक है। लेकिन, 

वह तब है, जब एकाकी चुनी हुई हो, न कि प्तिक्रियावश आई या थोपी हुई एकाकी; जोकि अपेक्षाओं के विपरीत होने से स्वीकार्य नहीं बन पाती। 


लिप्तता की परिधि से निकलें

आप अपने दैनंदिन को देखें तो पाएंगे कि आपका जीवन प्रेरणा व प्रभाव और उससे आई प्रतिक्रियाओं का एक समुच्चय है। इसमें मौलिकता का अभाव है। हम प्रतिक्रियाओं की ऐसी श्रृंखला में पड़े हैं, जो हमारे अस्तित्व की अभिव्यक्ति को क्रमिक रूप से संकुचित करता जाता है। 

जो जिसमें लिप्त है, वह उस लिप्तता की परिधि से तनिक भी बाहर नहीं देख पाता।  

प्रतिक्रियाओं की श्रृंखला देखने की इस परिधि को संकुचित करती जाती है। जीवन को सम्यक व सम्पूर्ण देखने को इस लिप्तता की परिधि से निकलना जरूरी है। इसमें चुनी हुई एकाकी महत्वपूर्ण है। 




दिन में कुछ घंटे का एकांत 

दिन में कुछ घंटे का एकांत लेने से आप उस प्रेरणा और प्रभाव से बनने वाली प्रतिक्रिया की श्रृंखला से अपने को अलग कर पाते हैं। चुना एकांत हमारे लिए साक्षी होकर स्वयं को देखने का अवसर देता है। हम उस धारा से अपने आप को अलग कर पाते हैं, जहां आप सेल्फ ड्रिवेन नहीं हैं। प्रतिभागी होकर जानने में संकुचन है, साक्षी होकर जानने में सम्यकता है, संपूर्णता है।

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