संदेश

तरलता को ताप चाहिए।

धारा में बहना, बहने वाले का न तो चयन हो सकता है न ही नियति। धारा में किसे बहना है, यह धारा का ही चयन है। प्रवाह अपने साथ उसे ही बहने देता है--- जिसमें ताप हो, गति हो। ठंडी वस्तुओं को वह यूं ही छोड़ बह जाता है, निष्प्राण और शुष्क वस्तुओं को किनारे पर लगाता जाता है।  प्रवाह सबको नहीं स्वीकारता। किनारे पर संयोजित निष्प्राण, तापहीन वस्तुएं इसका प्रमाण हैं। वह उसे ही स्वीकारता है जिसमें गति की अनुकूलता है... तरलता है....ताप है।  यमुना तट पर बैठा हूं। पत्तियों को धारा में फेंक देने पर भी कुछ समय पश्चात व किनारे लगा दी जाती हैं। उन्हें किनारे छोड़ पानी लौटकर प्रवाह हो गया है। वहीं जब कुछ पत्तियों पर बाती रखकर दीप जला दिया है तो किनारे पर प्रवाह विपरीत होने के बावजूद....धारा धीरे-धीरे उसे अपने में स्वीकार लेती है। झूलते, डोलते, दीप धारा के अङ्क में समाता जाता है...फिर अन्तस स्पर्श पाकर वेगवान हो जाता है। मैं यह दृश्य देख रहा हूं...इसे दोहरा रहा हूं.. तरलता के अंतस में ताप होता है...तरलता को ताप चाहिए।  (12 दिसंबर 2022, यमुना तट दिल्ली)

पदचिह्न पकड़ लेने से सिद्धियां नहीं साधी जा सकती हैं

साधुता का परंपरा से कोई अनिवार्य संबंध नहीं है, न ही धार्मिकता का किसी पंथ से। लोकपंथाध्यास किसी के मुक्ति की गारंटी नहीं है, न पंथमुक्तता उसके मुक्ति की बाधा है।  किसी के पदचिह्न पकड़ लेने से उसकी सिद्धियां नहीं साधी जा सकती हैं। जो 'मार्ग पा लिया' कहकर किसी के पीछे दौड़ जाते हैं, उन्हें हताशा ही मिलेगी। कोई मार्ग, मंजिल की गारंटी नहीं है। जो पूर्ववर्ती प्रतिज्ञाएं दोहराते हैं, उनका तो खैर... मतिभ्रमणकारकम् वाली स्थिति है।  वैसे भी, मानव ने अपने सभ्यता के इतिहास में सबसे अधिक जलयात्रा की है। जहां कोई मार्ग तो दूर लकीर भी नहीं उभरती। लेकिन लोग पहुंचते रहे हैं...अपने गंतव्य तक।  'मार्ग का मोह' या 'परिवर्तन का उन्माद' भटकाता ही है। वह कहीं पहुंच नहीं सकते। क्योंकि, कसौटी मार्ग नहीं पथिक है।  किसी का स्व'धर्म त्यागकर दूसरे पंथ में चले जाने पर न तो मुझे विषाद है, न ही किसी के लौट आने की प्रसन्नता है। क्योंकि 'पंथ' कोई प्रिवेलेज नहीं हैं, जैसा कि बताया जा रहा है। बल्कि वह संकेतक है, अब तक की यात्रा का। बेटन कहां से उठाना है, इसका प्रशस्त बिंदु है।  अलबत्ता...

लगन की बारिश

बनमुर्गियों की आसमानी समझ अच्छी होती है। उनका रडार बहुत ही सटीक होता है। कल शाम को जैसे ही बादलों की आमद दर्ज हुई, बनमुर्गियों ने सायरन बजा दिए थे। जैसे-जैसे बादलों की पातें सजती गईं, बनमुर्गियों का स्वर अधिक सघन व तेज होता गया। दादुर आज भी कोरस कर रहे थे, फोकस में श्वेत श्याम बनमुर्गियां ही थीं। पपीते हथेलियां पसारे इंतजार ही कर रहे थे, जैसे जीमने के बाद हाथ धुलाने के लिए मेहमान धार के नीचे हथेलियां पसार देता है। केले में ऊपर एक पत्ता निकला था, अंजोरी के आकार का। वह  घोषणा थी कि प्यास अब असहनीय हो गई है।  इतने में बादलों ने बरसना शुरू किया। मेरी नजर पड़ी ताजे और कोमल अमलतास के पत्ते पर। वह अपनी धुन में रमा था, पेंडुलम की तरह एक आवृत्ति में हिल डुल रहा था। जब बूंदे उससे टकराईं तो सिहर उठा। लेकिन जल्दी ही उसे आनंद आने लगा, और उसने हिलने की आवृत्ति बदल ली।  बारिश हो रही है। धार महीन लेकिन लयबद्ध। बादल जैसे एक दूसरे से कह रहे हों कि हां! संभाल के बरसो, दिनभर बरसना है। और जब इस संभालने की परिणति में कभी धारें लुप्त हो जातीं, तो बादल कहते, 'लय टूटनी नहीं है और तत्काल नया आलाप ले लेते। सु...

महुआरी यादें और सुंगध का संवाद

जब मैं दफ्तर जाने के लिए पृथ्वीराज रोड से राजेश पायलट रोड पर मुड़ता हूं तो वहां दोनों तरफ महुआ के पेड़ लगे हैं। अलस्सुबह चुए मादक महुए महक रहे होते हैं। वह महक गंधभर नहीं है। ‘गंध का संवाद’ है जो खुद तो कुछ नहीं कहते, लेकिन आपको बहुत कहने के प्रेरित करते हैं। आगे गोलचक्कर से जहां जनपथ पर मुड़ना होता है, तक--महुओं की कतार महज चार सौ मीटर लम्बी है। जब वहां से गुजरता हूं तो लगता है कि काश यह सड़क पसर जाती, लम्बी हो जाती और यह महक ख़त्म न होती। जहां से मधूक पांत खत्म होती है, वहीं से महुआरी यादों का सफर शुरू हो जाता है। हमारे दूर के खेत पहले आम के बाग थे, उसमें दो तीन जहीन पेड़ महुआ के थे। इतने बड़े की दस-बारह बच्चे हाथ का ‘कक्कन जोड़कर’ उसकी मोटाई नापते थे। उसकी शाखाएं - प्रशाखाएं बीघे भर में फैली थीं, बड़ा छतनार पेड़ था। फागुन उतरने के साथ महुआ का पेड़ अपनी पत्तियां उतार देता, लाल कोमल शिशु पत्तियों के नीचे गुच्छों में महुआ चोंच निकालकर बाहर का ताप लेते। पुरानी पत्तियों के झरने से नीचे मोटी बिछावन बिछ जाती इससे चुने वाले 'सुमन की सुकोमलता' न प्रभावित हो। जब भोर की पोर खुलती तो कुच की बु...

यात्रा...अपने भ्रमों से बीतना है।

यात्रा, महज यहां से वहां भटकना नहीं है। वन, प्रदेश और प्रान्तर से गुजरना नहीं है...बल्कि अपने भ्रमों से बीतना है। चलते जाना..स्थान का अंतरण करते जाना....यही यात्रा का एकमात्र पर्याय नहीं हो सकता।  यहां से वहां भागने में भी जड़ता हो सकती है और स्थिरता में भी यात्रा हो सकती है।  अहर्निश चलकर, घूमकर ग्रह वही हैं...एक आवृत्ति के बाद 'वहीं' हैं। जबकि, सूर्य अपनी स्थिरता में ऐसी यात्रा करता है कि प्रत्येक 11 वर्ष में उसके दिशाओं का सत्य बदल जाए। वह यहां से वहां तक भटकता नहीं, 'यहां' और 'वहां' को ही अभेद कर देता है...उत्तर और दक्षिण का भेद मिट जाता है।  भारत ने अनेक यात्रा देखी है। धौत धारण कर भगवा हो जाने तक की संतों की यात्रा.....और काफिला सजाकर निकले सार्थवाहों की यात्रा। कहने को तो संत और सार्थवाह दोनों यात्री ही रहे। संतों ने इसी यात्रा के सहारे वैयक्तिकता की बाधा पार की...भ्रमों से बीते...स्व में सर्व को अनुभूत किया। पड़ाव और पर्याय  उनके लिए निरर्थक हुए।  सार्थवाह अपने कामनाओं की तरह ही बड़ा काफिला लेकर निकले, धारणाओं को ढ़ोते... वह भारी ही हुए। मार्ग मजबूत होते गए....

सातत्य का संगीत 

पलाश वन को पार कर आया हूं। पत्थरों की लाल चटाई पर वह अबोये वृक्ष जैसे ध्यानस्थ थे--- सजातीयता के संयोजन में होकर भी गहन एकाकी में लीन, दूर-दूर स्थित। बुद्धवत शांति ओढ़े हुए। विरक्त की तरह अलिप्त। जैसे वसन्त से पूर्व अपनी तंद्रा नहीं तोड़ना चाहते। उनसे थोड़ा पीछे विंध्य के सुभग शिखर समतल पर औंधे नाद की तरह सज्जित हैं---अंतर्मुखी। परत-दर-परत चट्टानों के संयोजन से उभरी ओजस्विता देखते ही बनती है। जिन्हें छूने में जीवित देह सा स्पर्श बोध है। उनकी गुफाएं जैसे सांसों की गर्माहट से भरी हैं, और भित्तियां जैसे छुवन से सिहरा हुआ नाभि-देश। यह सब पीछे छोड़ आया हूं। जहां बैठा हूं, सामने उथला लेकिन अहर्निश प्रवाह है। इसकी निरंतरता से पठार की लाल देह और चटख हो गई है। इनका उद्गम वहीं पीछे लेकिन अब भी दृष्टि की प्रसार में स्थित विंध्य के सुभग शिखर हैं, जोकि पसीज रहे हैं। उनके पसीजन की जो बूंदें लड़ियों की रस्सी बनाकर नीचे उतर रही थीं, वही यहां प्रवाह बन बह रही हैं।  विंध्य पिघलकर बह रहा है, लेकिन यह प्रवाह शिखरों के स्वरूप को नहीं भूला है। पठारी तल की अनगढ़ता से प्रवाह में अनगिनत विंध्य-शिखर उभरते हैं....फिर ...

पाश का पागलपन

रोज-रोज बांधे जाने से बैल का खूंटे से अगाध प्रेम हो जाता है। वह उसे चाटता है, सहलाता है, कंधे रगड़ता है। मुक्त किये जाने के बाद वह स्वतः ही खूंटे पर लौट आता है। ऐसा करने के लिए किसान बैल की सराहना करता है, बैल को निश्चित ही गर्वानुभूति होती है---वह कितना पाबंद है, कितना समर्पित है, परंपरा के प्रति सजग है! लेकिन, इसे आप बैल का मौलिक अधिकार कह सकते हैं?  खूंटे का बंधन बैल ने नहीं चुना है। आरम्भ में उसने भी प्रतिकार किये होंगे। अब वह इसी में खुश है। परंपरा की हों या पैमाने की...आरम्भ में बेड़ियां बलात ही डाली जाती हैं। फिर वही बेड़ियां आभूषण हो जाती हैं। उनकी खनक में वह जीवन का संगीत सुनने लगता है। जब कोई पाशबद्ध मुक्ति के प्रयास छोड़ता है तो यह विद्रूप है, लेकिन वह बंधन का उत्सव मनाने लगता है तो यह त्रासद है।  पाशबद्ध होना, बंधन है दासता नहीं। दासता तो पाश की परिधि को स्वीकार लेना है। पाश का प्रतिकार न करना, दासता है।  पैरों में बेड़ी है, वह पैरों को निश्चित सीमा से आगे बढ़ने में रोकती है। बेड़ी में बंधे पैर बेड़ी की परिधि तक ही बढ़ सकते हैं। लेकिन, वह उस परिधि को स्वीकारते नहीं। जब भी पग उठता है...