जिन्हें अपूर्व की आकांक्षा है उन्हें  उपत्यकायें रुचती हैं। 

    शिखर ओजस्वी हैं, आकर्षक हैं लेकिन अनाघ्रात नहीं। उनका आकर्षण, उनकी ओजस्विता, उनकी विराटता हजारों बार रौंदी जा चुकी है। प्रेमियों ने पाने की कामना से रौंदा, प्रतिस्पर्धियों ने चुनौती मानकर... आकर्षण हो या दुर्गमता उसकी यही नियति है। शिखरों के पास जो कुछ है, सब पाया जा चुका है।  उभार में जो आकर्षण है, वही उसकी अजेयता को चुनौती है। उभरी हुई भूमि हो, भाव हों, या व्यक्ति....रौंदे जाना उनकी नियति है। उनमें कुछ रहस्य नहीं बचता। उनकी दुर्गमता खंडित कर बीन ली जाती है। वहां अपूर्व की आकांक्षा अनावश्यक है।  उपत्यकाओं में वैसा आकर्षण नहीं। शिखरों जैसी ओजस्विता नहीं। इंद्रियों की सौंदर्य कामना के अनुरूप वहां कुछ अधिक नहीं है। शायद इसीलिए उनकी कौमार्यता अशेष है। 
    
उपत्यकायें अनाघ्रात हैं। वह सामान्य मन को चुनौती नहीं देतीं। कुछ पाने और जीतने की कामना वालों के लिए वहां कुछ नहीं, लेकिन खो जाने की अनुकूलता है।  उपत्यकायें रहस्य हैं। उनका सम्पूर्ण नहीं पाया सकता है। मनुष्य दूसरे ग्रहों के तथ्य खोज लाया है लेकिन उपत्यकायें उसके लिए अब भी रहस्य हैं। यहां अनुसंधानियों के लिए सब कुछ है। इस रहस्य में अपने को खोजा जा सकता है, अपने को सौंपकर। यहां जो मिलेगा वह सब अपूर्व होगा। जिन्हें अपूर्व की आकांक्षा है, उन्हें उपत्यकायें रुचती हैं।

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