राष्ट्रीयता में स्वराज बोध आवश्यक

  


 स्वराज का विमर्श राजनीतिक दासता के दौर में अ​धिक उभरा। इसी से इसका अर्थ प्रतिक्रियात्मक किया गया है। हालांकि, भारत में स्वराज की अवधारणा स्व के बोध जितनी ही प्राचीन है। ब्रितानी दासता के समय विमर्श उभरने से इसके एकांगी अर्थ आरोपित करने के प्रयास जरूर हुये लेकिन वह स्वराज की प्रदी​प्ति के समक्ष टिक न सके। तब भी बहुधा वही अर्थ लेकर चर्चा अब भी होती है। यह अर्थ ऐसा है कि परतंत्रता को मिटाना स्वराज है, यानी परतंत्रता का अभाव स्वराज है। जबकि गहरे अर्थों में स्व की सत्ता प्रतिकारात्मक नहीं है, स्वीकारात्मक है। यह स्वयंसिद्ध है और इस तक जाने व समझने को किसी प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं। इस अर्थ में स्वराज अभावात्मक नहीं है, बल्कि भाव सुसम्पन्न है।

स्वराज के दो अर्थ हो सकते हैं 'स्व' की संवेदना से स्थापित किया गया राज और स्व पर स्व का राज। यह दोनों अर्थ एक साथ ही स्वीकार्य हैं। स्व पर स्व का राज, अनुशासन या आत्मसंयम का संकेत है जोकि स्वराज के लिये अपरिहार्य है। वहीं स्वराज का पहला अर्थ इसके स्वरूप को उभारता है। स्व की संवेदना का राज। इस क्रम में स्व को थोड़ा समझना जरूरी है।

मनुष्य का चरित्र ही उसका स्वभाव है और स्वभावशून्य किसी भी प्राणी की सत्ता होती ही नहीं। समस्या है मानव द्वारा मानव के ही शोषण की, उसके अतिक्रमण की, उसके उत्पीड़न की, उसके ऊपर अत्याचार की उसकी सत्ता के उल्लंघन की, उसके हित के विखण्डन की, उसके उपेक्षा की। इसका कारण हमें प्रतीत होता है चरित्रहीनता। जबकि, चरित्रहीनता यदि मानव के स्वभाव का अंग हैं तो सबके साथ व्यवहार में प्रतिबिम्बित होनी चाहिए। वह औषधि विक्रेता, जिसके नकली दवा के इन्जेक्शन्स से लाखों बच्चे मरे हैं, अपने इकलौते बेटे के बीमार पड़ने पर असली दवा की खोज में क्यों भटकता दिखाई दे रहा है? इसलिए कि उसके स्व की संवेदना जुड़ी है, उसके ममत्व की परिधि में वह अवस्थित है। इस परिधि के भीतर वह नकली दवा का व्यापारी, जिसने पैसे के लिए लाखों बच्चों की निर्ममतापूर्वक हत्या की है, इस बच्चे की हत्या नहीं कर सकता। ग्राहकों से निरन्तर झूठ बोलने वाला दुकानदार अपने बेटे का झूठ बोलना सहन नहीं कर सकता। हज़ारों औरतों का शील लूटने वाला विलासी धनपति अपनी बहन पर किसी की कलुषित दृष्टि भी सहन नहीं कर सकता। मानवीय संवेदना का एक घेरा है जिसके भीतर नकली दवा का व्यापारी, ग्राहकों को ठगनेवाला दुकानदार, नारियों को क्रीड़ा सामग्री बनाने वाला विलासी धनपति सब.... निर्विशेष  मानव हैं। सभी प्रेम और करुणा, सच्चरित्रता और नैतिकता से अनुप्राणित है। उस घेरे के बाहर वे चरित्रहीन हैं, भ्रष्ट हैं। सब कुछ हैं जो उन्हें नहीं होना चाहिए। संवेदना के यह घेरे व्यक्ति और उसके परिवार तक सीमित हैं, उसके बाद वे क्षीणतर होते जाते हैं। जहां समाज और परिवार का टकराव आता है व्यक्ति परिवार के साथ हो जाता है। जहां देश और समाज का टकराव आता है व्यक्ति अपने समाज के साथ हो जाता है। जहां अपने देश और दूसरे देश का टकराव आता है, व्यक्ति अपने देश के साथ हो जाता है। घेरे एक पर एक हैं लेकिन उनका केन्द्र व्यक्ति का अपना अहं है। उसकी संवेदना केन्द्र से परिधि की ओर जितनी दूर तक जाती है, उतनी ही क्षीण होती जाती है। हर बड़े घेरे की तुलना में छोटे घेरे में उसका आवेश तीव्रतर रहता है लेकिन उसका अभाव कहीं नहीं है। उसके स्तरों में गहरी विषमता है लेकिन अपनी मूल प्रकृति में वह शुद्ध स्व की संवेदना है। ऊपरी घेरों की एकता जब तक ​प्रतिक्रियावश है तब तक यह स्वराज की सफलता नहीं। हम संकट के समय ही देश के रूप में संग​ठित हों यह स्वराज नहीं है।

स्वराज उस संवेदना का राज है, जिसमें नकली दवा का व्यापारी, ग्राहकों को ठगनेवाला दुकानदार, नारियों को क्रीड़ा सामग्री बनाने वाला विलासी धनपति सब, निर्विशेष  मानव हैं। यह उसी मूल संवेदना का राज है। इस क्रम में हम जो राज्य बनाएंगे वहां शोषण व वैषम्य का कोई स्थान नहीं होगा। जातीय, सांपद्रायिक व स्थानिक आग्रह नहीं होंगे। व्यवस्था की अगुवाई करने वालों में शासन नहीं, कल्याण का भाव होगा। सिर्फ सांस्कृतिक, धा​र्मिक, भौगोलिक या भाषाई दृ​ष्टि से अपने कहे जाने वालों के राज को स्वराज को नहीं कहा जा सकता है। इस अर्थ में अपने लोगों का राज भी जब तक स्व की संवदेना को साथ लेकर नहीं चलता तब तक वह असिद्ध है। यह ठीक है कि आग्रह व आकांक्षायें वैयक्तिक हैं और स्व की संवेदना का परिवार, समाज फिर देश तक प्रसार करने में इनमें में कुछ का त्याग करना पड़ सकता है। लेकिन, इस थोड़े व निरर्थक का त्याग के बदले उसे जो सामर्थ्य, संतोष व सुरक्षा मिलती है, वह महत्तर है।

स्वराज की इस भावना से मुंह मोड़ने के कई आपद परिणाम हमें मिलते रहते हैं। राष्ट्रीयता की ‘प्रा​प्ति’ से भी ऐसा ही संकेत मिलता है। कहने को तो आज हमारे लिये राष्ट्रीयता गर्व का विषय है। लोक में राष्ट्रीयता सबसे ऊंची पहचान है और वै​श्विक व्याख्या में राष्ट्रीयता हमारी कसौटी भी है। लेकिन, वै​श्विक स्तर पर राष्ट्रीयता साधक और बाधक दोनों हो सकती है। चूंकि, हम राष्ट्रीयता को अपनी कागजी पहचान समझते हैं इसलिये साधक-बाधक ​िस्थति​ विपर्यय में यह पहचान बदलते आये हैं। यह कभी संयोग था, फिर ट्रेंड हुआ और अब उन्माद की ​िस्थति में जा रहा है। ऐसा इसलिये है क्योंकि राष्ट्रीयता में स्वराज का बोध नहीं है और स्वराज ​बोध के बिना राष्ट्रीयता खंख है।  

बाबू गुलाबराय अपने निबंध राष्ट्रीयता में लिखते हैं, “राष्ट्रीयता के मूल में एक साथ दो प्रवृत्ति काम करती है, साथ रहने की प्रवृत्ति और आत्मरक्षा की भावना। यह भाव मनोवृ​त्ति की तीव्रता तक पहुंच जाता है किंतु यह मनोवृ​त्ति के अपेक्षा अधिक स्थाई होता है और इसको भाव वृत्ति कहना अधिक संगत होगा। यह मिश्रित मनोदशा है। इसमें देश प्रेम के साथ उसके उन्नत की अभिलाषा और अतीत का गर्व भी शामिल होता है।“ यह गर्व का भाव व उन्नत की अ​भिलाषा दोनों के​ लिये राष्ट्रीयता में स्वराज की प्रेरणा होना आवश्यक है। हालांकि, राष्ट्रीयता की पहचान कुछ अर्थों में सीमित है। इसके लिये सम्मिलित राजनीतिक ध्येय, परस्परता और भू-भाग से जुड़े होना आवश्यक है। लेकिन यह राष्ट्रीयता को पहचानने के तरीके हो सकते हैं, यह पहचान ही राष्ट्रीयता नहीं है। अलबत्ता इन सबके अपवाद विश्व में मौजूद हैं। लेकिन हम यदि उस ऊपरी पहचान को ही राष्ट्रीयता के रूप में स्वीकार भी लें तो इसकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। राष्ट्रीयता का आधार विचार मूलक अवश्य दिखता है किंतु यह भावनामय अधिक है। यह ऐसी भावना है जो वात्सल्य और ईश्वर भ​क्ति की भांति व्यक्ति को क्षुद्र स्वार्थों से ऊंचा उठाने के कारण ही सराहनीय कही जा सकती है।

प्राचीन भारत का वैभव जिसपर हम गर्व करते हैं, वह उसका भूगोल नहीं है। क्योंकि जैसा वह भूगोल था अब नहीं है। लेकिन, जो काल के मार से भी अक्षुण्ण है वह हमारे गौरव का विषय है। वह है भारत का आत्मिक विकास। यही आ​त्मिक विकास राष्ट्र के स्तर पर इसके स्व की संवेदना है। यही भारत की एकात्मता को पो​षित भी करता है। यही आ​त्मिक विकास हमें आश्वस्त करता है कि स्वराज में स्व के पीछे राज शब्द भले ही लगा है लेकिन इसका वैसा अर्थ नहीं है जैसा हम करते आये हैं। 

यहां राज में इसमें स्वामी सा अधिकार नहीं, स्व का सार्वत्रिक स्वीकार है। यह स्व का प्रसार यदि बढ़ता जाये तो बहुत संभव है कि यह भू​गोल व राजनीतिक ध्येय की सीमा के समानांतर चले और बहुत संभव है कि यह उससे पार हो जाये, सभी ​​िस्थ्ति में यह स्वीकार्य है। क्योंकि किसी पड़ाव पर भौगोलिकता व राजनीतिक ध्येय से इसका न तो द्रोह है न ही प्रतियोगिता। लेकिन इसके अभाव में राजनीतिक ध्येय व भौगोलिकता मंगलकारी सिद्ध न हो सकेगी, यह मानव ने अपने इतिहास से ही जाना है। 


स्वराज राष्ट्रीयता के अभाव में भी सिद्ध है, भले उसे पारिभा​​षिक स्वीकार्यता न मिल सके तब भी उसकी कसौटी सिद्धि ही है स्वीकार्यता नहीं, जबकि राष्ट्रीयता बिना स्वराज के खंख है, निष्प्राण है। 


(हिंदुस्थान समूह की प्रति​ष्ठित पत्रिका युगवार्ता में प्रका​शित)

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