....शरद के सब वादे मुकर गए

दिन के दोनों छोर धुंधले हो गए हैं।  कोहकाफ की उपत्यकाएं दो बार जी उठती हैं। यह 'उपत्यकायें' अब दिन की दुशाला हैं.. जिसे ओढ़ कर उसका आकार अरूप हो जाता है। दिन, दिन सा नहीं दिखता। इसी में ढंक गए वे वादे जो शरद के हिस्से थे। इसी में ढंक गया शरद, जो मेरे हिस्से था।  अब शीतलता सघन हो गई है और धूप सांद्र। गति मध्यम फिर न्यूनतम हो रही है...ताप के अभाव में जीवन का प्रवाह भी मद्धिम हो रहा है। ठहर गए हैं वह वादे, लेकिन बीत नहीं रहे स्मृतियों से। अलबत्ता, उन वादों को दिन के छोर पर उभरे धुंधलके में खोता देख रहा हूं। ...बिछते दिन के साथ कुमुद देखने का वादा और सरोवर किनारे बैठ कर उससे बीते रात की दास्तान सुनना..... गुनगुनी धूप में छत पर  मूंगफली खाने का वादा। जहां मूंगफली के ढ़ेर में आग सहेजे हांडी रखी हो, जिससे रिसती रहे गर्माहट फलियों में।  ...चुट-पुट की आवृत्ति में अनावृत्त होते दाने और इस लय की थाप पर तुम्हारे मौन का खुलना.... वह दाने चुनने व तुम्हें सुनने का वादा। ...सकुचाती शाम में दुशाट ओढ़ पूरब को पीठ दिखाकर सूरज को सुबह का निमंत्रण देना....और फिर सिंघाड़े के सोंधेपन का सत्कार।  'तट की ऊंचाई तक भरे सरोवर का पानी स्थिर है, पीठ सपाट...उसपर एक झींगुर भागता फिर रहा है। वह कांपती लकीर से कुछ लिखता और उसे सहेजता जाता है। जैसे,- लिखकर दे रहा है कि वह वादे इन कांपती लकीरों से थे जो करने वाले, करने के साथ ही विस्मृत करते जाते हैं। जैसे, पानी पर बनती लकीरों को वह अपने साथ लिए जाता है। देख रहा हूं----पानी में निहारकर पीपल स्वयं को 'उर्ध्वमूल' पाता है और गंभीर हो गया है। गाम्भीर्य के भार से उसके पत्ते थम गए हैं। उसके पड़ोसी अर्जुन को यह बात जंचती नहीं। शुभ्र तने वाला अर्जुन दिगंबर खड़ा है...इसलिए वह अपना रूप नहीं देखना चाहता। वह पानी में कौड़ियां फेंकता है तो पानी डोल उठता है।'.......वह विम्ब विचलित हो जाता है...पीपल की विराटता हिल जाती है। उसकी धारणा वलयों में बंटती जाती है। मिटती जाती है।  उसे अब 'इस रूप' की असत्ता का भान हो रहा है। वह स्व'भाव में लौट आया है। पत्तों की आवृत्ति में 'नेति-नेति' का बयान है। उन वादों की सत्ता तो इस विम्ब भर भी नहीं... तब भी 'नेति-नेति' समझने में शरद बीत गया। 'मौसमी के फूलों की गंध को रङ्ग मिल गया है। केसरिया आकारों से उसका वृक्ष लदा है। इन फलों ने पूर्व स्थिति के सुगंध व संवाद......और  तुम्हारे वासन का रङ्ग सहेज रखा है। प्रतीक्षा में उसे सिद्ध किया है। कल एक खाया था....इसके स्वाद में उस गंध और तुम्हारे रूप का निर्वचन है। लेकिन, अब यह बहुत दिन न रहेगा। मां ने मर्तबान धोकर सुखा दिए हैं।  ...सुबह सरोवर के तट पर बैठा था तो गिलहरी आई थी। चार कदम चलकर रुकना, इधर-उधर देखना फिर सहज होकर बढ़ना....जैसे कोई मन-भ्रमण कर रहा हो और भीतर बज रहा हो ....अरे मन समुझि समुझि पग धरिये----लगा, तुम आई हो।  मलाल शरद बीतने का नहीं है, वादों के मुकर जाने का भी नहीं है। अब तो प्रभात में दूर्वा के माथे सजे शुभ्र-पारदर्शी श्रृंगार से अनुराग हो गया है। हेमंत इस अनुराग के सहारे बीत जाएगा...तुम आओगे तो उसका श्रृंगार झड़ जाएगा। हर आहट पर वह इकहरी काया कैसे अपना श्रृंगार सहेजती है, मैं जानता हूं....तुम अब मुझे भी बीत जाने दो, शरद में फिर मिलेंगे।  (दिसंबर 2022)

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