जी-20 की अध्यक्षता भारत के लिए अपूर्व अवसर
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक स्तर पर जी-ऑल जैसे संगठन की वकालत करते रहे हैं। वह अपनी सूझ और भारतीय दृष्टि के अनुरूप ठीक हैं। अघोषित तौर पर दुनिया अब ग्लोबल विलेज है और उसके किसी हिस्से में होने वाली अस्थिरता का परिणाम प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों तरह से विश्व के सभी देशों को भोगना पड़ता है। यह उन स्थितियों के लिए है जिन्हें पहले से रोका, टाला या प्रबंधित नहीं किया जा सकता क्योंकि कुछ विषय देशों के संप्रभुता से जुड़े होते हैं। जबकि, जो सकारात्मक बदलाव हम विश्व में देखना चाहते हैं उसे किसी एक साझे प्लेटफार्म से प्रबंधित व पोषित कर सकते हैं। चूंकि, विश्व के सभी देश समान रूप से जिम्मेदार व जवाबदेह सिद्ध नहीं होते, साथ ही कई देश ऐसे प्रभावी कारक बनने में अक्षम हैं और उनकी नीतियां व प्राप्तियां वैश्विक बदलावों से ही संचालित हैं,---ऐसे में वैश्विक स्तर पर आर्थिक बदलावों को प्रबंधित करने वाले ऐसे देशों के समूह की आवश्यकता है, जो विकासशील व विकसित देशों के अंतरसंबंध व साझे भविष्य को संबोधित करते हों। जी-20 एक ऐसा ही मंच है।
जी-20 प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतर-सरकारी मंच है। इसमें 19 देश अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, कोरिया गणराज्य, मैक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, यूके, अमेरिका और यूरोपियन यूनियन शामिल हैं। वहीं भारत ने अध्यक्ष के नाते 2023 समिट के लिए बांग्लादेश, इजिप्ट, मॉरिशस, नीदरलैंड, नाइजीरिया, ओमान, सिंगापुर, स्पेन और यूएई को अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया है। आमंत्रित सदस्य वह देश हैं जो भारत की अगुवाई वाले इंटरनेशनल सोलर एलायंस के सदस्य हैं, यह भी महज संयोग नहीं है। समिट में यूएन, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, डब्ल्यूएचओ और डब्ल्यूटीओ सहित कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संगठन आमंत्रित हैं। इस मंच में भले ही 20 देश शामिल हों लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता ने भावना के स्तर पर जी-ऑल का ही स्वरूप दिया है। उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम की थीम रखकर इसे स्पष्ट दिशा ही है। वैसे भी जी-ऑल की अवधारणा भी एक अर्थ में विश्वभर के भावनाओं व भूमि की भागीदारी ही है, जोकि भारत ने इसी मंच से तय कर दी है। वहीं घोषित तौर पर, जी-20 सदस्यों के माध्यम से 80% वैश्विक जीडीपी, 75% विश्व व्यापार और 60% विश्व जनसंख्या का मंच है। इसमें कई ऐसे संगठनों को भी प्रतिनिधित्व प्राप्त है, जो इन नीतियों को लागू करने व उन्हें अपेक्षित गति तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस दृष्टि से जी-20 संयुक्त राष्ट्र संघ से भी अधिक तार्किक व समावेशी मंच है। यहां संयुक्त राष्ट्र संघ की तरह वीटो फैसले न लेकर सर्वसम्मति से निर्णय होते हैं और इन निर्णयों के कार्यान्वयन की नियमित समीक्षा की जाती है।
भारत के पास जी-20 की अध्यक्षता ऐसे समय में आई है जब कोरोना महामारी और यूक्रेन-रूस संघर्ष से उपजे संकटों में विश्व का ध्यान भारत की तरफ है। भारत की जी-20 अध्यक्षता सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। जलवायु संकट, कोविड संकट, वैश्विक सप्लाई चेन संकट और कर्ज संकट, भू-राजनीतिक संकट और हाल के दिनों में सामने आए खाद्य और ऊर्जा संकटों ने अर्थव्यवस्थाओं विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को उथल-पुथल में डाला हुआ है। दूसरी ओर, भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी निरपेक्ष व मानवतावादी व्यापार नीतियों और शांति प्रतिबद्धता से अप्रतिम उपस्थिति दर्ज की है। अन्य समर्थ देशों के अपने आग्रह व आकांक्षाओं को पोषित करने से इतर भारत ने हमेशा मूल्यों, वाजिब आवश्यकताओं, स्थिर बाजार व सैन्य निरपेक्षता को संबोधित किया है। इसी के अनुरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी- 20 समिट 2023 का आदर्श वाक्य एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य (वसुधैव कुटुंबकम से प्रेरित) रखा है। हालांकि, समिट के विषय दक्षिण एशियाई मामलों पर केंद्रित हो सकते हैं जबकि भावना समावेशी होगी।
इस समिट की अध्यक्षता हर मायने में भारत के लिए अपूर्व अवसर है। वैश्विक स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों में अक्सर भारत जैसे समर्थ देश को 2 विकल्पों में से एक चुनने की बाध्यता बनी रही है। यह चाहे एजेंडा के मामले में हो, संप्रभुता के मामले में हो, सुरक्षा या अन्य विषय। भारत कई बार अपने आप को उन विकल्पों से अलग भी कर लेता है। इसके उदाहरण हाल फिलहाल में यूनाइटेड नेशन में वोट करने के समय देखा गया। बहुत कम ही अवसर उसके पास आते हैं जब वह कोई अपनी भावना के अनुरूप एजेंडा प्रक्षेपित कर सके। जी-20 की अध्यक्षता में भारत को कोई औपचारिक शक्ति तो नहीं मिलेगी लेकिन उसके पास अपनी भावना के अनुरूप नीतियां प्रस्तावित करने व विषयों को चर्चा के लिए आगे बढ़ाने का स्वर्णिम अवसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका संकेत भी दिया है कि जी-20 के मुद्दे समावेशी और सम्यक होंगे। यह विश्व को एक नया संदेश देने की पहल हो सकती है जिसमें बताया जा सके कि शक्ति का सदुपयोग कैसे किया जाता है और नेतृत्व की सही परिभाषा क्या है। यह उन देशों के प्रोपेगेंडा पर प्रहार होगा जिन्हें अपना आंगन ही विश्व लगता है।
जी-20 की अध्यक्षता एक रोटेशन के आधार पर आती है लेकिन इसमें महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसका आयोजन दो ट्रैक में होता है। पहला है, वित्तीय ट्रैक जिसमें वित्त मंत्री और केंद्रीय बैंक के गवर्नर शामिल होते हैं और दूसरा है शेरपा ट्रैक, जो गैर-वित्तीय मुद्दों पर चर्चा करने को महत्व देता है। चूंकि, मेजबान देश शेरपा ट्रैक का एजेंडा निर्धारित करता है। यह ट्रैक भारत के लिये मातबर हो सकता है। योग की वैश्विक स्वीकार्यता के बाद कोरोना महामारी के समय हाथ मिलने के बजाय नमस्ते करने का चलन शुरू हुआ है। यह सब जैसे भारत के लिये अपने साफ्ट पॉवर को व्यविस्थत व सांस्थानिक तरीके से लागू करने की पूर्वपीठिका बने हैं। इस ट्रैक के तहत बहुपक्षीय मंच पर जो विषय उठाये जा सकते हैं, उनको लेकर भारत में परंपरागत विमर्श व दृष्टि रही है जोकि विश्व के लिये किसी वरदान से कम नहीं है। क्योंकि, यह सब वर्षों से अभ्यासित व आजमाये हुये मूल्य हैं। यह ट्रैक भारत को अपनी गुटनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं, लोकतांत्रिक मूल्यों, नैतिकता और लोकाचार, शैक्षिक समझौतों, कलाकारों व विद्वानों, कला और वास्तुकला, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, आयुर्वेद, पर्यटन, खेल, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए एक ब्रांड बनाने में मदद करता है। हाल के दिनों में, भारतीय विदेश नीति में सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। इसी के साथ ही सांस्कृतिक विनिमय व अकादमिक राजनय जैसी अवधारणाओं को बल मिला है। यह सब वह क्षेत्र हैं जहां भारत को सर्वस्वीकार्य व सदियों पुरानी बढ़त हासिल है। विश्व में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका का लाभ उठाने के लिए भारत के प्राचीन ज्ञान और आध्यात्मिकता का उपयोग करने की आवश्यकता है। भारत के विभिन्न राज्यों में होने वाली क्रमवार शेरपा ट्रैक की बैठकों में इसे ठीक से प्रोजेक्ट किया जा सकता है। इन सबके व्यापक
आर्थिक पक्ष भी हैं।
भविष्य के चिंतनीय विषय फूड, फ्यूल और फर्टिलाइजर तीनों का समाधान भारत के पास है। भारत इन आयोजनों के माध्यम से विश्व की सबसे समृद्ध व आरोग्यवान थाली के भारतीय व्यंजनों को बढ़ावा दे सकता है। ऑर्गेनिक खेती के बढ़ते प्रचलन को दिखा सकता है और इंटरनेशनल सोलर एलायंस (आईएसए) अपेक्षित परिणामों के माध्यम से विश्व को अक्षय ऊर्जा का प्रायोगिक सूत्र साझा कर सकता है। आईएसए समिट में आमंत्रित संगठन भी है। इस मंच का केंद्रीय विषय आर्थिक ही है। हालांकि अर्थ का विषय का महज आर्थिक नीति रह नहीं गया है, राजनय इसकी ड्रिवेन फोर्स है। अर्थतंत्र की विश्व व्यवस्था बहुत तेजी से बदल रही है, क्योंकि आज के ट्रेड और टेक्नोलॉजी में राजनयिक प्रक्रियाओं का महत्वपूर्ण योगदान है। यह प्रक्रियाएं वैश्विक मंचों से प्रभावित हैं। जी-20 की अध्यक्षता भारत के पास आने के बाद यह विश्व व्यवस्था उसके भावना के अनुरूप बदलेगी। लंबे समय तक भारत विश्व के लिए बाजार रहा है। अब स्थितियां बदल रही हैं मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल की सफलता के बाद भारत को भी अपने बाजार ठीक करने हैं। उसे इस दृष्टि को भी प्रेरित करना है। भारत के पास ग्लोबल साउथ (लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशियाई देश) की आवाज के रूप में खुद को स्थापित करने का सुनहरा अवसर है। जी-20 की अध्यक्षता से भारत की दुनिया में एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में विश्वसनीयता बढ़ेगी। साथ ही, भारत वैश्विक परिवर्तनों के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकेगा। भारत पर इसका निश्चित ही दबाव होगा कि अवसर एक है और अपेक्षाओं की बड़ी सूची है। तब भी, भारत को यह अवसर भुनाना भी है और आगे ऐसे अवसर उसके हाथ आयें, इसकी पृष्ठभूमि भी तैयार करनी है। यह सामूहिक लेकिन निरपेक्ष कार्रवाई का समय है और आम सहमति बनाकर सम्यक कार्रवाई की अगुवाई लिए भारत से बेहतर कोई देश नहीं है।
सारगर्भित लेख।
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