प्रतिमान प्रजाति के नहीं परिस्थिति के होते हैं।

 

पर्वतों से ऊंचे उनपर उगे पेड़ होते हैं। 

पेड़ ही क्यों, वहां उगी घास भी उनसे ऊंची होती है। 


वहीं, विराट विंध्य मुनि अगस्त्य के आदेश पर झुक तो गया लेकिन उसने यह सुनिश्चित किया कि उसपर उगकर कोई उससे बड़ा न हो जाये। आगे भी विंध्य पर उगकर कोई उसकी ऊंचाई को चुनौती नहीं दे सका क्योंकि वहां ऐसी अनुकूलता नहीं। 

प्रत्येक हरे वृक्ष की पड़ोसी सुर्ख शिला है, जो उससे ऊंची है। विंध्य की विषमता में विहारते, मुझे हर बार यह अनुभव हुआ है। 

दिगंबर हो खड़े खैर वृक्ष और पलाश के 'सजातीयता का संयोजन' पर कई बार लिख चुका हूं। उनमें आकर्षण था, रहस्य नहीं। इसीलिए, उससे मुक्त होना सहज था। उनसे बीतना सहज था। 

चित्त जहां महीनों से अटका है वह एक वट था.....पठार का वट। 

वह वट जो 'सभी संभावित स्रोतों' से पोषित होकर भी जड़ों में अपनी लघुता छुपाये खड़ा था। उसके देह पर शाखों की संभावनाएं उभरने से पहले ही मेट दी गईं थीं...रह गई थीं गांठें। 

वह पेड़ क्या 'गांठों का गुंथन' ही था। कोई चार हाथ ऊंचा रहा होगा। 

'प्रजाति के प्रतिमान' से अजनबी....गिने-चुने पत्तों के प्रदर्शन से अपने अस्तित्व का संकेत करता वह वट। 

मैं उसे खड़े होकर बस देखता रहा। उसकी उम्र मुझसे दोगुना रही होगी, इसकी सनदें भी उसने सहेज रखी थीं। उसे वट भी वानस्पतिक पहचान के नाते कह रहा हूं... मेरे लिए तो वह रहस्य भर था। 

हम निःसीम मैदान की उदात्त प्रकृति में पले हुए। हमने अपनी स्थिति में वट को विराटता का प्रतिमान ही जाना था। सब तरफ पसरते-फैलते...जड़ों से उगते, जड़ें उगाते वट। उनकी विराटता पूज्य है..माथ नवाये आगे बढ़े..बड़ी धृष्टता की तो जड़ पकड़कर झूल लिए।  

'यहां तो वट के माथे पर हाथ फेर रहा हूं। कंधे सहला रहा हूं। गांठों में दर्ज मेटी संभावनाओं की सूचना को पढ़ रहा हूं। 

उसे शायद यह सब रुचा नहीं, तो हवा के सहारे उसने जड़ों का गुच्छा मेरे पेट पर जैसे यह कहते हुए मारा कि मुझपर दया न दिखाओ, जाओ...पीछे हट जाओ।'

अब उसके पत्ते हिल रहे हैं, जड़ें झूल रही हैं। वह सब कुछ कह रहे हैं...शायद यही कि,,,,

प्रतिमान प्रजाति के नहीं परिस्थिति के होते हैं.... परिवेश, विराटता और विपन्नता का विपर्यय करता रहता है। 

(राप्ती की रेती पर धूप सेंकते लिखा। १५ नवंबर २०२२।)

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