राष्ट्रीयता में स्वराज बोध आवश्यक
स्वराज का विमर्श राजनीतिक दासता के दौर में अधिक उभरा। इसी से इसका अर्थ प्रतिक्रियात्मक किया गया है। हालांकि, भारत में स्वराज की अवधारणा स्व के बोध जितनी ही प्राचीन है। ब्रितानी दासता के समय विमर्श उभरने से इसके एकांगी अर्थ आरोपित करने के प्रयास जरूर हुये लेकिन वह स्वराज की प्रदीप्ति के समक्ष टिक न सके। तब भी बहुधा वही अर्थ लेकर चर्चा अब भी होती है। यह अर्थ ऐसा है कि परतंत्रता को मिटाना स्वराज है, यानी परतंत्रता का अभाव स्वराज है। जबकि गहरे अर्थों में स्व की सत्ता प्रतिकारात्मक नहीं है, स्वीकारात्मक है। यह स्वयंसिद्ध है और इस तक जाने व समझने को किसी प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं। इस अर्थ में स्वराज अभावात्मक नहीं है, बल्कि भाव सुसम्पन्न है। स्वराज के दो अर्थ हो सकते हैं 'स्व' की संवेदना से स्थापित किया गया राज और स्व पर स्व का राज। यह दोनों अर्थ एक साथ ही स्वीकार्य हैं। स्व पर स्व का राज, अनुशासन या आत्मसंयम का संकेत है जोकि स्वराज के लिये अपरिहार्य है। वहीं स्वराज का पहला अर्थ इसके स्वरूप को उभारता है। स्व की संवेदना का राज। इस क्रम में स्व को थोड़ा समझना जरूरी है।...