काशी नगर नहीं एक विराट चेतनामय देह है
काशी भगवान विश्वनाथ की नगरी है। जहां अपनी पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए कोसों चलकर गंगा जी को आना पड़ा। दक्षिण सागर तट से चलकर आचार्य शंकर को आना पड़ा, और यहां एक चांडाल ने उन्हें सिद्ध कर दिया। यहां की भव्यता और विद्वत्ता विश्व को आकर्षित करती रही है। इस भव्यता और विद्वत्ता के मूल में विश्वनाथ की कृपा, गंगा के स्पर्श के साथ ही इसकी बसावट भी महत्वपूर्ण है। वरुणा और अस्सी नदी के फांट के बीच बसा यह नगर एक यंत्र की तरह बसाया गया। मानव शरीर सूक्ष्म सौरमंडल है। सभी ग्रहों की प्रकृति व गति इसमें समाहित है। उसी तरह काशी धरती पर सक्रिय सौरमंडल है। काशी नगर नहीं एक विराट चेतनामय देह है, क्योंकि इसकी रचना सौरमंडल की तरह की गई है। जैसे शरीर में इड़ा और पिंगला हैं उसी तरह काशी में शिव और शक्ति के मंदिर बनाए गए। मूल मंदिरों में 54 शिव के हैं और 54 शक्ति या देवी के हैं। यह सूक्ष्म ब्रह्मांड मुख्य ब्रह्मांड से संपर्क के लिए विकसित किया गया था। सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास से 108 गुनी है, यह 108 पड़ाव हैं। हमारे शरीर में इसी तरह 108 चक्र हैं। शरीर ...