पीपल और चांद
परिवार के कलहों और समाज के षड्यंत्रों से स्वयं को बचाते वीरानी सी दुनिया में आ गया हूं। अकेले रहने की आदत ऐसी बनी है कि कुछ दिन नियमित समूह में रह लेने के बाद संगति-मोचन को गहने ध्यान में उतरना पड़ता है। नौकरी-लक्ष्य सिद्धि के नाम पर दिन में फिर भी अपने को समाज के साथ, स्थिति के साथ समायोजित कर लेता हूं, रात साझा नहीं कर पाता। रात के दो स्थाई साथी हैं, एक पीपल का पेड़ और दूसरा चांद। पीपल की पत्तियां एक निश्चित आवृत्ति में हिलती रहती हैं, जैसे मन अतीत और वर्तमान के बीच दोलन करता है। रात के समय पत्तियों की सरसराहट में एक संवाद होता है, जिसे ध्यान से सुनने पर अनकही गुत्थियों की गांठें खुल जाती हैं। दूसरा चांद है, भावनाओं की तरह कला-दर-कला चढ़ता है, फिर अपेक्षित प्रत्युत्तर न पाकर ठिठक...सिकुड़कर शून्य हो जाता है--और अपने पीछे असीम तम छोड़ जाता है। पैमाने से परे का अंधकार।
मेरे पास रहने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। मौसमों की तरह पड़ाव बदलते रहते हैं, लेकिन यह दोनों साथी न बदले। इसे इत्तेफ़ाक़ कहिये, संयोग कहिये या मेरी नियति। जहां भी रहा, चिंतन को बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह पीपल के पत्तों की सरसराहट मिलती रही, और खिड़की पर चांद की उपस्थिति बनी रही। हालांकि यह दोनों साथी मेरे जीवन के विरोधाभास भी हैं। नाम अरुण है लेकिन अरुणोदय देखे अरसा बीत जाता है। वैचारिक रूप से एकाकी जीवन बियाबान के अधनंगे बबूल सा है। तब भी चांद साथ है, पीपल पड़ोसी है।
गांव में तो द्वारे पर ही विशाल पीपल वृक्ष था। उसके बाद जिन शहरों में गया, जब रहने का स्थान तय करने के बाद आस-पास नजर दौड़ाई तो पीपल जरूर मिला। यह सब चुने हुए साथी नहीं हैं, लेकिन चाहकर भी इनसे स्वयं को अलग नहीं कर सकता। ऐसा नहीं कि पड़ावों पर ही यह साथी रहे हैं। चांद तो अक्सर यात्राओं में भी मेरे साथ हो लेता है।
'रात का छठा प्रहर है। चला जा रहा हूं। बस के मोटर की आवाज के अलावा कोई ध्वनि नहीं है। बस की गति समरूप है, हल्के हिचकोले हैं-जो विचार क्रम में अल्पविराम लगाते हैं। यह वह मार्ग हैं जहां शहरी सड़कों की तरह दोनों ओर बत्तियां नहीं चमकतीं।
निःसीम खेतों पर खींची गई लकीर सी यह सड़क, टेढ़ी भी ऐसी है जैसे लकीर खींचते समय हाथ हिल गए हों।
सहयात्री सोए हुए हैं। सबकी कुर्सियां मोड़े जाने की क्षमता तक पीछे धकेली हुई हैं। मेरी आँखों में नींद नहीं है, मैं अब भी पीठ से समकोण बनाकर बैठा हूं। मेरे पास स्वयं को उलझाए रखने के विकल्प कम हैं। मैं पूरे बस में खुद को अकेला पाता हूं। आज बहुत सारी बातें करने का मन है लेकिन कोई जगा हो तब न!
मैं बाईं ओर कांच की खिड़की को देखता हूं, चंद्रमा दिखता है। वह भी काली अधखुली खिड़की से झांक रहा है। मैं उसे देखता हूं वह अपरिवर्तनीय स्थिति में है। ऐसा लगता है कि या मैं रुक गया हूं या वह मेरे साथ चल रहा है। मैं उसे देखते रहता हूं तो अचानक उसपर से होकर गुजर रही काले बादलों की परत हट जाती है। बढ़ी हुई द्युति जैसे कह रही हो, मैं साथ हूं। धीरे-धीरे उसका प्रकाश बस में पसर जाता है। बाहर वृक्ष के आकार भी उभर आये हैं। पहचानना मुश्किल है कि किस प्रजाति के वृक्ष हैं लेकिन अच्छे लग रहे हैं। मैं उन्हें निहारना चाहता हूं लेकिन आंखों की सीमा है, सामने असीम अंधकार...तभी बिजली कौंधती है और पूरा दृश्य हरा हो उठता है। अगले ही क्षण फिर अंधेरा है लेकिन आंखें बंद करने पर फिर वह दृश्य दिखता है, जो कौंध के समय आंखों ने कैद कर लिया था। बस चली जा रही है, चांद फिर बादलों को भेदकर निकल आया है। मेरा प्यारा सहयात्री साथ चल रहा।'
ऐसी कई यात्राओं में चांद मेरा सहयात्री रहा है। लेकिन आज यात्रा में नहीं हूं। रात के दो बजे हैं। गुरु पूर्णिमा का चांद अधिक चटख है, प्रकाशमान है। आस-पास बादलों की कुछ आड़ी टेढ़ी लकीरें हैं। जैसे कुछ संदेश-आदेश या कोई घोषणा लिखी गई हो। आज वह गुरु सा गंभीर और तेजस्वी लग रहा है। उसकी सतह पर नसीहतें लिखी हुई हैं। ज्ञानात्मक विवरण उकेरे हुए हैं। शायद फिर वही सामाजिक नियमों को मानने के प्रोत्साहन! चमक ऐसी है जैसे शिव मुस्कुरा रहे हों और उनकी दंतपंक्ति की चमक माथे के चंद्रमा पर पड़ती हो, और उसका प्रकाश बढ़ जाता है।
पीपल के माथे पर सजे पूर्णिमा के चांद को देखकर भरत व्यास का लिखा गीत गुनगुनाने रहा हूं।
ये चमेली सी सुगन्धितरात मधु मुस्का रहीझींगुरों की बीन कीझंकार पर कुछ गा रही.....मैं कहूँ कुछ कान मेंतुम जान कर अनजान कर लोचाँद को चुप चाप निरखोचांदनी में स्नान कर लो.....
मूक कलियों से सुनो कुछप्रणय की पागल कहानीमधुभरी गीली हवा सेबात कर लो कुछ सुहानी
बंद कर पलकें किसी काआज फिर तुम ध्यान कर लो....
(आषाढ़ पूर्णिमा, 24 जुलाई रात 3:20 बजे, ऑरोबिंदो अपार्टमेंट, ऑरोबिंदो रोड दिल्ली)
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