वह स्त्री...
बस में यात्रा कर रहा था। यात्रा की दुश्वारियां गिनाने से बेहतर है यह उल्लेख कर दिया जाए कि वह उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस थी। लहराती, लजाती, ठिठकती...गुर्राकर फिर फुदकती वह बस चली जा रही थी। सड़क के किनारे संयोजित कस्बों के लोग इत-उत उसे रोकते, चढ़ते-उतरते। मुझे दूर जाना था, तो सबसे पीछे की सीट पर बैठा था। सबसे पीछे की सीट पर बैठने का प्रयोजन बस इतना ही नहीं था कि मैं बस के अंतिम पड़ाव तक का यात्री था, बल्कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन, पीछे बैठे होने में भी मैंने सुखद पक्ष खोज लिया था। वह था सभी यात्रियों को आते, उतरते देखना। सबकी अलग देहभाषा और भंगिमा होती थीं। उसे पढ़ना आनंद देने लगा। इस प्रयोग से गर्मी व उमस से थोड़ा ध्यान हटा।
बस में कोई सीट खाली नहीं थी और दोनों सीटों की पांत के बीच कुछ लोग खड़े होकर यात्रा कर रहे थे।
इसी बीच एक स्थान पर दो किशोरियों बस में चढ़ी और अंदर सीट खाली न देखकर उतरने लगीं। तब तक दो युवक अपनी सीट देने की पेशकश के साथ उठकर खड़े हुए। किशोरियों ने वह सीटें प्राप्त कर लीं, युवक विश्व विजेता की भांति विजय की सनदें चेहरे पर सहेजकर वहीं तन गए, पताका से।
तभी एक स्त्री और चढ़ी। लेकिन, उसके चढ़ने पर न सीटों की पेशकश हुई न ही कोई अवधान।
वह सूरज की आंच में नियमित तपी और हवाओं के पुलक से सँवारी देह...जिसमें किसी को आकर्षण न लगा।
जबकि, उसकी सुंदरता इतनी निर्दोष और निर्लिप्त थी कि देह पर उसकी प्रतिक्रिया तक नहीं आई थी। जैसे, विचार अनुभूति की प्रतिक्रिया भर होते हैं स्वयं अनुभव नहीं हो सकते वैसे ही कायिक सुंदरता, सुंदरता का आभास हो सकती है, सुंदरता का परिमाण नहीं। लेकिन, यहां तो भास भी प्राप्त करना कठिन था। क्योंकि उसकी सुंदरता एकदम अलिप्त थी। प्रतिक्रियाहीन, लेकिन प्रबोधिनी।
तब भी, उसकी आंखों से सुंदरता का भास प्राप्त किया जा सकता था।
वाह एक हाथ से पाइप पकड़े खड़ी थी और उसके बाजू करीब डेढ़ सौ अंश का कोण बनाते। उसी अधिक कोण की कैंची पर वह अपना माथा टिकाए, तिरछी नजरों से सभी यात्रियों के चेहरे निहारती और फिर प्रमुदित हो उठती। मुझे वह बड़ी गहरी रहस्य जान पड़ी। वह बैठे हुए हुए चेहरों को देखकर प्रसन्न होती है और आश्वस्त भी।
उसकी आँखों में कामना नहीं, कृतज्ञता थी। उसके स्व का प्रसार बस की परिधि से कहीं बड़ा था।
मैंने पाया कि वह सभी बैठे हुए में थोड़ी-थोड़ी बैठी हुई थी, विश्रांति बनकर। और वह जो खड़ी थी, वह उन बैठों की व्यग्रताएं का साझी विग्रह थी......।
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