तृष्णा छोड़, सावन का बीत जाना

    चांदी की सी शुभ्र लड़ियों वाली कास की पांतें देखकर याद आया.....सावन बीत चुका। इसी संकेत से सनद मिली कि सावन आया था। जैसे गुजरे कारवां की सनद उठता गुबार होता है, ऐसे ही सावन के गुजर जाने का संकेत फूली हुई कास की पांतें हैं। 'अब तो बरसाती नदियां, अनजान दिशा को लौटने लगती हैं। अपने फांटों में थोड़े कंकड़, थोड़ी रेत और ढेर सारी रिक्तता छोड़कर। बेटियां भी लौटने लगती हैं, गांवों की चहक और अल्हड़पन बटोरकर। गाम्भीर्य की शिथिलता साथ लेकर, जैसे--शरद के उदासी की दस्तक देकर जा रही हों।' आसमान में तैरते बादलों के टुकड़ों की तरह, भाव भी छितराये पड़े हैं।  सावन से जो भावनाओं जुड़ी हैं, वार्षिक आवृत्ति के चलते वह धारणा सी बन गई हैं। वह सब न घटें तो लगता ही नहीं कि सावन आया।  
    
    हम निःसीम मैदानों में पले-बढ़े लोग हैं। सावन के दिनों में मैदानी प्रकृति की उदारता अनंत-सी लगने लगती है।  बरसाती नदियों की कसमसाती देह, कभी फांट बढ़ाकर समूचे मैदान पर दावा करतीं नदियां। शाम ढलते ही अविराम गान करते झींगुर, घुप अंधेरे में स्वर से अपनी स्थिति बताते दादुर।  अनवरत बूंदों की मार से मुंह लटकाए सुस्ताती अमृता और अपराजिता की पत्तियां, थकी हारी सी। जो जरा सी धूप पाकर फिर सीधी हो जाएंगी। नहाए-धोए चमकीले पीपल के पत्ते, धमाचौकड़ी करके निढ़ाल शिशु की तरह शांत। सब तरफ भरे पानी में अपनी छवि निहारता चांद, जैसे सारी धरती उसके लिए दर्पण बन गई हो।  

    सावन की जिद में धरती का कोई हिस्सा हरियाली से वंचित नहीं रहता। कंक्रीट पर भी हरे काई की मोटी बिछावन डाल दी जाती। जैसे, रेड कार्पेट के नीचे ढंक दी जाती हैं तमाम अव्यवस्थाएं। खडंजे के अंतराल से दूर्वा निकालकर ईंटों पर फैल जातीं। अछूता कुछ न रहता। पैरों से नियमित रौदें जाने से चकरोड के बीचों-बीच एक पतली सी 'मलन' जरूर बन जाती, जिसके हिस्से हरीतिमा की वंचना रहती। तब भी, इसे सावन की असफलता नहीं कहा जा सकता।  
    
    तैयारी पूरी कर, कजराये मेघ और हरियाई भूमि संदेश भेजते-----सुदूर ब्याही गई बेटियों को। इसके लिए वह बरस भर इंतजार करती थीं कि सावन आएगा और भाई या पिता उसे लिवा लाने के लिए आएंगे। बेटियों के लौटते ही गांव का हुलास लौट आता, बीता समय लौट आता। शुष्क भाव, ताजे हो जाते। झूलों के पेंग की तरन्नुम में स्वर उठते...हो रामा रिमझिम परत फुहार! शिवालिक के एक किशोर पहाड़ी पर खड़ा हूं, सामने तराई के अछोर वन में कमर भर पानी में साखू के वृक्ष खड़े हैं। उनके सपाट और लंबे तने पर तमाम गांठे (गुलथे) हैं। जो हर दो हाथ के फासले पर हैं, लगभग एक निश्चित आवृत्ति पर। यहां से डालें फूटनी थीं, लेकिन ऊपर की ओर उठते वृक्ष फैलाव को नियंत्रित करते हैं। यह फैलाव उनकी ऊंचाई को कम कर सकता है। इसलिए, शाखा की संभावनाएं दाब दी जाती हैं। उन शाखाओं के होने की संभावनाओं को मेटने के निशान यह गांठें हैं।  
    
    साखू के वृक्ष सहोदर लगते हैं। उनके तनों की तरह ही, मेटी हुई भावनाओं-संभावनाओं के निशान मन-वृत्त पर वलय बनकर उभर आए हैं----यह मेट फैलाव को नियंत्रित कर आगे बढ़ने के फल हैं।  सावन जाते हुए तृष्णा छोड़ गया है। दोष सावन का नहीं है, बदले परिवेश और पूर्व के निर्णयों की यही नियति है। मौसमी प्रभाव से निरपेक्ष हो यंत्रवत हो जाना ही अब गति है। 

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