उतार की बारिश और जमुना किनारे हम
बारिश से मोहक कोई आवृत्ति नहीं। उतार से अधिक पुलकित कोई अवस्था नहीं।
उतार में उत्साह सघन होता है। जैसे भोर में नौटंकी के उतार का नगाड़ा, जैसे घर मुंहा होते ही मतवाले बैलों की सरपट चाल---उतार की अलग ही पुलक होती है। पड़ाव दिखने लगता है तो उसके आकर्षण का बल भी खींचता है, शायद इसीलिए गति बढ़ जाती है।
बादलों के अंतिम कार्य दिवस चल रहे हैं। कास तो कब की फूल चुकी है, धरती उन्हें लौट जाने को कह रही है। लेकिन, बादल शायद विजेता की तरह लौटना चाहते हैं। प्रत्यावर्तन नहीं करना चाहते। आज उन्होंने आसमान को चौगिर्द घेर रखा है। जैसे कह रहे हैं, माघ की ओरियां चूने में अभी देर है। सूखे सावन की शिकायतें भी हैं। आज मन भर बरसकर लौटते हैं।
हवाओं ने हमें छूकर कई बार मेघराज की मंशा बताई है। हम आसमान को निहारकर खुश हो रहे हैं। गौवों के नवजात पुलकित पायों से चौकड़ी भर रहे। जिस कार्यक्रम के लिए हम यहां थे उसका समापन हो चुका है। बच्चे जा चुके हैं, मोर निर्भय होकर झाड़ियों से फिर निकल आये हैं। जमुना का किनारा, मयूरों की बस्ती है। मोरों ने अपने बिरेंगे पंख पसार दिए हैं। तिलोरी की चहक संकेतात्मक हो रही है।
वृक्ष बुद्धवत हो स्वयं को साध रहे हैं। मुझे गुदगुदी सी हो रही है लेकिन मित्र राय साब के भीग जाने की चिंता भी है। उनके वस्त्रों की 'धवल-द्युति' मेघ के लिए आह्वान से कुछ कम नहीं है।
मैं राय साब से हंसकर कह रहा हूं कि बरसेगा तो बम्बे में घुस जाना। मैं तो कभी बारिश से बचने का जतन नहीं करता। इस समारोही पोशाक के बावजूद मुझे भीगने का भय नहीं प्रत्युत झूमने की इच्छा है।
जिनकी प्रतीक्षा थी वह आ गए हैं। प्रो. आरके ग्रोवर ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र के बड़े नाम। पद्मश्री से सम्मानित। तपस्वियों जैसा जीवन और मेरे प्रति अतिशय उदार व्यक्तित्व। यमुना तट के मेरे अनुभवों से उत्साहित प्रो. ग्रोवर ने भी वहीं आकर आसमान देखा। मैं लजाया कि ऐसी घिरी घटाओं वाले मौसम में वन-भ्रमण को कौन बुलाता है! वह भी 'कास फूल के से रंगों वाले केश'धारी को। मेरी आशंकाओं के विपरीत उनमें बारिश व वन को लेकर बच्चों सा उत्साह है।
हम सब तीन तरफ से बस्तियों से बंधे वन प्रसार की ओर चल पड़े हैं। जब हम वन में घुस रहे थे तब तक बादलों ने सब्र साधा हुआ था। उम्मीद थी कि बिन भीगे लौट आएंगे और गाड़ी में बैठकर बारिश देखेंगे। लेकिन, मेघ संकल्प कुछ और ही था। जब हम जंगल के इतने भीतर पहुंच गये कि वह बम्बा और कार दोनों क्षणिक पहुंच से बाहर हैं, तब बारिश शुरू हुई। हम सब खुले आसमान में, प्रवाह और वन प्रसार के बीच खड़े हैं। यहां से केंद्रीय दिल्ली के ऊंचे भवन औंधे गत्ते की तरह दिख रहे हैं। नगर को बस देखा जा सकता है। वह हमें शरण नहीं दे सकते।
बारिश तेज हो गई है। मुझे उस बबूल के पेड़ से उम्मीद थी, जिसने 'अमृता की आवृत्तियों' को समारोही परिधान की तरह ओढ़ा हुआ है। लेकिन, जब ऊपर लसी लताओं को देखा तो वह पहली बूंद के साथ माथा नवाए लजाई जा रही थीं। वह 'अपरिग्रह-साधिकाएं' बूंदों को बांधने में अनिच्छुक और असमर्थ थीं। उनके नीचे खड़े होने का सुख बस इतना था कि बारिश के साथ हरीतिमा का स्पर्श बोध भी मिल रहा था।
....अब पीपल से पनाह मांगी गई है।
वनों के पीपल तन पर लाल लंगोट नहीं बांधते लेकिन उनके पत्तियों की पोशाक सघन होती है। करीब दस मिनट तक तो उनके पत्ते बारिश के जल संभाले रहे। और, हम तक आतीं रहीं...बहुत ही महीन फुहारें जो केश पर सजती जातीं। भौहें भारी हो रही हैं, तभी एक पीला चिकना पत्ता कुछ बूंदें लेकर आया और 'पॉकेट स्क्वेयर' की तरह जेब पर सज गया। हम इसे सौभाग्य कहकर खुश हो रहे हैं... अचानक से पीपल की अंजोरी खुल गई है।
कुछ देर तक बारिश में भीगने के बाद पेड़ भी बरसने लगते हैं। और, उनका बरसना बारिश से अधिक सघन होता है। गौनहरे के बताशे जैसी बड़ी-बड़ी बूंदें। चटाक से लगती हैं। अब, हम सब भीग चुके हैं। वस्त्रों का भार बढ़ गया है। बंधे हुए केश बारिश सहेजकर वस्त्रों में उलीच रहे हैं। जैसे, शिवालिक श्रृंखला से गंगा उतर रही हों!
जेबें भारी हैं। उपाहन लहरों के बीच की डोंगी से हो गए हैं। तब तक उपाध्याय जी की नजर इस कागज़ के टुकड़े पर पड़ी, तो उन्होंने इसे उठाकर तिरपाल बना दिया। इसने हमें बारिश से बचाया तो नहीं, लेकिन 'मुरलीधर' के 'गिरधार' होने का दृश्य सजीव कर दिया। हालांकि तब गोवर्धन 'कालिंदी-कुलावसन्त' की उंगली पर टिका था और ग्वालों ने सांकेतिक सहारे लगा रखे थे। यहां प्रो. ग्रोवर जी, उपाध्याय जी व राय साब इस तिरपाल को ताने हुए हैं और हम बस उंगली लगाकर 'गिरधारी' 'बने' हुए हैं।
यह गुरुवार दोपहर की घटना है, तब से बारिश थमी नहीं है। मैं अभी सातवीं बार भीगकर दुसाले की लपेट में हूं। प्रार्थना कर रहा हूं कि यमुना का प्रेम-प्रवाह अनवरत रहे।
( यमुना तट)
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