महात्मा गांधी का भारत बोध
जब भारतबोध का विमर्श हो तो आधुनिक भारत के पहले और एकमात्र सर्वमान्य जननेता महात्मा गांधी जी की दृष्टि पर प्रमुखता से चर्चा की जानी चाहिए। चर्चा इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि उत्साही आयातित विचारधारायें तो अपनी आयु पूरी कर चुकीं लेकिन अपने भारतबोध के चलते गांधी आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। महात्मा गांधी के आन्दोलनों, राजनीतिक दृष्टि व निर्णयों की चर्चा पहले खूब हो ही चुकी है। पत्रकार गांधी के रूप में उनकी समग्रता व पारदर्शिता अब दस्तावेज है। वहीं गांधी मूल्यों व गांधी व्रतों की भी कम ही सही स्वादानुसार व सुविधानुसार चर्चा होती रही है। लेकिन, उनके व्यक्तित्व के सबसे सुंदर पक्ष की चर्चा कम ही होती है और वह है उनका भारत-बोध। यही वह सूत्र है, जिसने समूचे भारत को उनके पीछे लाकर खड़ा कर दिया था। गांधी के प्रयासों की उर्जा इसी बोध में निहित थी, और सफलता का मूल मन्त्र भी यही बोध था। महात्मा गांधी अपने भारत बोध के चलते स्वामी विवेकानंद के सच्चे उत्तराधिकारी सिद्ध होते हैं, क्योंकि स्वामी विवेकानंद जी ने जो दृष्टि प्रकट की थी, उसे गांधी ने चरितार्थ कर दिखाया। सुंदर बात यह है कि गांधी के भारतबोध को समझने के लिए गहन शोध में जाने की आवश्कता नहीं है, क्योंकि वह प्रकट रूप में है। सहज ही उनके अवलम्ब, दर्शन, आचार-व्यवहार, वस्त्र, व्रत, निर्णय व मत भारत को लेकर गहरी समझ को प्रदर्शित करते हैं। हालांकि इस क्रम में पृष्ठभूमि को समझना बेहद आवश्यक है क्योंकि आज की वस्तुस्थिति में उनके बोध का उचित आकलन न हो सकेगा, इसलिए हमें तत्कालीन प्रसंग को समझना जरुरी है। उन प्रसंगों को समझने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा।
इतिहास का सबसे खूबसूरत पक्ष यह है कि उसे पलटकर देखा जा सकता है। इतिहास के लिए एक सदी बहुत छोटा कालखंड है। पलटकर देखें, तो 1915 ईस्वी का भारत, जिसकी सीमाएं आज के भारत से काफी बड़ी हैं। इतने बड़े देश और उसके महान समाज पर ‘अंधकार का साम्राज्य’ है। देश दासता की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। जंजीरें पश्चिम की हैं। देश राजनीतिक रूप से ही नहीं, आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक रूप से भी पराधीन है या उसपर हीनभावना थोप दी गई हैं। उस आत्मविस्मृत समाज को उबारने का प्रयत्न करने वाले भी समस्याओं का समाधान वही खोजने जाते हैं, जहां से समस्याएं आई हैं। तत्कालीन ‘उद्धारक’ आयातित, ज्ञान-विज्ञान-दर्शन सिद्धांत और कानूनों को लाकर भारत को फिर से प्रतिष्ठित करने की बात करते हैं। हर समाधान के लिए पश्चिम की ओर देखने की आदत पड़ गई है, पश्चिम के जिन ‘निषेधक और समाज नियंत्रक कानूनों’ ने बेड़ियों गढ़ी हैं, उन्हीं कानूनों को पश्चिम से पढ़कर, उनसे निकलने का मार्ग खोजा जा रहा है। पश्चिम का कानून निषिद्धियों की व्याख्या करता है, लेकिन सद्कर्म की व्याख्या उसके पास नहीं हैं। तब भी पश्चिम से आई समस्या का समाधान, पश्चिम की दृष्टि से खोजने वालों और अनजाने-जाने समस्या को अधिक जटिल करने वालों की लम्बी श्रृंखला बनी हुई है। निषेध से निषेध काटे जा रहे हैं। ऐसे में महात्मा गांधी अकेले हैं जो कहते हैं कि नजर पश्चिम की ओर नहीं अंदर की ओर रखी जानी चाहिए। पश्चिम के गवाही की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें अपना यह वहम दूर करना होगा कि जो कुछ करना है, उसके लिए पश्चिम की तरफ नजर दौड़ाने पर ही आगे बढ़ा जा सकता है। गांधी जी समझ चुके हैं कि हमारी दासता का कारण पश्चिम की शक्ति नहीं है, बल्कि हमारी दुर्बलता है, आत्मविस्मृति है। हम अपनी शक्ति के अनजान हैं।
भारतीयता की ऊर्जा सातत्य में निहित है, और उसे ही विच्छिन्न कर दिया गया है। उससे जागृत किये बिना और उसके प्रति श्रद्धा जगाये बिना पश्चिम का मुकाबला संभव नहीं है। इसीलिए गांधी जी ने अंदर की ओर दृष्टि की और लोकचेतना को कुरेदना शुरू किया। वह आपद काल था, भारतीय मूल्यों की पुनर्स्थापना प्रवचन से संभव नहीं था। इसलिए गांधी ने व्रतों का मार्ग अपनाया। उनका कहना था, जो चीज़ आत्मा का धर्म है, लेकिन अज्ञान या दूसरे कारणों से आत्मा को जिसका भान नहीं रहा, उसके पालन के लिए व्रत लेने की जरूरत होती है। यह बात अपने आप में शुद्ध, प्रबुद्ध और प्रभावी है और तत्कालीन आत्मविस्मृति की ओर ही इशारा कर रही है। गांधी का कहना की दृष्टि भीतर की ओर जाए, निहित भावों की ओर संकेत है। यहीं से उन्होंने अपने जीवन का स्वरुप तय किया। उन्होंने जिन मूल्यों को अपनी ऊर्जा के रूप में अपनाया वे इस देश की लाखों वर्षों से अभ्यासित सौम्य सामर्थ्य हैं, मृत्युंजय मूल्य हैं। जन-जन के आलम्ब ही उनके आलम्ब हैं। लोक आस्था में ही उनकी आस्था है। जन-जन की कामना ही उनकी सुशासन अवधारणा है। भारतीय मूल्यों पर महात्मा जी का अटूट विश्वास ही था, कि जब दुनिया में छल, बल, शस्त्र, और साम्राज्य विस्तार का चीत्कार हो रहा था, ऐसे प्रतिकूल समय में भी उन्होंने सत्य, अहिंसा व अपरिग्रह को जीकर दिखाया। आप इसे उनके आत्म –विश्वास की मजबूती ही मानें, कि उन्हें इन मूल्यों की दीर्घ कालिक सफलता व अजेयता पर प्रबल श्रद्धा थी। गांधी जी कहते थे कि यह मूल्य मेरे शोध नहीं हैं बल्कि यह तो हजारों सालों से इस देश के अभ्यास में हैं।
हम सब जानते ही हैं कि गांधी जी का जीवन आरम्भ से तो ऐसा था नहीं। वे जब अफ्रीका में थे तो पाश्चात्य जीवन जीते थे। अंग्रेजी बोलते थे और वहीं वे समाजवाद से काफी प्रभावित हुए थे। लेकिन उन्होंने समाजवाद को अपने राजनीतिक दर्शन के रूप में सिर्फ इसलिए नहीं चुना, क्योंकि वे इसे आयातित मानते थे। उस समय भारत में जितने भी राजनीतिक दर्शन प्रभावी थे, सब सोवियत, जर्मनी या योरोप की उपज थे। इसीलिए गांधी जी ने राजनीतिक दर्शन के रूप में स्वराज या रामराज को ही चुना। और जब उनसे स्वराज का अर्थ पूछा गया तो उन्होंने कहा, कि यह ऋग्वेद का शब्द है और जो अर्थ ऋग्वेद ने दिया है वही इसका भाव है। महात्मा गांधी जी शायद पहले आधुनिक राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से राम-राज्य की पैरवी की, हालांकि उन्होंने इस व्यवस्था के लिए लोकराज्य व धर्मराज्य जैसे संबोधन भी प्रयोग किये जिससे लोगों तक मूल भाव संप्रेषित हो सके।
भारत का लोक जीवन संकट या दुविधा के समय जिन ग्रथों में समाधान खोजता है, गांधी जी ने उस रामायण व महाभारत को अपनी आत्मा का इतिहास कहा। गीता को सद्गुरु रूप कहा। गीता-माता कहा। गीता पर उन्होंने टिप्पणी की, और गीता-माता नाम से पुस्तक लिखी। उन्होंने कहा कि हम गीता की गोद में सर रखकर पार हो जायेंगे। यह सब उस दौर में सामान्य नहीं था। हमसे मिट्टी के भाव कपास लेकर हमें महंगे वस्त्र बेचने के अर्थ-षड्यंत्र का समाधान भी उन्होंने हमारी परम्पराओं में ही खोजा। उन्होंने चरखा चलाया, और मैनचेस्टर के अर्थ षड़यंत्र को तोड़ा। गांधी से पहले चरखा हमारे ऋषियों ने चलाया था। यही चरखा स्वावलंबन का प्रतीक बना। यह भी भारत की शोध है, जिसका बोध गांधी जी को था। भारत ने इसी के बहाने पश्चिम को फिर से बताया कि हम वस्त्र के सूत उगाते हैं। जानवरों व रासायनिक तरीके से रेशे प्राप्त करने वाले पश्चिम को हमारा अनुसरण करना पडा। महात्मा गांधी ने जब खुद धोती (धौत, सफ़ेद कपास के सूत से बनने के कारण) अपनाई तो उसे उसी रूप में अपनाया जिस रूप में वह प्राप्त होती है। वह जीवन भर इसी पर कायम रहे।
उन्होंने घट घट व्यापी राम का आलंबन चुना। रामधुन को जीवन और आन्दोलन का अनिवार्य अंग बनाया। राम ही वह तत्व हैं जो उत्तर से दक्षिण के लोक को जोड़ते हैं। गांधी जी ने इस ऊर्जा को समझा और इसका सदुपयोग किया। राम का आलम्ब उन्होंने ऐसा पकड़ा कि रामनाम को यकीनी इमदाद (हर स्थिति में मिलने वाली पक्की मदद) कहने लगे। गांधी ने प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा दिया, और रामनाम को इसका आवश्यक अंग बताया। उरुलीकंचन गांव में प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र शुरू किया। उन्होंने साफ़ कर दिया कि पृथ्वी, पानी, आकाश, तेज और वायु के इलाज के लिए समुद्र पार जाने की जरूरत हो ही नहीं सकती। दूसरा जो कुछ सीखना है वह यही हैं, गांवों में मौजूद है। देहाती दवाएं, जड़ी- बूटियां, दूसरे देशों में नहीं मिलेगी। वे तो आयुर्वेद में ही है। कुदरती इलाज की पैरवी गांधी जी ने इसलिए शुरू की क्योंकि वे जानते थे कि आधुनिक विज्ञान का इलाज सर्वसुलभ व प्रभावी नहीं है, वहीं वह जिस आर्थिक आधार से पोषित होता है उसमें सम्पूर्ण भारत की पहुंच संभव नहीं है। वे कुदरती इलाज की सर्व सुलभता से काफी प्रभावित थे और यही वजह है कि वह बार-बार इसका समर्थन करते थे, और कहते थे कि राम-नाम तो कोई भी ले सकता है, और उसके लाभ सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के उपलब्ध हैं। गांधी जी कुदरती इलाज में राम-नाम को आवश्यक तत्त्व मानते थे। उन्होंने यह स्पष्ट करने का कई बार प्रयास किया कि राम-नाम इलाज का तत्व कैसे है? क्योंकि अधिकतर लोगों को तो यह सुझाव जादू-टोना जैसे लगता था। वे कहते थे कि प्राकृतिक उपचार के सबसे समर्थ इलाज रामनाम है। इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं। वे कुदरती को राम आधारित ही मानते थे और कहते थे कि राम-नाम के सिवा जो कुछ भी किया जाता है, वह कुदरती इलाज के खिलाफ है। बात सिर्फ यह है कि सिवा राम-नाम के पवित्रता पाने का और कोई तरीका मुझे मालूम नहीं। दुनिया में हर जगह पुराने ऋषि भी इसी रास्ते पर चले हैं और वे तो भगवान के बन्दे थे, कोई वहमी या ढोंगी आदमी नहीं। मैं यह थोड़े ही कहता हूं कि राम-नाम मेरी ही शोध है। जहा तक मैं जानता हूं, राम-नाम तो ईसाई धर्म से भी पुराना है।
पत्रकार के रूप में गांधी जी हिंदी और गुजराती में अख़बार ही नहीं निकालते हैं बल्कि जनभाषा हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए उनके प्रयास अद्वितीय हैं। उन्होंने अपने बेटे देवदास गांधी को दक्षिण में हिंदी का आचार्य बनाकर भेजा था। जब शिक्षा व्यवस्था की चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने धर्मपाल जी से आग्रह किया कि वे भारत की शिक्षा व्यवस्था पर प्रामाणिकता से लिखें, और उन्हीं के आग्रह और धर्मपाल जी ने ‘अ ब्यूटीफुल ट्री’ लिखी, जिसे बड़ी प्रशंसा मिली। गांधी जी ने पंचायतों को जनसंचार का सबसे अच्छा साधन माना और इसी से वह भारत के गांव-गांव तक पहुंचे। भारत की ग्रामा-अभिरामा संस्कृति को हर स्थिति में अक्षुण्ण रखने के क्रम में उन्होंने भारत को गांवों का देश कहा। यह भी भारतबोध की ही बात है क्योंकि वेद व अन्य ग्रन्थ के माध्यम से हमारा इतिहास साक्षी है कि व्यवस्थित ग्राम व्यवस्था की ही प्रतिष्ठा रही है। देवराज इंद्र भी पुरंदर (पुरों के विध्वंसक) कहे जाते हैं। जीवनभर भारतीय मूल्यों के उपासक रहे गांधी जी के भारतबोध को एक लेख में समेटना असंभव है और यह चर्चा सहज ही अंतिम बिंदु तक पहुंचने वाली नहीं है। तब भी संक्षेप में इतना कहा जा सकता है कि गांधी का भारत बोध सिद्ध है क्योंकि जिसे भारत का आत्मतत्व संस्कृत स्वीकार ले उसका भारत बोध सिद्ध माना जाता है। इस क्रम में चारुदेव शास्त्री ने गांधीकाव्यम् लिखा और इसके बाद आधुनिक संस्कृत साहित्य की प्रमुख स्तम्भ पंडिता क्षमा राव ने सत्याग्रहगीता और गांधी गीता लिखा। यह स्वीकार्यता गांधी जी के भारतबोध को प्रमाणित करती है। संस्कृत के तत्कालीन साहित्यकारों ने यह स्वीकार किया था कि यही मानव महात्मा के रूप में भारतीय संस्कृति का प्रतिष्ठापक है। आज जहां हम खड़े हैं, वहां भी कमोवेश वही सामाजिक चुनौतियां हैं जो गांधी ने देखी थीं। आज भारतबोध के प्रतिष्ठापकों की नितांत आवश्यकता है, जो हमारी राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक का समाधान भारतीयता के सातत्य में खोजना बता सकें। हमें भारतबोध समझा सकें।
(सितंबर 2021, मीडिया विमर्श में प्रकाशित)
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