संदेश

कवियों में संत हों, संतों में कवि हों

चित्र
हिंदी साहित्य ‘त्रिकोण के त्रास’ में है। यह त्रिकोण प्रासंगिकता, प्रेताभिव्यक्ति और उधारी का चिंतन है। आज के साहित्य में यह तीनों छुपाए नहीं छुपते। जैसे, झीने सफेद आवरण से तमस नहीं छुपता ब​ल्कि उसकी अभिव्य​क्ति आवरण को भी तमस कर देती है, वैसे ही यह प्रकट हैं। यह सब आज के साहित्य का रूप हो सकता हैं, लेकिन उसके शाश्वत चिंतन और अपरिवर्तनीय लेकिन प्रवहमान तत्त्व की प्रतीति नहीं करता। हिंदी का कवि और साहित्यकार शाश्वत चिंतन और तत्त्व से बेसुध हैं। वह सबके मन की दोहराने और आरम्भिक बातें कहकर जन-मन-रञ्जन में ही अपनी सिद्धि खोज रहे हैं। जिन्होंने प्रगतिशीलता का चोला ओढ़ा है वह कभी पाश्चात्य तो कभी कम ज्ञात चिंतन का पुनर्पाठ गाते फिर रहे हैं। इससे वह भीड़ से अलग तो दिख जाते हैं लेकिन उनका भेद खिंचाव काल में खुल जाता है। साहित्य का सबसे बड़ा वर्ग बीते को दोहराने वाला है। यहां बीते युग की बातों को अनेक तरह से कहा जा रहा है। जो विचार और अभ्यास प्रवाह क्रम में छोड़े जा चुके हैं उनको गाकर, स्मृतियों में जीवंत रखकर पाठक को पाशबद्ध किया जा रहा है। पाठक अपने छूंछे छूटे उस जीवन को गाये जाने से प्रसन्न ह...

संगीत व साधुता की पारमिता थे बाबा गौरीशङ्कर

चित्र
  अयोध्या ने अपने उपेक्षाकाल में अनके सिद्ध संत व साधक दिये, जिनसे आम जनमानस अजनबी है। इसमें से अ​धिकतर साधक व संतों ने रामनगरी के पुर्नजागरण से पूर्व ही स्वयं को समेट लिया या असीम से सायुज्य पा लिया। बाबा गौरीशङ्कर उनमें से ही एक थे। बाबा गौरीशङ्कर को अयोध्या की संगीत परंपरा का प्रतिष्ठापक कहा जाता है। किशोरावस्था में ही वैरागी बन गये गौरीशङ्कर ने करीब सात दशक तक अयोध्या की संगीत परंपरा का प्रवाह अक्षुण्ण बनाये रखा और उसे वेग दिया। उन्होंने मार्गी गायन परंपरा को नई ऊंचाई दी और अनेक सिद्ध ​शिष्य तैयार किये। कन​क बिहारिणी व बिहारी जू की उपासना में उन्होंने अपने को सौंप दिया था और फिर पूरे जीवन बस भगवान के लिये ही गाया। लंबे समय तक तो वह बस कनक भवन में ही गाते रहे। उन्होंने व्यावसायिक मंचों पर गाने से दूरी बनाये रखी। अपनी मस्ती में प्रसिद्धि की कोई परवाह न की। सरयू और भगवान राम उनके आजीवन आलंब रहे, इसलिये दूसरा नगर भाया नहीं। वह देश के विभिन्न स्थानों की यात्रा करके फिर अयोध्या लौट आते। यहीं के चना, चबेना और सरयूजल से उन्होंने जीवन भर की साधना की। कनक बिहारिणी व बिहारी जू सरकार की यु...

राष्ट्रीयता में स्वराज बोध आवश्यक

चित्र
    स्वराज का विमर्श राजनीतिक दासता के दौर में अ​धिक उभरा। इसी से इसका अर्थ प्रतिक्रियात्मक किया गया है। हालांकि, भारत में स्वराज की अवधारणा स्व के बोध जितनी ही प्राचीन है। ब्रितानी दासता के समय विमर्श उभरने से इसके एकांगी अर्थ आरोपित करने के प्रयास जरूर हुये लेकिन वह स्वराज की प्रदी​प्ति के समक्ष टिक न सके। तब भी बहुधा वही अर्थ लेकर चर्चा अब भी होती है। यह अर्थ ऐसा है कि परतंत्रता को मिटाना स्वराज है, यानी परतंत्रता का अभाव स्वराज है। जबकि गहरे अर्थों में स्व की सत्ता प्रतिकारात्मक नहीं है, स्वीकारात्मक है। यह स्वयंसिद्ध है और इस तक जाने व समझने को किसी प्रतिक्रिया की आवश्यकता नहीं। इस अर्थ में स्वराज अभावात्मक नहीं है, बल्कि भाव सुसम्पन्न है। स्वराज के दो अर्थ हो सकते हैं 'स्व' की संवेदना से स्थापित किया गया राज और स्व पर स्व का राज। यह दोनों अर्थ एक साथ ही स्वीकार्य हैं। स्व पर स्व का राज, अनुशासन या आत्मसंयम का संकेत है जोकि स्वराज के लिये अपरिहार्य है। वहीं स्वराज का पहला अर्थ इसके स्वरूप को उभारता है। स्व की संवेदना का राज। इस क्रम में स्व को थोड़ा समझना जरूरी है।...

जिन्हें अपूर्व की आकांक्षा है उन्हें  उपत्यकायें रुचती हैं। 

     शिखर ओजस्वी हैं, आकर्षक हैं लेकिन अनाघ्रात नहीं। उनका आकर्षण, उनकी ओजस्विता, उनकी विराटता हजारों बार रौंदी जा चुकी है। प्रेमियों ने पाने की कामना से रौंदा, प्रतिस्पर्धियों ने चुनौती मानकर... आकर्षण हो या दुर्गमता उसकी यही नियति है। शिखरों के पास जो कुछ है, सब पाया जा चुका है।  उभार में जो आकर्षण है, वही उसकी अजेयता को चुनौती है। उभरी हुई भूमि हो, भाव हों, या व्यक्ति....रौंदे जाना उनकी नियति है। उनमें कुछ रहस्य नहीं बचता। उनकी दुर्गमता खंडित कर बीन ली जाती है। वहां अपूर्व की आकांक्षा अनावश्यक है।  उपत्यकाओं में वैसा आकर्षण नहीं। शिखरों जैसी ओजस्विता नहीं। इंद्रियों की सौंदर्य कामना के अनुरूप वहां कुछ अधिक नहीं है। शायद इसीलिए उनकी कौमार्यता अशेष है।       उपत्यकायें अनाघ्रात हैं। वह सामान्य मन को चुनौती नहीं देतीं। कुछ पाने और जीतने की कामना वालों के लिए वहां कुछ नहीं, लेकिन खो जाने की अनुकूलता है।  उपत्यकायें रहस्य हैं। उनका सम्पूर्ण नहीं पाया सकता है। मनुष्य दूसरे ग्रहों के तथ्य खोज लाया है लेकिन उपत्यकायें उसके लिए अब भी रहस्य हैं...

प्रतिमान प्रजाति के नहीं परिस्थिति के होते हैं।

चित्र
  पर्वतों से ऊंचे उनपर उगे पेड़ होते हैं।  पेड़ ही क्यों, वहां उगी घास भी उनसे ऊंची होती है।  वहीं, विराट विंध्य मुनि अगस्त्य के आदेश पर झुक तो गया लेकिन उसने यह सुनिश्चित किया कि उसपर उगकर कोई उससे बड़ा न हो जाये। आगे भी विंध्य पर उगकर कोई उसकी ऊंचाई को चुनौती नहीं दे सका क्योंकि वहां ऐसी अनुकूलता नहीं।  प्रत्येक हरे वृक्ष की पड़ोसी सुर्ख शिला है, जो उससे ऊंची है। विंध्य की विषमता में विहारते, मुझे हर बार यह अनुभव हुआ है।  दिगंबर हो खड़े खैर वृक्ष और पलाश के 'सजातीयता का संयोजन' पर कई बार लिख चुका हूं। उनमें आकर्षण था, रहस्य नहीं। इसीलिए, उससे मुक्त होना सहज था। उनसे बीतना सहज था।  चित्त जहां महीनों से अटका है वह एक वट था.....पठार का वट।  वह वट जो 'सभी संभावित स्रोतों' से पोषित होकर भी जड़ों में अपनी लघुता छुपाये खड़ा था। उसके देह पर शाखों की संभावनाएं उभरने से पहले ही मेट दी गईं थीं...रह गई थीं गांठें।  वह पेड़ क्या 'गांठों का गुंथन' ही था। कोई चार हाथ ऊंचा रहा होगा।  'प्रजाति के प्रतिमान' से अजनबी....गिने-चुने पत्तों के प्रदर्शन से अपने अस्तित्व क...

जी-20 की अध्यक्षता भारत के लिए अपूर्व अवसर

     भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक स्तर पर जी - ऑल जैसे संगठन की वकालत करते रहे हैं। वह अपनी सूझ और भारतीय दृष्टि के अनुरूप ठीक हैं। अघो​षित तौर पर दुनिया अब ग्लोबल विलेज है और उसके किसी हिस्से में होने वाली अस्थिरता का परिणाम प्रत्यक्ष व परोक्ष दोनों तरह से विश्व के सभी देशों को भोगना पड़ता है। यह उन स्थितियों के लिए है जिन्हें पहले से रोका , टाला या प्रबंधित नहीं किया जा सकता क्योंकि कुछ विषय देशों के संप्रभुता से जुड़े होते हैं। जबकि , जो सकारात्मक बदलाव हम विश्व में देखना चाहते हैं उसे किसी एक साझे प्लेटफार्म से प्रबंधित व पोषित कर सकते हैं। चूंकि , विश्व के सभी देश समान रूप से जिम्मेदार व जवाबदेह सिद्ध नहीं होते , साथ ही कई देश ऐसे प्रभावी कारक बनने में अक्षम हैं और उनकी नीतियां व प्राप्तियां वैश्विक बदलावों से ही संचालित हैं ,--- ऐसे में वैश्विक स्तर पर आर्थिक बदलावों को प्रबं​धित करने वाले ऐसे देशों के समूह ...