संदेश

तृष्णा छोड़, सावन का बीत जाना

     चांदी की सी शुभ्र लड़ियों वाली कास की पांतें देखकर याद आया.....सावन बीत चुका। इसी संकेत से सनद मिली कि सावन आया था। जैसे गुजरे कारवां की सनद उठता गुबार होता है, ऐसे ही सावन के गुजर जाने का संकेत फूली हुई कास की पांतें हैं। 'अब तो बरसाती नदियां, अनजान दिशा को लौटने लगती हैं। अपने फांटों में थोड़े कंकड़, थोड़ी रेत और ढेर सारी रिक्तता छोड़कर। बेटियां भी लौटने लगती हैं, गांवों की चहक और अल्हड़पन बटोरकर। गाम्भीर्य की शिथिलता साथ लेकर, जैसे--शरद के उदासी की दस्तक देकर जा रही हों।' आसमान में तैरते बादलों के टुकड़ों की तरह, भाव भी छितराये पड़े हैं।  सावन से जो भावनाओं जुड़ी हैं, वार्षिक आवृत्ति के चलते वह धारणा सी बन गई हैं। वह सब न घटें तो लगता ही नहीं कि सावन आया।             हम निःसीम मैदानों में पले-बढ़े लोग हैं। सावन के दिनों में मैदानी प्रकृति की उदारता अनंत-सी लगने लगती है।  बरसाती नदियों की कसमसाती देह, कभी फांट बढ़ाकर समूचे मैदान पर दावा करतीं नदियां। शाम ढलते ही अविराम गान करते झींगुर, घुप अंधेरे में स्वर से अपनी स्थिति बताते ...

पीपल और चांद

परिवार के कलहों और समाज के षड्यंत्रों से स्वयं को बचाते वीरानी सी दुनिया में आ गया हूं। अकेले रहने की आदत ऐसी बनी है कि कुछ दिन नियमित समूह में रह लेने के बाद संगति-मोचन को गहने ध्यान में उतरना पड़ता है। नौकरी-लक्ष्य सिद्धि के नाम पर दिन में फिर भी अपने को समाज के साथ, स्थिति के साथ समायोजित कर लेता हूं, रात साझा नहीं कर पाता। रात के दो स्थाई साथी हैं, एक पीपल का पेड़ और दूसरा चांद। पीपल की पत्तियां एक निश्चित आवृत्ति में हिलती रहती हैं, जैसे मन अतीत और वर्तमान के बीच दोलन करता है। रात के समय पत्तियों की सरसराहट में एक संवाद होता है, जिसे ध्यान से सुनने पर अनकही गुत्थियों की गांठें खुल जाती हैं। दूसरा चांद है, भावनाओं की तरह कला-दर-कला चढ़ता है, फिर अपेक्षित प्रत्युत्तर न पाकर ठिठक...सिकुड़कर शून्य हो जाता है--और अपने पीछे असीम तम छोड़ जाता है। पैमाने से परे का अंधकार।  मेरे पास रहने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। मौसमों की तरह पड़ाव बदलते रहते हैं, लेकिन यह दोनों साथी न बदले। इसे इत्तेफ़ाक़ कहिये, संयोग कहिये या मेरी नियति। जहां भी रहा, चिंतन को बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह पीपल के पत्तों की सरसर...

जनपद के नगर और ग्राम

  भारत के ज्ञात इतिहास में जनपद शायद सबसे पुरानी लेकिन व्यवस्थित शासन व्यवस्थाओं में से एक रहे हैं। जनपद इस मामले में भी अनूठे हैं कि यह प्रशासनिक इकाई आज के समय में भी कायम है। बीते समय में जनपदों का महा हो जाना उनकी व्यापकता और विराटता का परिचय था, और आज जनपदीय संरचनाएं लोकतान्त्रिक शासन की धमनियां हैं। हालांकि, लम्बे काल तक एक ही पटरी पर चलने वाली व्यवस्था के कुछ स्वाभाविक गुण-दोष विकसित हो जाते हैं। जनपदों की भी अपने स्थानिक प्रवृत्ति है , अपनी सबलतायें-दुर्बलताएं हैं। जैसे फर्रुखाबाद का खुल्ला खेल , फैज़ाबाद का फसाद , गोंडा की गुंडई और सौ कैंची पर एक बहरैची यह सब जनपदीय प्रवृत्तियां ही हैं, जो विनोद के लिए दोहराई जाती हैं।   इसी तरह से हर जनपद का वैशिष्ट्य भी है।   आज के जनपद की एक प्रमुख दुर्बलता उसकी बनावट व बसावट ही है। मुख्यालय होने की खुशफहमी पाले लेकिन चारों ओर से ग्रामा अभिरामा से घिरा , गुंथा , कसा , जकड़ा जनपदीय कस्बा (नगर) , जिसके चारों ओर उमुक्त निस्सीम ग्राम पसरे हैं। जकड़न कहिये या कसाव , या अपने में ही बंद , लेकिन कस्बे परिधि बहुत छोटी है। वह पसरता भी ...

वह स्त्री...

बस में यात्रा कर रहा था। यात्रा की दुश्वारियां गिनाने से बेहतर है यह उल्लेख कर दिया जाए कि वह उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस थी। लहराती, लजाती, ठिठकती...गुर्राकर फिर फुदकती वह बस चली जा रही थी। सड़क के किनारे संयोजित कस्बों के लोग इत-उत उसे रोकते, चढ़ते-उतरते। मुझे दूर जाना था, तो सबसे पीछे की सीट पर बैठा था। सबसे पीछे की सीट पर बैठने का प्रयोजन बस इतना ही नहीं था कि मैं बस के अंतिम पड़ाव तक का यात्री था, बल्कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन, पीछे बैठे होने में भी मैंने सुखद पक्ष खोज लिया था। वह था सभी यात्रियों को आते, उतरते देखना। सबकी अलग देहभाषा और भंगिमा होती थीं। उसे पढ़ना आनंद देने लगा। इस प्रयोग से गर्मी व उमस से थोड़ा ध्यान हटा।  बस में कोई सीट खाली नहीं थी और दोनों सीटों की पांत के बीच कुछ लोग खड़े होकर यात्रा कर रहे थे।  इसी बीच एक स्थान पर दो किशोरियों बस में चढ़ी और अंदर सीट खाली न देखकर उतरने लगीं। तब तक दो युवक अपनी सीट देने की पेशकश के साथ उठकर खड़े हुए। किशोरियों ने वह सीटें प्राप्त कर लीं, युवक विश्व विजेता की भांति विजय की सनदें चेहरे पर सहेजकर वहीं तन गए, पताका से।  ...

काशी में रामकृष्ण

     काशी में रामकृष्ण केदारघाट के दक्षिणी छोर पर गंगा जी की ओर बढ़ते हुए बड़े-बड़े भवनों की कतारें हैं। बंग शिल्प में निर्मित यह प्रासाद, भग्न लेकिन भव्य लगते हैं। ऊंचे और अभिमानी। बड़ी-बड़ी बारादरी औंधे चौरस गत्तों की तरह सजी हैं, एक दूसरे से सटी और सजातीयता से संयोजित। करीब 300 वर्ष पूर्व यह प्रासाद कलकत्ते से आये दीवान इन्द्रनारायण बापुली ने बनवाये थे। इन्द्रनारायण अवध नवाब के जागीरदार थे। मालदारों में गिनती थी। बापुली परिवार ऐश्वर्य का पर्याय था। लेकिन, इन भवनों पर उसकी छापें अब धूमिल हैं। काल प्रवाह से ऐश्वर्य अपनी गति को प्राप्त कर चुका है।  इन्हीं प्रासादों में से एक की अधनंगी दीवार पर बोर्ड टंगा है, जो बताता है कि यहां स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पादुकायें रखी हैं। विराट व दिव्य स्मृतियों को सहेजे यह भवन अब डरावना लगता है, देह की भार से सीढियां कांप उठती हैं। लेकिन, जैसे-जैसे ऊपर बढ़ता हूं  अलौकिक अनुभव होता है। भीतर एक ही कमरा है जो जीर्णता से अछूता है। दरवाजा बंद है। मित्र शुभोजीत चिर-परिचित हंसी व अदब के साथ दरवाजा खोलते हैं।  दरवाजा खुलते ही---जैसे, आह...

भारत को घूमना, देखना और जानना  

मैं दोहराता रहा हूं कि सबको प्रयास करना चाहिए कि भारत को आपादमस्तक निहार आएं। भारत भूमि पर विचरने का सुख अनन्य है। आज गणतंत्र दिवस पर फिर कह रहा हूं। इस देश में रहकर इसे जानना बहुत जरूरी है, और जानने के लिए जरुरी है उसे देखना। यह देखना और जानना किताबों से संभव नहीं, न ही दूसरों के कहने सुनने के आधार पर व अनेकता में एकता जैसे लतीफों में सम्भव है। घूमना भी 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' नहीं, 'रियलाइजेशन ऑफ भारत' की दृष्टि से होना चाहिए।  भ्रमण से भ्रम का नाश होता है। इस देश का भ्रमण करने से पहला भ्रम यह टूटेगा कि यहां 'अनेकता' है। घूमेंगे तब इसे 'एक आत्मा से प्रदीप्त, विराट देह सा' पाएंगे। निज अनुभव से मान्यता यह बनी है कि 'अनेकता में एकता' का नारा भारत की एकात्मता के विरुद्ध षड्यंत्र है। अनेकता को स्वीकार लेने के बाद एकता फ़न्ताशी  बनकर जाती है। सामान्य व्यवहार में हम दोस्ती यारी भी समान आचार-विचार वालों से करते हैं। विचार भिन्न भये नहीं कि रिश्ता खत्म। फिर 'अनेकता में एकता' कहां से आएगी? राजकीय एकीकरण एकता तो है नहीं। सबसे पहले यह दिमाग से निकालना ...

सावरकर : 'मर जाना ही शौर्य होता' तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती।

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     'मर जाना ही शौर्य होता' तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती। कौशल तो स्वयं को बचाते हुए लड़ना है।  हमारे पास इस देह के अलावा और है क्या! सारे संकल्प, सारे संघर्ष, सारी आशाएं और आकांक्षाएं इसी से जुड़ी हैं।  इसे अकारण गंवा देना अपराध है। पाप है। देहोत्सर्ग दाधीच की तरह किया जाता है, जब बोध हो कि यह व्यर्थ न जाएगा।  बड़े उद्देश्य में लगे लोगों की देह तो और भी कीमती हो जाती है। उन्हें हर तरह से अपने जीवन को बचाने का प्रयास करना चाहिए।         प्रकृति ने यह जीवन दिया है, मां ने गर्भ में रखा है, पाला है। किसी  राजनीतिक अतिक्रम ण को इसे छीन लेने का अधिकार नहीं। लेकिन जब अंधेरे का ही साम्राज्य हो तो लड़ने की प्रविधि बदल लेनी चाहिए। सावरकर के क्या सपने थे, हम-आप नहीं जानते। वह तो जानते थे। उन्हें यह भी पता था कि वह सब इस देह के रहते ही सिद्ध हो सकेगा।  उन्होंने समृद्ध जीवन जीया, उद्देश्य को समर्पित जीवन जीया। देश की स्वतंत्रता को संघर्ष किया, स्वतंत्रता के लिए किया गया युद्ध भी यज्ञ हो जाता है।