सावरकर : 'मर जाना ही शौर्य होता' तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती।

    'मर जाना ही शौर्य होता' तो तलवार के साथ ढाल न बनाई जाती। कौशल तो स्वयं को बचाते हुए लड़ना है।  हमारे पास इस देह के अलावा और है क्या! सारे संकल्प, सारे संघर्ष, सारी आशाएं और आकांक्षाएं इसी से जुड़ी हैं।  इसे अकारण गंवा देना अपराध है। पाप है। देहोत्सर्ग दाधीच की तरह किया जाता है, जब बोध हो कि यह व्यर्थ न जाएगा।  बड़े उद्देश्य में लगे लोगों की देह तो और भी कीमती हो जाती है। उन्हें हर तरह से अपने जीवन को बचाने का प्रयास करना चाहिए।   
    प्रकृति ने यह जीवन दिया है, मां ने गर्भ में रखा है, पाला है। किसी  राजनीतिक अतिक्रम
ण को इसे छीन लेने का अधिकार नहीं। लेकिन जब अंधेरे का ही साम्राज्य हो तो लड़ने की प्रविधि बदल लेनी चाहिए। सावरकर के क्या सपने थे, हम-आप नहीं जानते। वह तो जानते थे। उन्हें यह भी पता था कि वह सब इस देह के रहते ही सिद्ध हो सकेगा।  उन्होंने समृद्ध जीवन जीया, उद्देश्य को समर्पित जीवन जीया। देश की स्वतंत्रता को संघर्ष किया, स्वतंत्रता के लिए किया गया युद्ध भी यज्ञ हो जाता है। 




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