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ओशो: कहने में भेद हैं, भ्रम हैं..'बनने' में आडंबर है। लेकिन, इनका  'होना' अभेद है।

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     आचार्य रजनीश की आज जयंती है। मुझे यही नाम अच्छा लगता है, आचार्य रजनीश। वही पन अच्छा लगता है, जब वह आचार्य रजनीश थे। भगवान 'बनने' और ओशो (समुद्र भाव) हो जाने की घोषणा में कुछ अपूर्व नहीं था, यह सब पूर्व में दोहराई गई थीं। अपूर्व थी रजनीश की वह दृष्टि जिससे उन्होंने उपनिषदों से लेकर पलटू और रज्जब तक की टीकाएं कहीं। और, यह दृष्टि इनके उसी पन की देन है जब वह आचार्य रजनीश थे.....चार्वाक, निर्दोष और स्त्रैण।  मैं यह पोस्ट एक प्रश्न के जवाब में लिख रहा हूँ, 'आचार्य रजनीश का मूल्याङ्कन क्या हो ?' उनकी कही बातें या उनका 'होना'!  कही गई बातों की कसौटी उनके अनुयायी हैं, उनका कम्यून है। अलग रङ्ग और ढंग के समूह बनने के अलावा उनके सन्यासियों के पास क्या है? कुछ नहीं।       रजनीश कहते थे कि मेरे शब्दों के अंतराल में मुझे खोजना, लोगों ने इसे भी एक कोट से अधिक कुछ समझा नहीं। इसी कारण रजनीश के प्राप्ति की परछाई भी उनके अनुयायियों को नसीब न हुई।  रजनीश के बोलने में जितना आत्मविश्वास दिखता है, उतना ही पश्चाताप भी। वह जानते थे कि जिसे वह कह रहे है...

....शरद के सब वादे मुकर गए

दिन के दोनों छोर धुंधले हो गए हैं।  कोहकाफ की उपत्यकाएं दो बार जी उठती हैं। यह 'उपत्यकायें' अब दिन की दुशाला हैं.. जिसे ओढ़ कर उसका आकार अरूप हो जाता है। दिन, दिन सा नहीं दिखता। इसी में ढंक गए वे वादे जो शरद के हिस्से थे। इसी में ढंक गया शरद, जो मेरे हिस्से था।  अब शीतलता सघन हो गई है और धूप सांद्र। गति मध्यम फिर न्यूनतम हो रही है...ताप के अभाव में जीवन का प्रवाह भी मद्धिम हो रहा है। ठहर गए हैं वह वादे, लेकिन बीत नहीं रहे स्मृतियों से। अलबत्ता, उन वादों को दिन के छोर पर उभरे धुंधलके में खोता देख रहा हूं। ...बिछते दिन के साथ कुमुद देखने का वादा और सरोवर किनारे बैठ कर उससे बीते रात की दास्तान सुनना..... गुनगुनी धूप में छत पर  मूंगफली खाने का वादा। जहां मूंगफली के ढ़ेर में आग सहेजे हांडी रखी हो, जिससे रिसती रहे गर्माहट फलियों में।  ...चुट-पुट की आवृत्ति में अनावृत्त होते दाने और इस लय की थाप पर तुम्हारे मौन का खुलना.... वह दाने चुनने व तुम्हें सुनने का वादा। ...सकुचाती शाम में दुशाट ओढ़ पूरब को पीठ दिखाकर सूरज को सुबह का निमंत्रण देना....और फिर सिंघाड़े के सोंधेपन का सत्कार।  'तट...

नानकदेव: गुरु हरि मिलिआ भगति दृढ़ाई।

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     पञ्जाब की 'नदियां' उथली हैं, इसलिए बहती तेज हैं। पर, आपस में मिलती नहीं..वहां नदी ही नहीं, 'पानी' भी पांच है। नानकदेव ने उस 'पानी' को एक पहचाना।   तंतु निरंजन जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ. ..इसी अभेद को उन्होंने बार-बार प्रतिष्ठित किया है। सागर महि बूंद बूंद महि सागरु....आतम परातम एको करे, अंतरि दुबिधा अंतरि मरे। समुद्र में बूंद है, बूंद ही समुद्र है। आत्म और परमात्म में कोई भेद नहीं है, यह अंदर की दुविधा अंदर ही मार दो। वह जितने गहरे उतरे, उतना 'वह नदियां' कभी नहीं उतरी थीं। वह जैसे बहे, वैसी कभी बयार न बही थी। यह सब पञ्जाब के लिए अपूर्व था।      नानकदेव ने ब्रह्म-जीव एकता का साक्षात किया... आतम महि राम राम महि आतम, चीनसि गुर वीचारा। आत्म ही राम है, राम ही आत्म है...ऐसे गुरु ने विचार करके पहचाना है। हालांकि, यहां राम का अर्थ दशरथनंदन से करना उचित न होगा...बल्कि राम-ब्रह्म से करना उचित है। क्योंकि अपने कुछ शबद में नानकदेव ने स्पष्ट भी किया है। ब्रह्म-जीव अद्वैत को साक्षात करने से पूर्व नानकदेव को जीव की अनंतता व उसकी सत्ता का भान मिल चुक...

निर्मल संत: नानकदेव की भेष, भावना और दशम गुरु के वरदान पाए सिखी के सारथी

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काहूँ से न राखे राग, दवैख हूँ न काहू संग, लोक कुल लाज खट खटो जिन न को है।  निम्रता से भरे रिदे निपुनता घरे रहे, राम क्रिश्न हरे पारब्रहम बोध जाको है।  निगम प्रवाह नितय जिन के निहाल सिंह, गिरा गुरु ग्रन्थ की मैं जाको प्रेम बाको है। निताप्रति निरोपाधि अहंबा बोध जाके, द्वैत मल कटी निरमले नाम या को है।      गुरु नानक पर विमर्श करना पंचनद की पावनता को साक्षात करना है, उसी प्रकार निर्मल संत परंपरा पर कुछ कहना या लिखना अमृत सरोवर में स्नान करने जैसा है। सिखों के आदिगुरु नानकदेव की भेष व भावना और दशम गुरु के वरदान से नवाजे इन संतों की परंपरा अनूठी है। सिमरन, साधना और संतोष से अद्वैत बोध को प्राप्त हुए यह संत 'सिखी के सारथी' हैं। सारथी ऐसे जैसे सूर्य की सारथी उसकी रश्मियां हैं। निर्मल सिख...नाम के साथ शास्त्री और वेदांताचार्य जैसी उपाधि जोड़ने वाले सिख सन्यासियों का एक समूह..जो अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के 13 अखाड़ों में से एक है। यह ऐसे सिख साधु हैं, जो कुंभ के समय शाही स्नान करते हैं। भारत की साधु परंपरा व पर्याय को यथारूप जीते हैं, साथ ही अमृतधारी सिख भी हैं। सिख पंथ क...

मार्किट डिमांड के अनुरूप गुरु

     गुरु घंटाल हुए हैं, तो चेला चापड़ हो गए हैं। आज गुरु-शिष्य दो छोर हैं, जो स्वार्थ के प्रवाह से जुड़े हैं। आदान-प्रदान हो रहा है, हाथ-मिलौव्वर का जमाना है। परस्पर पोषण कसौटी है।  गली-गली गुरु उपजे हैं। स्वयंसिद्धाओं की मंडी लगी है। चेले गुरु की 'पहुंच' देखकर वंदन करते हैं। गुरु की प्रज्ञा नहीं स्टेटस महत्वपूर्ण है। चापड़ चेले शिष्यता लेने उन्हीं के यहां जाते हैं, जिनके पास ब्रांड न्यू वाहन हो व बॉम्बे डाइंग वाला सोफा लगा हो। गुरु को दंडवत करते प्रशासनिक अधिकारियों व राजनेताओं की तस्वीरों से दीवार आच्छादित हो, सो तत्काल दंडवत प्रणाम। दीक्षा सम्पन्न। जिसमें थोड़ा सद्भाव है भी, वह 'इन्फॉर्मेशन डिस्ट्रीब्यूटर' और गुरु का भेद ही नहीं समझ पाए हैं। इस फील्ड में दद्दा लोगों का दबदबा है। दद्दा लोग 'पॉपुलैरिटी' की चलती फिरती 'हाइड्रोलिक प्रेशर' मशीन हैं। प्रज्ञावान शिक्षकों को  वह 'दाब' देते हैं, "बोलने से पहले मेरे फॉलोवर की लिस्ट देखो। तब मुंह खोलो।" हिये तराजू तौलिके के नहीं, फॉलोवर लिस्ट देखिके बोलो।'  अब उन्हें कौन बताये कि हम जैसे लोग ...

पूर्वैरप्यकृतं....कृतं

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       भारत का समाज सदियों से खंडहरों में उलझा है। वह वहीं ठहर गया है। कुछ घाव ऐसे हैं, जिन्हें वह देखता है रोता है लेकिन उनका उपचार नहीं करता---या करना नहीं चाहता। प्रति पल भग्न होते उन अवशेषों में उसका 'स्व' क्षरित होता जाता है, अलबत्ता वह उन्हें गौरव कहकर प्रसन्न होता है। भव्य भवनों व ऊर्जा केंद्रों के भग्न रूपों को 'गौरव' बताती सैकड़ों पोस्ट आंखों से गुजर जाती हैं। उसपर गर्व करने वाले हजारों और उसकी स्थिति को लेकर शिकायत करने वाले लाखों भी उसी पोस्ट के सापेक्ष गुजरते जाते हैं। लेकिन, वह गुजरना कभी गुजरता नहीं। उसकी आवृत्ति होती रहती है।      आगे बढ़ने को, जो अनिवार्य संतोष चाहिए होता है, उससे यह समाज वंचित हो गया है। अलबत्ता उसे शिकायतों का संत्रास झेलना ही बदा है। हर कोई बता देता है कि उसके 'बिखरे अस्तित्व', 'विपन्नता' व 'उचाट मन' का कोई दोषी 'वह' है। उसने अपनी स्व की सत्ता में हर हस्तक्षेप का श्रेय किसी न किसी को दे रखा है। स्वयं न कोई जिम्मेदारी ली है, न जवाबदेही। शिकायतों का सरोवर कभी सूखता नहीं, आत्मावलोकन होता नहीं।       दी...

ज्ञानवापी पुनरुद्धार

     भारत के प्राण परंपरा में है, परंपरा के प्राण सातत्य में। यह सततता सांसों की तरह घटित होती रहना जरूरी है। हालांकि सातत्य को सुनिश्चित करना दुरूह है, जब निरंतर प्रहार होते रहे हों। इसीलिए, हमारे पूर्वजों ने पुनर्जागरण की प्रविधि अपनाई। जो जहां रुक गया था, उसे छोड़ा नहीं वहीं से लेकर आगे बढ़े।  विधर्मी इसे जानते हैं। इसीलिए, उनका हमेशा प्रयास है कि इस प्रवाह को रोकें। जबकि उन्हें पता होना चाहिए कि प्रवाह को रोकना प्रलय का कारण बनता है। वह अपने साथ, अवरोध के हर निशान बहा ले जाता है।  ज्ञानवापी ही नहीं, भारत के कई प्राचीन मंदिर बीच में वर्षों तक खंडहर रहे हैं। फिर, पुनर्जागरण ने उन्हें प्रदीप्त किया। बौद्ध उत्कर्ष देखकर नहीं लगता था कि सनातन का अनादि प्रवाह अनंत तक चलेगा। लौ मद्धिम हो रही थी। तभी आद्य शंकराचार्य आये और बुझते दीये को तेल से भर दिया। शंकराचार्य की प्रेरणा के बाद कई प्राचीन मंदिरों के घंटे पुनः बजने लगे।  ऐसा इस देश ने बहुत बार देखा है। हमारे ज्ञान केंद्र और मंदिर छीने गए, अपवित्र हुए। लेकिन उचित समय आने पर उन्हें पुनर्प्रतिष्ठा मिली। हालांकि कभ...