नानकदेव: गुरु हरि मिलिआ भगति दृढ़ाई।

    पञ्जाब की 'नदियां' उथली हैं, इसलिए बहती तेज हैं। पर, आपस में मिलती नहीं..वहां नदी ही नहीं, 'पानी' भी पांच है। नानकदेव ने उस 'पानी' को एक पहचाना।  तंतु निरंजन जोति सबाई सोहं भेदु न कोई जीउ...इसी अभेद को उन्होंने बार-बार प्रतिष्ठित किया है। सागर महि बूंद बूंद महि सागरु....आतम परातम एको करे, अंतरि दुबिधा अंतरि मरे। समुद्र में बूंद है, बूंद ही समुद्र है। आत्म और परमात्म में कोई भेद नहीं है, यह अंदर की दुविधा अंदर ही मार दो। वह जितने गहरे उतरे, उतना 'वह नदियां' कभी नहीं उतरी थीं। वह जैसे बहे, वैसी कभी बयार न बही थी। यह सब पञ्जाब के लिए अपूर्व था।
    नानकदेव ने ब्रह्म-जीव एकता का साक्षात किया...आतम महि राम राम महि आतम, चीनसि गुर वीचारा। आत्म ही राम है, राम ही आत्म है...ऐसे गुरु ने विचार करके पहचाना है। हालांकि, यहां राम का अर्थ दशरथनंदन से करना उचित न होगा...बल्कि राम-ब्रह्म से करना उचित है। क्योंकि अपने कुछ शबद में नानकदेव ने स्पष्ट भी किया है। ब्रह्म-जीव अद्वैत को साक्षात करने से पूर्व नानकदेव को जीव की अनंतता व उसकी सत्ता का भान मिल चुका था। न जीउ मरे, न डूबे, तरे...तिनके नाम अनेक अनंत। जीव अनंत है और अंनत से अलग उसका अपनी सत्ता देखना भ्रम व अज्ञानता है....न वह मरेगा न डूबेगा...बस तर जाएगा। जह-जह देखा तह-तह तू है, तुझसे निकसी फूटि मरा....जहां देखता हूं उसी सत्ता को देखता हूं.. उसी से निकलता है, फूटकर उसी में मिल जाता है। जैसे मिट्टी से घट बना...अरूप होकर फिर मिट्टी हो गया। 
    
प्रश्न है कि जब आत्म-परमात्म में भेद नहीं है, तो उसे जाना कैसे जाए? तो नानक ने कहा, 'जिनी आतम चीनिआ परमातमु सोई...जिसने आत्म को जान लिया वह स्वयं ही परमात्मा हो गया। जानना परमात्म को नहीं, आत्म को है। आत्म को जानते ही परमात्म हो जाना निश्चित है। नानकदेव ने अद्वैत की प्रतिष्ठा की। अलबत्ता उन्होंने जगत को मिथ्या नहीं माना। उन्होंने परमात्मा के बनाये हर रूप, खंड व आकार सत्य माना....सच तेरे खंड, सचे ब्रह्मण्ड। देश के अन्य हिस्सों में आध्यात्मिक क्रांति घट चुकी थी। उससे 'इस' प्रवाह को जोड़ने के लिए उन्होंने 'उदासियाँ' (आध्यात्मिक यात्राएं) कीं। इससे ब्रह्म-जीव अभेद के साथ ही पंथ-अभेद भी स्थापित हो गया। श्रीगुरूग्रंथसाहिब में वेद, उपनिषद से लेकर कबीर, मीरा, नामदेव, गोरख..सूफियों तक का समवेत प्रकाश उभरा है। यही उनकी गुरु रूप में सिद्धि भी है...सो गुरु करउ जि सानु दृड़ावे, अकथ कथावै सर्बादि मिलावे...गुरु वही जो सत्य पर दृढ़ रहना सिखाये, जो अनकहा है उसे कहे, सबसे मिलाए। नानक को पढ़ते-समझते समय एक चुनौती उभरती है, वह यह कि यह सब बातें पूर्व में अनेक तरह से कही गई हैं। कुछ लोग इन बातों से वेदों व अन्य ग्रथों से साम्य सिद्ध करने लगते हैं, कुछ को नानक रामानंद की परंपरा के वैरागी दिखने लगते हैं। जबकि, यहां एक बात समझने की है---सत्य एक ही है। सबने उसे अलग तरह से कहा ही है। 

     नानक इस दृष्टि में अनूठे हैं क्योंकि कहने की जो प्रविधि उन्होंने अपनाई, वह अपूर्व है। उन्होंने समाज, राजनीति, पंथ सबको ठीक से जान लिया था...वे जानते थे कि रूढ़ियों, आडंबरों व अध्यासों की धुंध घनी है। यदि यह छंट जाए तो सबका कल्याण निश्चित है। एक बार उन्होंने ब्राह्मणों को संबोधित कर कहा कि यदि सच में तुम ब्रह्म विचार करने लगो तो तुम्हारा, तुम्हारे कुल व लोक सबका मंगल निश्चित है। तुम जो हो, उसे ही ठीक से जीने लगो। तुम जो हो उसे ही ठीक से समझकर स्व'भाव में रहने लगो..तो समस्या सुलझ जाए। उन्होंने यह माना कि साधुता का किसी परंपरा व पंथ से अनिवार्य संबंध नहीं। गुरु और शिष्य भी इससे बंधे नहीं। बल्कि, गुरु और शिष्य दोनों अनन्योन्याश्रित हैं। गुरु और शिष्यों का संबंध समुद्र व नदी के समान है..गुरू समंदु नदी सम सिखी। गुरु की अनन्तता शिष्यों की सिद्धि में है...और शिष्यों की सिद्धि है गुरु तक पहुंचकर भागवत हो जाना। 


त्रासद है, किसी गुरु की परंपरा पंथ बन जाये। नानकदेव के विषय में भी यही हुआ। उन्होंने पुरातन 'पर्वतों' पर बड़ी चोटें की थीं, तब यह प्रवाह खुला था। तब उनकी गुरु परंपरा बनी थी। जब परंपरा पंथ हुई तो प्रवाह 'कुंड' हो गए।

जिस सतगुरु ने प्रवाहों का अभेद सिद्ध किया था, उनके शिष्य पंथ में बंट गए। सहजधारी, नामधारी, खालसा (अमृतधारी), कूका... निरंकारी हो गए। उनकी शिक्षा व साधुता का संवहन कुछ हद तक 'उदासी' सम्प्रदाय ने किया..लेकिन फिर सिखों के लिए उदासी त्याज्य हो गए। अब न किसी को उदासी ध्यान है, न 'नानक दी उदासियाँ'। अलबत्ता, इन सबसे नानक का परमात्व प्रभावित नहीं होता है। आकाश का जल विष और अमृत दोनों का भेद किये बिना दोनों घटों में समान रूप से बरसता है...लेकिन वह घट के विष व अमृत दोनों से अलिप्त रहता है। सतगुरु नानक को सबके कल्याण का श्रेय है, लेकिन अपलाप के दोष से वह अलिप्त हैं। वह भारतीय अध्यात्म आकाश में ध्रुववत हैं। हमारे पुरखे हैं, पुरोहित हैं। 


ऐसा हमरा सखा सहाई...गुरु हरि मिलिआ भगति दृढ़ाई।

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