परशुराम का परशु प्रतीक है, पर्याय नहीं।

शस्त्र का अधिकार उसे है, जिसके हृदय में न्याय स्थापित है। जो शास्त्रों की शाश्वतता को स्वीकारता हो, शस्त्र का सम्यक उपयोग वही कर सकता है।  वही समझ सकता है कि वीरता पाशमुक्ति है, पाशबद्धता नहीं। मुक्ति का संघर्ष 'अधिकार की कामना' न बन जाए, इसका आश्वासन 'महावीर' ही दे सकता है। परशुराम की न्याय प्रतिबद्धता ऐसी है कि उन्होंने स्वयं के हृदय में तो न्याय की स्थापना की ही, इसे समाज तक प्रसारित किया। साथ ही ऐसे लोगों को शस्त्रविद्या से सम्पन्न किया जिनकी न्याय प्रतिबद्धता असंदिग्ध थी। 


परशुराम का परशु प्रतीक है, पर्याय नहीं।


उन्हें संहारक के रूप में नहीं, उद्धारक के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि न्याय की अवधारणा तब तक असिद्ध है जब तक 'दुष्कृताम्' के विनाश के साथ 'साधुओं का परित्राण सुनिश्चित न हो।  परशुराम ने एक आतताई का विनाश किया तो दस सद्चरित्रवान योद्धाओं को प्रतिष्ठित किया। एक 'दूषित' नगर का ध्वंस किया तो हजारों गांव बसाए। उनका संघर्ष मुक्ति के लिए था, कुछ पाने के लिए नहीं। इसीलिए उन्होंने जीती हुई भूमि पर शयन तक नहीं किया। स्वयं सागर से मिली भूमि पर बसना स्वीकार किया।  

युद्ध उनके लिए न्याय प्रतिबद्धता थी, वैयक्तिक द्वेष की प्रेरणा नहीं। 


योद्धाओं का शस्त्र प्रेम ऐसा होता है कि वह उसे अपनी देह का हिस्सा मानते हैं और मृत्यु शैय्या तक उसका त्याग नहीं करते। लेकिन, परशुराम ने धरती को आतताइयों से मुक्त करने के बाद देवराज इंद्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिए। पास रखी सिर्फ विद्या। उन्होंने शस्त्र को साधन की तरह उपयोग किया, उससे आसक्ति नहीं पाली। न ही उसे अपना पर्याय बनने दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि शस्त्र प्रयोग की सीमा है। अपरिहार्य स्थितियों में ही उसका उपयोग होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी समझाया कि निर्बलता अत्याचार का आह्वान है। निर्बल को सबल होना पड़ेगा। इसीलिए उन्होंने आत्मरक्षा की विद्याओं का प्रचार किया। दक्षिण की कलराई व पट्टू के प्रतिपादक वही हैं। आचार्य परशुराम की प्रेरणा से ही भारत में शस्त्रविद्या व आत्मरक्षा की विद्या सर्व सुलभ हुई। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि शस्त्रविद्या से ऐसे लोगों को दूर रखा जा सके जो अत्याचार, अन्याय व स्वहित के लिए उसका उपयोग करें। उन्होंने ऐसे लोगों को ही शस्त्र विद्या देने के लिए चुना को राज्य द्वारा रक्षार्थ नियुक्त किये गए हों।  

परशुराम उन आचार्यों की परंपरा में अग्रणी हैं जिन्होंने समाजशोधन में नारियों की महती भूमिका को स्वीकार किया। इसके लिए उन्होंने अनसुइया व लोपामुद्रा जैसे विदुषियों की अगुवाई में विराट नारी जाग्रति अभियान चलाया। 
 
परशुराम शास्त्र व शस्त्र के सायुज्य की चिरंजीवी परंपरा हैं। वह जातीय गौरव नहीं है, सनातन गौरव हैं। 

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