आज हम ‘ग्लोबल विलेज’ के ताने-बाने में एक ‘बाना’ बनकर खुश हैं। हम यह मानकर चल रहे हैं कि पश्चिमोन्मुखी इस अवधारणा में अपनी पद्धतियों, अभ्यास और आकांक्षा का विलय ही हमारा भविष्य है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि ‘विलेज’ मानव समूह की प्राथमिक इकाई नहीं है, पहली इकाई परिवार है। साथ ही, हमारी जरूरतें व आकांक्षाएं वैयक्तिक और पारिवारिक स्तर पर विकसित हुई हैं। हमारी संस्कृति के आधार ग्रंथों ने दुनिया के एक ‘नीड़’ हो जाने की कामना की थी, लेकिन तब भी वैविध्य और वैशिष्ट्य जिस तरह से भारत में पल्लवित-पुष्पित हुआ—ऐसा कहीं न हुआ। क्योंकि यहां नकार का भाव शून्य था। ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा में ऐसी उदारता नहीं है। इसमें लोकप्रियतावाद का आरोपण बहुत सी अच्छी पद्धतियों, अभ्यास और आकांक्षाओं का अहित कर रहा है। इसी का परिणाम है कि ‘पीपल और बरगद’ के लिए उपयुक्त भूमि व जलवायु में लोग ‘चिनार’ के पेड़ लगा रहे हैं। चिनार लगाने की कोशिश में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन चिनार के मोह में पीपल-बरगद का नकार चिंताजनक है। यहां चिनार और पीपल को प्रतीक की तरह देखा जाना चाहिए।
हम यह सब जानते समझते हुए भी स्वयं को असहाय पा रहे हैं। क्योंकि, इस सबमें प्रभावी कारक शिक्षा की पद्धति और पाठ्यक्रम है। बच्चा संस्कृति से सर्वाधिक अभ्यास प्राप्त करता है, वह भी स्वाभाविक तौर पर। विद्यालयी शिक्षा बहुधा इसी का विरोधाभास होती है। आरम्भ से ही बालमन में यह विरोधाभास भरता जाता है। जो उसके पास सहज है, उसका प्रमाणन विद्यालय की शिक्षा नहीं करती है उलटे उसे खारिज करती है। इससे दीर्घकालिक द्वंद्व शुरू होता है, और अंत में ‘ग्लोबल’ की चमक में वह सब विलय कर निर्वृत्ति पा लेता है।
यहां कोई विवाद नहीं है कि आधुनिक शिक्षा ने भौतिक जीवन को बेहद सरल बनाया है और उतना ही निर्विवाद तथ्य यह भी है कि इस शिक्षा ने मनुष्य के मानसिक, भावनात्मत्क, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक पक्ष को उतना ही कुंद किया है। शुरू से ही छात्रों को जिस तरह से पाठ्यक्रमों से शिक्षा दी जाती है, वह उनके लिए किसी दूसरे ग्रह की बातें लगती हैं। वह जो पढ़ते हैं उसे आस-पास देख नहीं पाते और उसके प्रायोगिक पक्ष से खुद को जोड़ नहीं पाते, जिससे विवेचना, अन्वेषण और आलोचनात्मक सोच का कोई स्कोप ही नहीं बनता। आप आरंभिक कसौटी ‘देश-काल’ पर देखें तो देशज ज्ञान, परम्परा व अभ्यास को तो नकार ही दिया गया है।
सामान्य सी बात है कि छात्र अमेरिका की राजधानी जानता है लेकिन उसे अपने जनपद में तहसीलों की संख्या का ज्ञान नहीं है। वह दूसरे गोलार्ध में बसे देशों की भाषा व संस्कृति से परिचित है, लेकिन उसे अपने जनपद या स्थानिक भाषा, संस्कृति की जानकारी नहीं है। अपने आस-पास के ज्ञान को नकारकर सात समुन्दर पार के परिवेश का अध्ययन कहीं से भी तार्किक नहीं कहा का सकता है, न ही इसके लिए भूमंडलीकरण की दुहाई दी जा सकती है। भूमंडलीकरण का मलतब अपनी स्थानिक पहचान को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना है, न कि औरों की खोज-संधान-पहचान को ढोना और अपनी नकार देना। वह भी जरुरी हो सकता है, लेकिन अपनी नकार के शर्त पर नहीं।
विद्रूप यह है कि आत्मविस्मृति के सुंरग में खड़े होकर हम स्वदेशी की बात करते हैं, जबकि स्व का बोध हमें है नहीं।
जब हम स्वदेशी जागरण की बात करते हैं तो हमें समझना होगा कि स्थानिक बोध में ही स्वदेशी की सिद्धि भी है। इसे समझने के लिए हमें स्वदेशी को ठीक से समझना होगा। देश की परिधि छोटी है, देश का मतलब राष्ट्र नहीं है। देशजता की परिधि वह है, जहां दिन में जाकर दिन में ही लौटा जा सके। लोकजीवन में एक ही प्रदेश के दूसरे नगर ‘परदेश’ हो जाते हैं। स्वदेशी का अभिप्राय, उसी देशजता की परिधि में उपलब्धता सुनिश्चित करना। यानि परिवहन और प्रसंस्करण पर कम से कम निर्भरता। यह महंगाई से निजात का सूत्र भी है। अतः स्थानिकता बोध से ही स्वदेशी की भी सिद्धि है। जब एक निश्चित परिधि में अधिकतर आवश्यकताओं की आपूर्ति संभव हो सके। यह सब महज बातें नहीं है। कई उन्नत समाज व देश इसका उदाहरण हैं।
गहराई से देखें तो समस्या व समाधान का सह-अस्तित्व है, आवश्यकता व आपूर्ति का सह-अस्तित्व है। हमें बस दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। एक उदाहरण के तौर पर देखें तो सांप के जहर का निरोध करने वाली औषधि सांप के पर्यावास के आस-पास ही मिलती है। इलाज वहीं है, लेकिन अज्ञानता के चलते हम बाजार को भागते हैं। इससे समय, धन और जीवन तीनों की हानि होती है।
हमें यह समझना होगा कि सब जगह एक जैसा स्थापत्य, एक जैसा आहार, एक जैसा आधारभूत ढांचा नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि भौगोलिक संरचना व जलवायु एकरूप नहीं है। हमें यह विश्वास करके चलना होगा कि प्रकृति ने जिस जलवायु में जिन फलों-वनस्पतियों को जीवंत किया, वह व्यवस्था अनन्य है। उस नकारकर कोई विकल्प नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह सब लम्बे क्रमिक विकास का परिणाम है।
इसके निदान के तौर पर हमें स्थानिकता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। स्थानिक बोध पाठयक्रम आधारित शिक्षा में आरंभिक पाठ होना चाहिए। शिशु की शिक्षा के प्रथम पांच वर्ष स्थानिकता को समर्पित हों और इस दौरान उसे अपनी स्थानिकता का ही बोध कराया जाये। जैसे स्थानीय भाषा, जलवायु, पशु पक्षी, वानस्पतिक जीवन इत्यादि। आगे के अध्ययन काल में छात्रों को स्थल पुराण, भूगोल, स्थानीय इतिहास, पाक कला, खेल आदि से परिचय कराया जाये। यदि हम बच्चों को मोटे तौर अपनी स्थानिक पहचान का बोध करायें तो भी इसके दूरगामी परिणाम यह होंगे, उसे अपने परिवेश को जान समझकर उसके अनुरूप जीवन जीने की कला विकसित करने में आसानी होगी व स्थानिक पहचान के प्रति अभिमान-बोध हो जायेगा। सर्वाइकल का सूत्र भी यही है।
अभी राजकीय आह्वान पर लोकल फॉर वोकल एक अच्छा प्रयास चल रहा है। लेकिन, लोकल को वोकल करने के लिए लोकल को जानना भी तो जरुरी है। हर छोटी-बड़ी चीजों को बाजार भागने, और हर ज्ञान को किताब पलटने की प्रवृत्ति अच्छी नहीं है। जब सहज ही आस-पास आपूर्ति और ज्ञान उपलब्ध है, तो उसे नकारकर आयातित ज्ञान और सामान की दीवानगी शुभ नहीं है। आज हमें स्थानिक बोध को शिक्षा का आधार बनाने पर संकल्पित होने की आवश्यकता है, जबकि हम लगातार इसकी उपेक्षा कर रहे हैं जोकि ठीक नहीं है। इससे बच्चों पर कोई अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ना है, बल्कि इससे उनके द्वंद्व का ही निदान होना है।
(युगवार्ता के जनवरी अंक में प्रकाशित)
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