भारत की भाषाई अवधारणा विश्वभर में अनूठी है। भाषा-विज्ञान की पाश्चात्य अवधारणा से अलग भारत की भाषा सम्बन्धी अवधारणा में एकात्म दृष्टि है और अंतर्भाषिक सम्बन्ध की स्वीकृति भी। भाषा की भारतीय अवधारणा ने भाषाओं के मध्य संगमन पर हमेशा जोर दिया है। विविध भाषाओं में एकत्व की धारणा के कारण ही निरुक्तकार यास्क ने वैदिक और लौकिक शब्दों की समानता के अंतर्गत अर्थ को स्थित माना है। शौनक ने भी अर्थ संधान की दृष्टि से वैदिक और लौकिक वचनों में सम्बन्ध मानते हुए कहा है कि जो वैदिक है उसे लौकिक बना लेना चाहिए। इस क्रम में संस्कृत ने न सिर्फ भारतीय भाषाओं की प्रतिनिधि भाषा के रूप में काम किया बल्कि भारतीय भाषाओं की व्याकरणिक व्यवस्था में सहयोग दिया। इस तरह से भारत की सभी भाषाओं में परस्पर आदान-प्रदान होता रहा है। साथ ही उनके परिष्करण में संस्कृत अपनी भूमिका निभाती रही है। अधिकांश भारतीय भाषायें संस्कृत व्याकरण दर्शन का ही अनुशरण करती हैं। जिन भाषाओं का उद्गम संस्कृत नहीं है, या जिनके साथ संस्कृत ने सहयात्रा की है उनके परिष्कार में भी संस्कृत का बड़ा योगदान रहा है। इसी के परिणामस्वरुप उत्तर और दक्षिण भारतीय भाषाओं की वाक्य रचना में प्रकृति एवं प्रत्यय में, शब्द धातु में, कथन शैली में, भाव धारा में एवं चिंतन प्रणाली में यत्र-तत्र-सर्वत्र समानता मिलती है। आधुनिक भारतीय भाषाओं में जैसा प्रकट भेद दिखता है वैसा लोकभाषाओं में नहीं है। लोकभाषायें एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। परवर्ती तमिल सिद्धों की ‘बानी’ उत्तरापथ के संतों की ‘वाणी’ से मिलती है। अवधी से पूरब चलें तो क्रमशः भोजपुरी, बज्जिका, मैथिली, बंगला, असमिया आदि में अंतर और एकत्व की छटाएं दिखेंगी। इसी प्रकार अवधी से दक्षिण चलें तो कुछ परिवर्तन के साथ बुन्देली, बघेली से छत्तीसगढ़ी जुड़ी हुई मिलेगी। छत्तीसगढ़ की एक भाषा का रूप कलिंगा उड़िया से जुडा हुआ है दूसरा बस्तर का भाषा रूप हाल्वी तेलगु के निकट पहुंचता है।

भाषाओं के विकास मार्ग को समझकर यदि आप पदयात्रा शुरू करें तो बिना भाषाई कक्षा लिए
देशभर की भाषा जान सकते हैं और आपको संवाद की कहीं कोई समस्या नहीं होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि भाषा में अंतराल के साथ आंशिक लेकिन क्रमिक परिवर्तन होता और फिर वह नया रूप ले लेती है। इस तरह से आत्मा के स्तर पर भारत की सभी भाषाएं एक हैं, और विभेद मात्र व्यवहारगत है।
हमें एक ऐसी भाषा का चयन करना है जो इस एकात्मता का प्रतिनिधित्व कर सके। संस्कृत की थाती हिंदी को उत्तराधिकार में मिली है। अतः, भाषाई एकात्मता की प्रतिनिधि के रूप में हिंदी को स्वीकार्यता पाने का अधिकार है। हिंदी के विकास के क्रम में अनेक भाषाओं के शब्द उसमें घुल-मिल गये हैं। तब भी, भारतीय भाषाओं की शिकायत है हिंदी भाषा-भाषियों ने उनके साथ सहोदर सा व्यवहार नहीं किया है। जबकि ऐसा है नहीं। हिंदी में उसकी लोकभाषाओं व भारतीय भाषाओं के हजारों शब्द व्यवहार में हैं। यथा- श्री और श्रीमती का प्रयोग तिरु और तिरुमती से प्रेरित है। यह दक्षिण की भाषाओं से हिंदी को मिला है। ऐसे अनेक उदारहण दिए जा सकते हैं। हालांकि, अलिखित को लिखित करने के दुष्परिणाम भी सामने आये। शब्दकोशों के निर्माण से पूर्व भाषाई संगमन की जो गति थी, वह शब्दकोशों के निर्माण के बाद मंद पड़ गई। भाषाओं की सीमारेखा खींच दी गई। आज आवश्यकता इस संगमन को बढ़ाने की है। हिंदी में भारतीय भाषाओं के इतने शब्द सजा दिए जायें कि सभी भाषा-भाषियों को अपनेपन का आभास हो। ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा ही है कि स्व का बोध ही प्रिय बनाता है। जब तक भारतीय भाषा-भाषियों को हिंदी में वह स्व स्पष्ट रूप से नहीं दिखेगा, स्वीकार सिद्ध न हो सकेगा। ऐसा करने में भाषा-विज्ञान सम्बन्धी कोई चुनौती नहीं आएगी। क्योंकि भाषाई विभेद का कोई वैज्ञानिक आधार है ही नहीं। विरोध सिर्फ प्रकट स्वरुप व व्यवहार को लेकर हो रहा है। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु में हिंदी का जो विरोध हुआ, उसका भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसकी प्रस्तावना पादरी रोबर्ट कोल्डवेल ने लिखी थी। पादरी रोबर्ट कोल्डवेल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक भाषा-ज्ञान के प्रवर्तकों ने शोधादि का स्वांग रचकर यह साबित कर दिया गया कि उत्तर भारत की भाषाओं का यूनानी, ईरानी, जर्मन और लातीनी भाषाओं से सम्बन्ध तो है लेकिन विध्यांचल के दक्षिण में प्रचलित ‘उन भाषाओं’ से इनका कोई सम्बन्ध नहीं, जिसकी वैयाकरणिक व्यवस्था उत्तर से जाकर ऋषि अगस्त्य ने बनाई थी। अपनी पुस्तक ‘द्रविड़ भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन’ के जरिये कोल्डवेल ने तमिल लोगों में उस भावना बीज बोया कि उनकी भाषाओं का उत्तर भाषाओं से कोई मेल नहीं हो सकता है। वहीं जब उत्तरापथ और दक्षिणापथ की परम्परायें, शास्त्र, सामाजिक व्यवस्था व आराध्य देव एक ही हैं फिर उनकी भाषा में कोई अंतर्भाषिक सम्बन्ध न हो? ऐसा कैसे हो सकता है?
अधिकांश जटिलतायें व भाषाई संघर्ष राजनीतिक मूढ़ता व अदूरदर्शिता का परिणाम हैं। स्वतंत्र भारत के प्रान्त विभाजन में एक बड़ी राजनीतिक चूक हुई। आजादी के बाद देश में प्रान्तों या राज्यों का बंटवारा भाषाई आधार पर हुआ और वर्तमान में भारत के प्रत्येक प्रान्त के पास अपनी एक अभ्यासी भाषा है। इससे भाषा आधारित राजनीति शुरू हुई और पादरी कोल्डवेल की आत्मा को फिर से जाग्रत किया गया। कोल्डवेल का महिमामंडन शुरू हुआ, मरीना बीच के पास उसकी मूर्ति स्थापित हुई। दक्षिण में सक्रिय मिशनरियां इसकी प्रायोजक रहीं। देखते- देखते भाषाई आधार पर कथित ‘आर्य और द्रविड़’ के बीच दीवार मोटी और ऊंची होती गई।
जबकि, उससे पहले देश में ऐसी स्थिति कहीं नहीं थी। आजादी से दो दशक पूर्व ही तमिलनाडु में हिंदी के प्रचार-प्रसार को अपार समर्थन मिला था और वहां एक के बाद एक शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय खोले गये थे। इसमें महात्मा गांधीजी के कनिष्ठ पुत्र देवदास गांधी, डॉ सीपी रामस्वामी अय्यर, पं. हरिहर शर्मा, पं. ऋषिकेश शर्मा, स्वामी सत्यदेव, मोटूरि सत्यनारायण, देवदूत विद्यार्थी और राम नरेश त्रिपाठी सहित कई मनीषियों का बड़ा योगदान रहा। बालसुब्रमण्यम जी ने राजभाषा भारती में लिखा था कि तमिलनाडु में हिंदी प्रचार की सफलता का प्रमुख कारण यह रहा कि तमिलनाडु के लोगों को हिंदी सीखने में बहुत आनंद आया, अपनापन सा लगा क्योंकि भाषा की प्रकृति के स्तर पर हिंदी और तमिल के क्रियापदों व क्रियापद की रचना में जो अद्भुत समानता मिलती है वह खड़ी बोली और अवधी में नहीं मिलती या तमिल और मलयालम में नहीं मिलती।
हमें भारतीय भाषाओं की एकात्मता को स्थापित करना है। उसके लिए उन शब्दों का कोश तैयार करना होगा जो सभी भाषाओं में एक ही अर्थ में प्रयोग किये जा रहे हैं। उपयुक्तता के आधार पर विविध भाषाओं के शब्द हिंदी में प्रविष्ट करने होंगे। इससे हिंदी एकात्मता की प्रतिनिधि और अखिल हिंदुस्तान की अपनी भाषा बन सकेगी।
---हिन्दुस्तानी भाषा भारती के जुलाई-दिसंबर २०२१ अंक में प्रकाशित
वाह बहुत बधाई अरुण जी।🌺🙏
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