शिक्षा में स्थानिक बोध की उपेक्षा ठीक नहीं
आज हम ‘ग्लोबल विलेज’ के ताने-बाने में एक ‘बाना’ बनकर खुश हैं। हम यह मानकर चल रहे हैं कि पश्चिमोन्मुखी इस अवधारणा में अपनी पद्धतियों, अभ्यास और आकांक्षा का विलय ही हमारा भविष्य है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि ‘विलेज’ मानव समूह की प्राथमिक इकाई नहीं है, पहली इकाई परिवार है। साथ ही, हमारी जरूरतें व आकांक्षाएं वैयक्तिक और पारिवारिक स्तर पर विकसित हुई हैं। हमारी संस्कृति के आधार ग्रंथों ने दुनिया के एक ‘नीड़’ हो जाने की कामना की थी, लेकिन तब भी वैविध्य और वैशिष्ट्य जिस तरह से भारत में पल्लवित-पुष्पित हुआ—ऐसा कहीं न हुआ। क्योंकि यहां नकार का भाव शून्य था। ‘ग्लोबल विलेज’ की अवधारणा में ऐसी उदारता नहीं है। इसमें लोकप्रियतावाद का आरोपण बहुत सी अच्छी पद्धतियों, अभ्यास और आकांक्षाओं का अहित कर रहा है। इसी का परिणाम है कि ‘पीपल और बरगद’ के लिए उपयुक्त भूमि व जलवायु में लोग ‘चिनार’ के पेड़ लगा रहे हैं। चिनार लगाने की कोशिश में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन चिनार के मोह में पीपल-बरगद का नकार चिंताजनक है। यहां चिनार और पीपल को प्रतीक की तरह देखा जाना चाहिए। हम यह सब जानते समझते हुए भी स्वयं को असहाय पा र...