उतार की बारिश और जमुना किनारे हम
बारिश से मोहक कोई आवृत्ति नहीं। उतार से अधिक पुलकित कोई अवस्था नहीं। उतार में उत्साह सघन होता है। जैसे भोर में नौटंकी के उतार का नगाड़ा, जैसे घर मुंहा होते ही मतवाले बैलों की सरपट चाल---उतार की अलग ही पुलक होती है। पड़ाव दिखने लगता है तो उसके आकर्षण का बल भी खींचता है, शायद इसीलिए गति बढ़ जाती है। बादलों के अंतिम कार्य दिवस चल रहे हैं। कास तो कब की फूल चुकी है, धरती उन्हें लौट जाने को कह रही है। लेकिन, बादल शायद विजेता की तरह लौटना चाहते हैं। प्रत्यावर्तन नहीं करना चाहते। आज उन्होंने आसमान को चौगिर्द घेर रखा है। जैसे कह रहे हैं, माघ की ओरियां चूने में अभी देर है। सूखे सावन की शिकायतें भी हैं। आज मन भर बरसकर लौटते हैं। हवाओं ने हमें छूकर कई बार मेघराज की मंशा बताई है। हम आसमान को निहारकर खुश हो रहे हैं। गौवों के नवजात पुलकित पायों से चौकड़ी भर रहे। जिस कार्यक्रम के लिए हम यहां थे उसका समापन हो चुका है। बच्चे जा चुके हैं, मोर निर्भय होकर झाड़ियों से फिर निकल आये हैं। जमुना का किनारा, मयूरों की बस्ती है। मोरों ने अपने बिरेंगे पंख पसार दिए हैं। तिलोरी की चहक संकेत...