जनपद के नगर और ग्राम

 

भारत के ज्ञात इतिहास में जनपद शायद सबसे पुरानी लेकिन व्यवस्थित शासन व्यवस्थाओं में से एक रहे हैं। जनपद इस मामले में भी अनूठे हैं कि यह प्रशासनिक इकाई आज के समय में भी कायम है। बीते समय में जनपदों का महा हो जाना उनकी व्यापकता और विराटता का परिचय था, और आज जनपदीय संरचनाएं लोकतान्त्रिक शासन की धमनियां हैं। हालांकि, लम्बे काल तक एक ही पटरी पर चलने वाली व्यवस्था के कुछ स्वाभाविक गुण-दोष विकसित हो जाते हैं। जनपदों की भी अपने स्थानिक प्रवृत्ति है, अपनी सबलतायें-दुर्बलताएं हैं। जैसे फर्रुखाबाद का खुल्ला खेल, फैज़ाबाद का फसाद, गोंडा की गुंडई और सौ कैंची पर एक बहरैची यह सब जनपदीय प्रवृत्तियां ही हैं, जो विनोद के लिए दोहराई जाती हैं। इसी तरह से हर जनपद का वैशिष्ट्य भी है।

 

आज के जनपद की एक प्रमुख दुर्बलता उसकी बनावट व बसावट ही है। मुख्यालय होने की खुशफहमी पाले लेकिन चारों ओर से ग्रामा अभिरामा से घिरा, गुंथा, कसा, जकड़ा जनपदीय कस्बा (नगर),जिसके चारों ओर उमुक्त निस्सीम ग्राम पसरे हैं। जकड़न कहिये या कसाव, या अपने में ही बंद, लेकिन कस्बे परिधि बहुत छोटी है। वह पसरता भी है तो ऐसे, जैसे गुंथे आंटे की लोई पर बीच में पड़ने वाले दबाव से किनारे पसरते तो हैं लेकिन गुंथन छूटती रही। जकड़न, कसाव, मोहपाश जो भी कहें, उन्हें बांधे रहता है। यह बन्धन, यह जकड़न ही गांव और कस्बे की सीमारेखा है। 

 

बेतरतीब तरीके से बसे कस्बे का व्यास महज 5 किमी होगा, और जनपद की सीमा 150 किमी के व्यास को छूती हो तब भी, क़स्बा हर व्यक्ति से चहक कर उसका मोहल्ला ही पूछता है। अमुक व्यक्ति किसी गांव का नाम लेता है, तो कस्बा पहले उसे अपने नक़्शे की परिधि में टटोलता है, फिर लम्बी उदासी लेकर पूछता है---गांव से हैं?

 

किधर पड़ता है?

 

जनपद का वह बड़ा कस्बा, गांव का चिन्हांकन करने के लिए आस-पास के किसी छोटे कस्बे का नाम लेता है, और खुद को सही पा प्रफुल्लित होता है। क़स्बा खुश है कि वह सारे छोटे कस्बों को जानता है और उसी से गांव का पता जानता है। वह गांवों को जानने का वजन नहीं लेता, बल्कि उसे इसमें अपना पतन महसूस होता है। यह उसके ग्रेस के खिलाफ है। कसबे को मुख्यालय का दंभ ऐसा है कि जनपद का सारा क्रीम तत्व यहीं होगा-----कस्बा ही प्रवाह है बाकी जनपद वेटलैंड भर है।

 

यह तो श्रेष्ठता के दंभ और दुराग्रह की बात हुई। जमीनी स्थिति कुछ और है। मैं अक्सर नोटिस करता आया हूं, कस्बे में एक अजब सी उदासी, तिरस्कार व नैराश्य है। वहां चार बार डोरबेल बजाने पर दरवाजा खुलता है। यह गंवई प्रवृत्ति के व्यक्ति के लिए एकदम विपरीत है। गांव तो अपनी तरफ घूमने वाली एक-एक गाड़ियों और पथिकों का हिसाब रखता है। वह सबको उत्साह से ही देखता है। इन सबके पीछे कुछ कारक परिस्थितियां हैं जरूर, लेकिन उनकी चर्चा नहीं करूंगा। यह निरीक्षण व्यवहार का है, प्रवृत्ति का है, स्वरूप का है। दार्शनिक व्याख्या और सामाजिक अध्ययन का नहीं है। लेकिन मुझे यह चुभता रहता है कि जनपद का पता कहने पर कस्बा ही पूछा जाए। गांवों का ऐसा तिरस्कार अच्छा नहीं लगता। ऊपर से उदासीनता ऐसी कि जनपदीय ग्राम की प्रतिभा को विश्व मान ले तब भी जनपदीय कस्बा नहीं मानेगा। यह मैं कई लोगों की स्थितियों में देख चुका हूं।

 

 

“रात के 12 बज रहे हैं। सभी के शहर में रुक जाने का अनुरोध मैं हमेशा की तरह नकार चुका हूं। करीब बीस मील दूर गांव है, रात कितनी गहरी और काली क्यों न हो, मैं हमेशा वहां लौट जाता हूं---आज भी लौट रहा हूं। मैं यह जानते हुए लौट रहा हूं कि सुबह वापस यहीं आना है। साफ-सुथरी लेकिन जंगल से भी अधिक खतरों से भरी चौड़ी काली सड़क सूनी हो चुकी है। यह उन्मुक्त हो चल पड़ने की अनुकूलता है। यात्रा चल रही है। चिंतन भी उसी गति से चल रहा है। नगर की उदासीनता धीरे-धीरे पीछे छूट रही है, सामने गांव हैं। अपनी व्यवस्था व सह-अस्तित्व से गुंथे मानव सभ्यता की सबसे सफलतम व सदाजीवा सामाजिक संरचनाएं। प्रेम की उपजाऊ भूमि पर मेड़ों की भासा में सारस की प्रेम कहानियां समेटे गांव। महाकवि के प्रकृति शिल्पी गांव, गोरी के प्यारे गांव। सभ्यताओं के उद्गम गांव, प्रेम-भाव साधन प्रतीकों के संगम गांव। मेले के गांव। उनरे, उनरे संवेदनों के गांव। आधुनिकता की चौंध में शहर हो जाने की प्रवृत्तियों के पोषक गांव। गांव सो रहे हैं। गांवों के सोते ही उनकी प्रवृतियां भी ढल गई हैं। हाथ भर की ककड़ी में नौ हाथ का बीज बना देनी वाली प्रवृत्ति, इंच भर भूमि को खेत हो जाने की प्रवृत्ति। अभी जो गांव दिख रहे हैं, यह चंचला प्रेयसी के बेसुध काया सी हैं, प्रेयसी सोई हुई है। उसके सोये होने की ही मोहकता है, उसी का सौन्दर्यबोध है। जगने पर तो अनंत महत्वाकांक्षाएं जाग जायेंगी। गांव भी जब उठेंगे तो शहर हो जाने को दौड़ेंगे। इसलिए उन्हें रात में निहारा जाना चाहिए।‘

 

 

स्थितियां ऐसी बन गई हैं कि ग्राम-सभ्यता के ढहने का उत्सव हर दिन कहीं न कहीं दिख जाता है। जो नगरीय सीमा में नहीं आये वह रो रहे हैं, तंत्र को कोस रहे हैं। उन्हें हर साल में सबको तालाब मुक्त, बागमुक्त, खेत खलिहान मुक्त, आंगन और दुआर मुक्त परिवेश चाहिए----नगर चाहिए।  लेकिन, याद रहना चाहिए कि मानवीय इतिहास में सभ्यताओं के नगरीय हो जाना ही उनके विनाश का कारण बना था। हमारे देवराज इंद्र भी पुरों को ध्वंस करने वाले पुरंदर हैं। भारत तब तक भारत है जब तक वह ग्रामा-अभिरामा है। आज फिर दुविधा का कुरुक्षेत्र सजा है, केशव अर्जुन से कहते हैं कि आज जो तुम अपने बांधवों से सामने हथियार लेकर यह तुम्हारे पुरखों के 'इन निर्णयों' का परिणाम है। आज जो तुम निर्णय लोगे, उसकी परिणतियां 'यह' होंगी। जो पूर्व के निर्णय हैं उन्हें तो भोगना है लेकिन वर्तमान पर हमारा अधिकार है। भावी संकट से बचने को आज खड़ा होना पड़ेगा। हमें गांवों के साथ खड़ा होना पड़ेगा।

 

 

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