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जीने की राह: एकाकी चुनना सीखें

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हमारी सामाजिक संकल्पना का आधार परस्परता है। यह परस्परता मनुष्य केे लिए प्रिवेलज भी है, वहीं उसकी संभावनाओं का एक हद भी। परस्परता के क्रम में ही मनुष्य ने क्षेत्रीय, भाषाई व राष्ट्रीय परिभाषा व समूह से स्वयं को जोड़ा है। संबंधों व उसके पर्यायों से खुद को जोड़ा है। अभ्यास व प्रशिक्षण से मनुष्य ने स्वयं को इन पहचानों व पर्यायों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया है। लेकिन, तब भी उसके भीतर एक स्वाभाविक द्वंद्व जारी रहा है। वहीं समाज के पर्याय व प्रतिमान भी बदले हैं, जोकि लंबे समय से चले आ रहे अभ्यास व प्रशिक्षण से भिन्न हैं।  इसलिए, सामाजिक व पारिवारिक ढांचे में हुए बदलाव की प्रतिक्रिया में मनुष्य के हिस्से जो एकाकी आई है वह उसके लिए किसी आपदा से कम नहीं है। लंबे समय से वह जिस अभ्यास में रह रहा है उस दृष्टि से देखने पर यह एक बड़ा संकट दिखाई देता है। मनुष्य अपने अभ्यास नहीं बदल पा रहा, न ही बदल रही हैं उसकी सामाजिक अपेक्षाएं।  दूसरी ओर इस थोपे हुए एकाकीपन से जूझना एक चुनौती बन गई है क्योंकि वर्षों का हमारा अभ्यास इसके विपरीत है। यहां हमारे अभ्यास और अपेक्षा के विपरीत यथार्थ का संघर्ष है...