कवियों में संत हों, संतों में कवि हों
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साहित्य ‘त्रिकोण के त्रास’ में है। यह त्रिकोण प्रासंगिकता, प्रेताभिव्यक्ति और उधारी
का चिंतन है। आज के साहित्य में यह तीनों छुपाए नहीं छुपते। जैसे, झीने सफेद आवरण से
तमस नहीं छुपता बल्कि उसकी अभिव्यक्ति आवरण को भी तमस कर देती है, वैसे ही यह प्रकट
हैं। यह सब आज के साहित्य का रूप हो सकता हैं, लेकिन उसके शाश्वत चिंतन और अपरिवर्तनीय
लेकिन प्रवहमान तत्त्व की प्रतीति नहीं करता।
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का कवि और साहित्यकार शाश्वत चिंतन और तत्त्व से बेसुध हैं। वह सबके मन की दोहराने
और आरम्भिक बातें कहकर जन-मन-रञ्जन में ही अपनी सिद्धि खोज रहे हैं। जिन्होंने प्रगतिशीलता
का चोला ओढ़ा है वह कभी पाश्चात्य तो कभी कम ज्ञात चिंतन का पुनर्पाठ गाते फिर रहे हैं।
इससे वह भीड़ से अलग तो दिख जाते हैं लेकिन उनका भेद खिंचाव काल में खुल जाता है। साहित्य
का सबसे बड़ा वर्ग बीते को दोहराने वाला है। यहां बीते युग की बातों को अनेक तरह से
कहा जा रहा है। जो विचार और अभ्यास प्रवाह क्रम में छोड़े जा चुके हैं उनको गाकर, स्मृतियों
में जीवंत रखकर पाठक को पाशबद्ध किया जा रहा है। पाठक अपने छूंछे छूटे उस जीवन को गाये
जाने से प्रसन्न हैं। वंचना के व्याख्यान में अजीब सा नशा है...जो समक्ष की संपन्नता
को ही तिरोहित कर सकता है। भावी की कामना को नकार देता है। स्मृतियों को गाना, बीते
को दोहराना...यही 'प्रेताभिव्यक्ति' आज के साहित्य की पहचान भी है और पराकाष्ठा भी।
यहां किसी अनछुए क्षितिज को छूना तो दूर उसकी तरफ अंगुलि संकेत की संभावना भी नहीं
दिखती। अलबत्ता जो बीत गया है उसे बीतने नहीं देना है। अतीत के प्रेत पकड़े रहने हैं।
उस परिधि से बाहर नहीं निकलना है। यह तो वैसी ही िस्थति कि घाव निधोले रखे जाएंगे।
इन बिन्दुओं से अवगत होते हुए हमें यह कहने का अधिकार
है कि यह साहित्य नहीं, साहित्य का त्रासद है। हमें यह न भी पता हो कि साहित्य की प्राप्ति
क्या होनी चाहिए तब भी हमें यह अधिकार है इस 'पर्याय' को असंगीकृत कर सकें। इसे साहित्य
न मानने का औचित्य दे सकें। लेकिन यह औचित्य देते ही हम पर एक जिम्मेदारी आती है कि
इस त्रासद को तोड़ने का कोई सूत्र सुझायें। और, इसके लिये साहित्य के तत्त्व का विमर्श
रखा जाये।
साधना की तरह ही साहित्य का अवलंब भी अन्त:
परीक्षा की संवेदनात्मक अनुभूति है। कवि का सौंदर्य दशर्न ऐंद्रिय प्रतीतियों के शब्द-स्पर्श-रस-रूप-गंधात्मक
स्तर पर ही नहीं है। साहित्य का ध्येय अनुभूति की प्रतिक्रिया मात्र नहीं है, न ही
यह प्रतिक्रियात्मक अभिव्यक्ति उसकी कसौटी है।
हमारी संस्कृति का कवि भी उसी उन्नत शिखर पर खड़ा है, जहां परम्परा में ऋषि खड़े हैं। ईशोपनिषद् का वचन है ‘कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भू’। कवि मनीषी है, परिभू है, स्वयंभू है। वह प्रजापति है। अग्नि पुराण कहता है ‘अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापति:।‘ अपार काव्य के संसार में कवि ही प्रजापति है, स्रष्टा है। वह स्रष्टा इसलिए है क्योंकि वह सत्य का द्रष्टा है, मात्र पक्ष विपक्षात्मक पहेलियां बुझाने वाला नहीं, अनुकूल-प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाला ही नहीं। दर्पण की तरह प्रतिच्छाया मात्र प्रेषित कर देना, जो है, उसके प्रति अपनी प्रतिक्रिया मात्र प्रकट करते जाना, कवि-धर्म नहीं हो सकता। कवि द्रष्टा है, वह कर्ता या भोक्ता नहीं, केवल द्रष्टा है। अर्थात प्रतिक्रियामुक्त। जो कुछ घटित हो रहा है, उसमें किसी प्रकार भी लिप्त नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह जो हो रहा है उससे अनजान व परामुख है। वह उससे अधिक जानता है, जो उसमें लिप्त है। क्योंकि जो जिसमें जितना लिप्त है, वह उस लिप्तता की सीमाओं से आगे तनिक भी नहीं जान पाता, किन्तु द्रष्टा उसके पार भी जानता है, सम्पूर्ण को जानता है। क्योंकि वह कहीं उसमें डूबा हुआ नहीं है, बंधा हुआ नहीं है, किसी भी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया के दुनिवार जाल में उलझा हुआ नहीं है। तभी तो वह द्रष्टा है।
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| इसी पुस्तक से साभार |
इससे यह तो स्पष्ट है कि मात्र प्रतिक्रिया को अभिव्यक्ति देना कविता का लक्ष्य भी नहीं है। काव्य है, अपने में मौलिक सर्जन। मैं समझता हूं कि मौलिकता की दो आवश्यक शर्ते हैं वह आह्वान व प्रेरणा से मुक्त हों। इस तरह मौलिक सर्जन की क्षमता केवल उसी में संभव है जो यथार्थ का द्रष्टा है, दृश्य से प्रतिबद्ध नहीं। सर्वथा बिलग पड़ा है दृष्टव्य से। प्रतिक्रियात्मक भावना से सर्वथा मुक्त है। इतिहास साक्षी है कि भारतीय मेधा ने उसी साहित्य या काव्य को सर्वोपरि प्रतिष्ठा दी जो संकल्प-विकल्पात्मक प्रतिक्रियाओं में नहीं बहा, युगीन स्थितियों को प्रतिबिम्बित करना मात्र जिसे अभीष्ट नहीं रहा, अपितु जिसने जीवन के चिरन्तन मूल्यों को अभिव्यक्ति दी। इसमें वेद, उपनिषद, आगम, त्रिपिटक और सन्तवाणी की प्राप्य प्रतिष्ठा आज भी जन-जीवन में सम्पूर्ण प्रखरता के साथ है। समसामयिक घटनाओं के आलेखन को भारतीय पुराण-साहित्य के रूप में मान्यता अवश्य मिली है किन्तु काव्य की उदात्त गरिमा का संस्पर्श उसे नहीं मिल पाया। नि:सन्देह काव्य अपने युगीन यथार्थ को साकार करता है, अपने युग के लोकमानस को अभिव्यक्ति भी देता है, समसामयिक समस्याओं को प्रखर वाणी भी देता है, उनसे आंख नहीं मूंदता। किन्तु यदि इसे ही काव्य की कसौटी मान लिया जाय तो उस पर काव्य की अपेक्षा इतिहास ही ज्यादा खरा उतरेगा।
साहित्य मात्र दर्पण नहीं, साहित्य मात्र घटनाओं
की वर्णनात्मक व्यंजना नहीं, मात्र इतिहास नहीं, आदमी क्या है, इसका चिंतन करना ही
नहीं, अपितु इससे बहुत आगे जीवन के अछूते अनंत क्षितिजों की ओर अंगुलि निर्देश भी साहित्यकार
का अनिवार्य धर्म है। भोगे हुए यथार्थ के साथ अभोगी कामनाओं की ओर होने वाला संकेत
भी मानव के लिए कम महत्वपूर्ण नहीं। उन अभोगी कामनाओं को मात्र वायवीय आदर्श कहकर नकारा
नहीं जा सकता, क्योंकि कल की हर वायवीय कल्पना आज इतना ठोस यथार्थ का धरातल ग्रहण कर
रही है कि भविष्य प्रतिपल अतीत बनता जा रहा है और अनन्त संभावनाएं मनुष्य को दस्तक
दे देकर पुकार रही हैं। कल की हर कल्पना आज का यथार्थ बन रही है, आज का यथार्थ कल इतिहास
बन जायेगा। इसलिए केवल कल्पना या भोगे हुए यथार्थ के नाम पर काव्य की इयत्ता का निर्धारण
न्याय संगत नहीं होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम निरे आदर्श या कर्तव्यमूलक उपदेश
को काव्य में ठूंस दें। किन्तु इसका अर्थ इतना अवश्य है कि हम अपनी दृष्टि और उसके
दृष्टव्य से ऊपर उठकर कुछ सर्जन करें।
वेद और उपनिषद, आगम और त्रिपिटक अथवा मध्य
युगीन संतों की वाणी आज भी जिन्दा क्यों है? हजारों वर्ष पूर्व रचित पेड़ की छालों
पर अथवा चमड़े के पट्टों पर या पकी हुई ईटों पर खुदे काव्य ग्रन्थों का महत्व आज भी
क्यों है? महज इसलिए नहीं कि वे समसामयिक संदर्भ पर प्रकाश डालते हैं, या अपने से बीता
दोहराते हैं बल्कि इसलिए कि वे मानवीय मूल्यों का चिरन्तन प्रकाश जन-जीवन तक पहुंचाते
हैं। होमर का ‘इलियड‘ दांते का ‘डिवाइना कामेडिया‘, मिल्टन का ‘पेराडाइज लास्ट‘ आज
भी उतने ही तरोताजा और स्फूर्तिमान हैं जितने वे अपने रचनाकाल में थे। शेक्सपीयर के
नाटकों में बासीपन जाना तो बहुत दूर, लगता है सूरज की किरण को छुवन से जैसे अभी-अभी
कोई ताजा कली खिली हो, उसका एकमात्र कारण यही है कि इनके कवि ने मात्र दर्पण बनना स्वीकार
नहीं किया। बर्नार्ड शा ने इसी बात पर शेक्सपीयर की कटु आलोचना भी की थी कि उसने अपने
नाटकों में सम-सामयिक यथार्थ का चित्रण करने पर बल नहीं दिया है, अपने युग की समस्याओं
का चित्रण नहीं किया है। इसका उत्तर दिया था, रूस के प्रख्यात साहित्यकार व चिन्तक
मनीषी लेफ तोलोस्तोय ने। उन्होंने कहा मानवजाति के विकास की महायात्रा में एक ऐसा युग
आने वाला है जबकि बर्नार्ड शा ने अपने नाटकों में अपने युग की जिन समस्याओं के बारे
में लिखा है, उनका अस्तित्व भी नहीं रहेगा। तब बर्नार्ड शा के नाटकों की प्रयोजनीयता
समाप्त हो जायेगी और लोग उन्हें भूल जायेंगे। लेकिन, शेक्सपीयर के नाटक उस युग में
भी बड़े चाव से पढ़े जायेंगे। क्योंकि उसने मानवीय चरित्र के शाश्वत मूल्यों को अपनी
कृतियों में अत्यन्त प्रखरता से उठाया है और एक ऐसी विधायक दृष्टि दी है, जिसकी जरूरत
आदमी को हर देश काल में रही है।
वर्तमान काव्य-धारा में भोगे हुए यथार्थ, युग-संत्रास
और परिवेशमत कुण्ठाओं के अधिक चर्चे हैं, क्या हमारी कविता की अंतिम प्रयोजनीयता यही
है? हमें न यथार्थ से आंख मूंदना है और न ही भौतिक मानिसक स्तरों पर कटना है अपने-आपसे,
स्वप्निल वायवीय आदर्श कल्पनाओं में ये दोनों ही क्रिया-प्रतिक्रियाओं के दुनिवार नियमों
से संचालित मन:स्थितियां ही हैं।
कविता
क्रिया है, प्रतिक्रिया नहीं। संवेदना है, स्थूल स्तरों पर जीना भोगना नहीं, हजारों
सम्बन्ध संवेगों के बावजूद जो अनभिव्यक्त है, उसकी अभिव्यंजना है, हजारों छटपटाहटों
के बीच भी जो घुट रहा, उसे पाना है और उसके अनुरूप एक स्वस्थ भावभूमि को तैयार करना
है। अनेकानेक उदाहरण यह स्वयं सिद्ध करते रहते हैं कि जीवन और जगत के प्रति उदात्त
प्रवृत्तिमूलना पर भी भारतीय अध्यात्म के पास काव्य के क्षेत्र में जनजीवन को देने
योग्य अभी भी बहुत कुछ है जो भारतीय कवियों की लेखनी से सर्वथा अनछुआ है--अनाघ्रातं
पुष्पं किसलय मलूनं कररु है: ----कितने ही अनसूंघे पुष्प हैं, कितने ही अनछुए पत्ते
हैं।

बहुत शानदार आलेख।
जवाब देंहटाएंअद्भुत है यह। मौलिक साहित्य का सृजन करने के लिए यह आलेख बहुत कुछ बताता है।
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