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मार्किट डिमांड के अनुरूप गुरु

     गुरु घंटाल हुए हैं, तो चेला चापड़ हो गए हैं। आज गुरु-शिष्य दो छोर हैं, जो स्वार्थ के प्रवाह से जुड़े हैं। आदान-प्रदान हो रहा है, हाथ-मिलौव्वर का जमाना है। परस्पर पोषण कसौटी है।  गली-गली गुरु उपजे हैं। स्वयंसिद्धाओं की मंडी लगी है। चेले गुरु की 'पहुंच' देखकर वंदन करते हैं। गुरु की प्रज्ञा नहीं स्टेटस महत्वपूर्ण है। चापड़ चेले शिष्यता लेने उन्हीं के यहां जाते हैं, जिनके पास ब्रांड न्यू वाहन हो व बॉम्बे डाइंग वाला सोफा लगा हो। गुरु को दंडवत करते प्रशासनिक अधिकारियों व राजनेताओं की तस्वीरों से दीवार आच्छादित हो, सो तत्काल दंडवत प्रणाम। दीक्षा सम्पन्न। जिसमें थोड़ा सद्भाव है भी, वह 'इन्फॉर्मेशन डिस्ट्रीब्यूटर' और गुरु का भेद ही नहीं समझ पाए हैं। इस फील्ड में दद्दा लोगों का दबदबा है। दद्दा लोग 'पॉपुलैरिटी' की चलती फिरती 'हाइड्रोलिक प्रेशर' मशीन हैं। प्रज्ञावान शिक्षकों को  वह 'दाब' देते हैं, "बोलने से पहले मेरे फॉलोवर की लिस्ट देखो। तब मुंह खोलो।" हिये तराजू तौलिके के नहीं, फॉलोवर लिस्ट देखिके बोलो।'  अब उन्हें कौन बताये कि हम जैसे लोग ...

पूर्वैरप्यकृतं....कृतं

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       भारत का समाज सदियों से खंडहरों में उलझा है। वह वहीं ठहर गया है। कुछ घाव ऐसे हैं, जिन्हें वह देखता है रोता है लेकिन उनका उपचार नहीं करता---या करना नहीं चाहता। प्रति पल भग्न होते उन अवशेषों में उसका 'स्व' क्षरित होता जाता है, अलबत्ता वह उन्हें गौरव कहकर प्रसन्न होता है। भव्य भवनों व ऊर्जा केंद्रों के भग्न रूपों को 'गौरव' बताती सैकड़ों पोस्ट आंखों से गुजर जाती हैं। उसपर गर्व करने वाले हजारों और उसकी स्थिति को लेकर शिकायत करने वाले लाखों भी उसी पोस्ट के सापेक्ष गुजरते जाते हैं। लेकिन, वह गुजरना कभी गुजरता नहीं। उसकी आवृत्ति होती रहती है।      आगे बढ़ने को, जो अनिवार्य संतोष चाहिए होता है, उससे यह समाज वंचित हो गया है। अलबत्ता उसे शिकायतों का संत्रास झेलना ही बदा है। हर कोई बता देता है कि उसके 'बिखरे अस्तित्व', 'विपन्नता' व 'उचाट मन' का कोई दोषी 'वह' है। उसने अपनी स्व की सत्ता में हर हस्तक्षेप का श्रेय किसी न किसी को दे रखा है। स्वयं न कोई जिम्मेदारी ली है, न जवाबदेही। शिकायतों का सरोवर कभी सूखता नहीं, आत्मावलोकन होता नहीं।       दी...