मार्किट डिमांड के अनुरूप गुरु
गुरु घंटाल हुए हैं, तो चेला चापड़ हो गए हैं। आज गुरु-शिष्य दो छोर हैं, जो स्वार्थ के प्रवाह से जुड़े हैं। आदान-प्रदान हो रहा है, हाथ-मिलौव्वर का जमाना है। परस्पर पोषण कसौटी है। गली-गली गुरु उपजे हैं। स्वयंसिद्धाओं की मंडी लगी है। चेले गुरु की 'पहुंच' देखकर वंदन करते हैं। गुरु की प्रज्ञा नहीं स्टेटस महत्वपूर्ण है। चापड़ चेले शिष्यता लेने उन्हीं के यहां जाते हैं, जिनके पास ब्रांड न्यू वाहन हो व बॉम्बे डाइंग वाला सोफा लगा हो। गुरु को दंडवत करते प्रशासनिक अधिकारियों व राजनेताओं की तस्वीरों से दीवार आच्छादित हो, सो तत्काल दंडवत प्रणाम। दीक्षा सम्पन्न। जिसमें थोड़ा सद्भाव है भी, वह 'इन्फॉर्मेशन डिस्ट्रीब्यूटर' और गुरु का भेद ही नहीं समझ पाए हैं। इस फील्ड में दद्दा लोगों का दबदबा है। दद्दा लोग 'पॉपुलैरिटी' की चलती फिरती 'हाइड्रोलिक प्रेशर' मशीन हैं। प्रज्ञावान शिक्षकों को वह 'दाब' देते हैं, "बोलने से पहले मेरे फॉलोवर की लिस्ट देखो। तब मुंह खोलो।" हिये तराजू तौलिके के नहीं, फॉलोवर लिस्ट देखिके बोलो।' अब उन्हें कौन बताये कि हम जैसे लोग ...