तृष्णा छोड़, सावन का बीत जाना
चांदी की सी शुभ्र लड़ियों वाली कास की पांतें देखकर याद आया.....सावन बीत चुका। इसी संकेत से सनद मिली कि सावन आया था। जैसे गुजरे कारवां की सनद उठता गुबार होता है, ऐसे ही सावन के गुजर जाने का संकेत फूली हुई कास की पांतें हैं। 'अब तो बरसाती नदियां, अनजान दिशा को लौटने लगती हैं। अपने फांटों में थोड़े कंकड़, थोड़ी रेत और ढेर सारी रिक्तता छोड़कर। बेटियां भी लौटने लगती हैं, गांवों की चहक और अल्हड़पन बटोरकर। गाम्भीर्य की शिथिलता साथ लेकर, जैसे--शरद के उदासी की दस्तक देकर जा रही हों।' आसमान में तैरते बादलों के टुकड़ों की तरह, भाव भी छितराये पड़े हैं। सावन से जो भावनाओं जुड़ी हैं, वार्षिक आवृत्ति के चलते वह धारणा सी बन गई हैं। वह सब न घटें तो लगता ही नहीं कि सावन आया। हम निःसीम मैदानों में पले-बढ़े लोग हैं। सावन के दिनों में मैदानी प्रकृति की उदारता अनंत-सी लगने लगती है। बरसाती नदियों की कसमसाती देह, कभी फांट बढ़ाकर समूचे मैदान पर दावा करतीं नदियां। शाम ढलते ही अविराम गान करते झींगुर, घुप अंधेरे में स्वर से अपनी स्थिति बताते ...