पीपल और चांद
परिवार के कलहों और समाज के षड्यंत्रों से स्वयं को बचाते वीरानी सी दुनिया में आ गया हूं। अकेले रहने की आदत ऐसी बनी है कि कुछ दिन नियमित समूह में रह लेने के बाद संगति-मोचन को गहने ध्यान में उतरना पड़ता है। नौकरी-लक्ष्य सिद्धि के नाम पर दिन में फिर भी अपने को समाज के साथ, स्थिति के साथ समायोजित कर लेता हूं, रात साझा नहीं कर पाता। रात के दो स्थाई साथी हैं, एक पीपल का पेड़ और दूसरा चांद। पीपल की पत्तियां एक निश्चित आवृत्ति में हिलती रहती हैं, जैसे मन अतीत और वर्तमान के बीच दोलन करता है। रात के समय पत्तियों की सरसराहट में एक संवाद होता है, जिसे ध्यान से सुनने पर अनकही गुत्थियों की गांठें खुल जाती हैं। दूसरा चांद है, भावनाओं की तरह कला-दर-कला चढ़ता है, फिर अपेक्षित प्रत्युत्तर न पाकर ठिठक...सिकुड़कर शून्य हो जाता है--और अपने पीछे असीम तम छोड़ जाता है। पैमाने से परे का अंधकार। मेरे पास रहने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। मौसमों की तरह पड़ाव बदलते रहते हैं, लेकिन यह दोनों साथी न बदले। इसे इत्तेफ़ाक़ कहिये, संयोग कहिये या मेरी नियति। जहां भी रहा, चिंतन को बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह पीपल के पत्तों की सरसर...