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पीपल और चांद

परिवार के कलहों और समाज के षड्यंत्रों से स्वयं को बचाते वीरानी सी दुनिया में आ गया हूं। अकेले रहने की आदत ऐसी बनी है कि कुछ दिन नियमित समूह में रह लेने के बाद संगति-मोचन को गहने ध्यान में उतरना पड़ता है। नौकरी-लक्ष्य सिद्धि के नाम पर दिन में फिर भी अपने को समाज के साथ, स्थिति के साथ समायोजित कर लेता हूं, रात साझा नहीं कर पाता। रात के दो स्थाई साथी हैं, एक पीपल का पेड़ और दूसरा चांद। पीपल की पत्तियां एक निश्चित आवृत्ति में हिलती रहती हैं, जैसे मन अतीत और वर्तमान के बीच दोलन करता है। रात के समय पत्तियों की सरसराहट में एक संवाद होता है, जिसे ध्यान से सुनने पर अनकही गुत्थियों की गांठें खुल जाती हैं। दूसरा चांद है, भावनाओं की तरह कला-दर-कला चढ़ता है, फिर अपेक्षित प्रत्युत्तर न पाकर ठिठक...सिकुड़कर शून्य हो जाता है--और अपने पीछे असीम तम छोड़ जाता है। पैमाने से परे का अंधकार।  मेरे पास रहने का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। मौसमों की तरह पड़ाव बदलते रहते हैं, लेकिन यह दोनों साथी न बदले। इसे इत्तेफ़ाक़ कहिये, संयोग कहिये या मेरी नियति। जहां भी रहा, चिंतन को बैकग्राउंड म्यूज़िक की तरह पीपल के पत्तों की सरसर...

जनपद के नगर और ग्राम

  भारत के ज्ञात इतिहास में जनपद शायद सबसे पुरानी लेकिन व्यवस्थित शासन व्यवस्थाओं में से एक रहे हैं। जनपद इस मामले में भी अनूठे हैं कि यह प्रशासनिक इकाई आज के समय में भी कायम है। बीते समय में जनपदों का महा हो जाना उनकी व्यापकता और विराटता का परिचय था, और आज जनपदीय संरचनाएं लोकतान्त्रिक शासन की धमनियां हैं। हालांकि, लम्बे काल तक एक ही पटरी पर चलने वाली व्यवस्था के कुछ स्वाभाविक गुण-दोष विकसित हो जाते हैं। जनपदों की भी अपने स्थानिक प्रवृत्ति है , अपनी सबलतायें-दुर्बलताएं हैं। जैसे फर्रुखाबाद का खुल्ला खेल , फैज़ाबाद का फसाद , गोंडा की गुंडई और सौ कैंची पर एक बहरैची यह सब जनपदीय प्रवृत्तियां ही हैं, जो विनोद के लिए दोहराई जाती हैं।   इसी तरह से हर जनपद का वैशिष्ट्य भी है।   आज के जनपद की एक प्रमुख दुर्बलता उसकी बनावट व बसावट ही है। मुख्यालय होने की खुशफहमी पाले लेकिन चारों ओर से ग्रामा अभिरामा से घिरा , गुंथा , कसा , जकड़ा जनपदीय कस्बा (नगर) , जिसके चारों ओर उमुक्त निस्सीम ग्राम पसरे हैं। जकड़न कहिये या कसाव , या अपने में ही बंद , लेकिन कस्बे परिधि बहुत छोटी है। वह पसरता भी ...