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वह स्त्री...

बस में यात्रा कर रहा था। यात्रा की दुश्वारियां गिनाने से बेहतर है यह उल्लेख कर दिया जाए कि वह उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस थी। लहराती, लजाती, ठिठकती...गुर्राकर फिर फुदकती वह बस चली जा रही थी। सड़क के किनारे संयोजित कस्बों के लोग इत-उत उसे रोकते, चढ़ते-उतरते। मुझे दूर जाना था, तो सबसे पीछे की सीट पर बैठा था। सबसे पीछे की सीट पर बैठने का प्रयोजन बस इतना ही नहीं था कि मैं बस के अंतिम पड़ाव तक का यात्री था, बल्कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन, पीछे बैठे होने में भी मैंने सुखद पक्ष खोज लिया था। वह था सभी यात्रियों को आते, उतरते देखना। सबकी अलग देहभाषा और भंगिमा होती थीं। उसे पढ़ना आनंद देने लगा। इस प्रयोग से गर्मी व उमस से थोड़ा ध्यान हटा।  बस में कोई सीट खाली नहीं थी और दोनों सीटों की पांत के बीच कुछ लोग खड़े होकर यात्रा कर रहे थे।  इसी बीच एक स्थान पर दो किशोरियों बस में चढ़ी और अंदर सीट खाली न देखकर उतरने लगीं। तब तक दो युवक अपनी सीट देने की पेशकश के साथ उठकर खड़े हुए। किशोरियों ने वह सीटें प्राप्त कर लीं, युवक विश्व विजेता की भांति विजय की सनदें चेहरे पर सहेजकर वहीं तन गए, पताका से।  ...